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फर्स्ट थिंग फर्स्ट, हमको शायद पहली बार शास्त्रीजी की टिप्पणी पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, ये टिप्पणी का प्रताप है कि हमें शुक्रिया कहने को पोस्ट लिखनी पड़ रही है इसलिये तुम्हारी भी जय जय, हमारी भी जय जय।

शास्त्री जी ने हमारे नये चिट्ठे पर कुछ यूँ टिप्पणी छोड़ी (उनकी तरह ही कट-पेस्ट करके यहाँ लिख रहा हूँ, बोल्ड हमने किया है टिप्पणी में नही था) -

हिन्दी चिट्ठाजगत में इस नये चिट्ठे का एवं चिट्ठाकार का हार्दिक स्वागत है.

मेरी कामना है कि यह नया कदम जो आपने उठाया है वह एक बहुत दीर्घ, सफल, एवं आसमान को छूने वाली यात्रा निकले. यह भी मेरी कामना है कि आपके चिट्ठे द्वारा बहुत लोगों को प्रोत्साहन एवं प्रेरणा मिल सके.

हिन्दी चिट्ठाजगत एक स्नेही परिवार है एवं आपको चिट्ठाकारी में किसी भी तरह की मदद की जरूरत पडे तो बहुत से लोग आपकी मदद के लिये तत्पर मिलेंगे.

शुभाशिष !

– शास्त्री (www.Sarathi.info)

अब इस टिप्पणी को पढ़कर हमारी समझ नही आया कि खुश होऊँ या इस बात पर रोऊँ कि इतने समय से दिन-रात कलम सब काली करना व्यर्थ गया। पहले सोचा सारथी पर जाकर बोल आते हैं, “आप हमारे ब्लोग पर आये धन्यवाद, ” फिर लगा कि नही उनके ब्लोग में तो हम कितनी बार पहले से टिपिया चुके हैं। इसलिये सोचा पोस्ट लिखकर धन्यवाद कहना ठीक रहेगा।

इस टिप्पणी को पाकर मुझे कुछ वैसा ही लगा जैसा एक स्कूल में जाने वाले उस बालक को लगा था, किस बालक को? लीजिये जानिये -

एक गरीब लड़का था, ज्यादातर चुपचाप रहने वाला। वह रोज बगैर धुले, फटे दबे कुचले कपड़े पहन के स्कूल आता, चुपचाप क्लास में जाकर बैठता, मास्टर की बातें ध्यान से सुनता, कुछ सीखता फिर वापस घर आ जाता। फिर एक दिन उस लड़के के कपड़ों में एक सह्रदय व्यक्ति की नजर गयी, उसने लड़के को एक नया साफ सुथरा चमकता हुआ शर्ट और पेंट का जोड़ा भेंट किया।

अगले ही दिन वो लड़का अपने नये नये कपड़े पहन के क्लास में गया, मास्टर की नजर जैसे ही उस पर पड़ी उसको अपने पास बुलाया। लड़के के आते ही उसके गाल पर एक थप्पड़ रसीद किया और बोले, “नालायक सारे साल गायब रहा अब साल खत्म होने का वक्त आया तो स्कूल याद आ रहा है। चल जा बैठ कर कुछ सीख ले अगले साल हर दिन स्कूल आना।”

शास्त्रीजी, एक बार पुनः आपकी टिप्पणी का शुक्रिया, आशा है आगे भी आप ऐसे ही हौंसला बढ़ाते रहेंगे।

[ऊपर की कहानी हमारी ही लिखी है, पसंद आने पर हमारी ही पीठ ठोंकियेगा और नापसंदी पर भी हमें ही कोसियेगा।]

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