बम धमाकों पर निठल्लिकाएँ

मैं कोई साहित्यिक नही इसलिये शब्दों के फेर में ज्यादा पड़े बिना मैने ये शब्द ईजाद कर लिया। कम लाईनों में कविता करने के एक तरीके को शायद क्षणिकाएँ कहते हैं। अगर वैसे ही कम लाईनों में कुछ गद्ध लिखा जाये तो उसे क्या कहेंगे समझ नही आया इसलिये हमने नाम दिया निठल्लिकाएँ

आइये बम धमाकों से उत्पन्न कुछ निठल्लिकाओं पर नजर डालते हैं।

बड़ा नेता
एक और नये बम धमाके की खबर मिलते ही एक बड़ा नेता अपने घर के दराज (Drawer), आलमारियों में कुछ ढूँढता हुआ अपनी बीबी पर चिल्लाते हुए पूछता है - “मेरा संवेदना वाला फुरसतिया स्टाईल एक लाईन का लैटर कहाँ रखा है, प्रेस को धमाके के ऊपर अपनी संवेदना जताने के लिये भेजना है।” बीबी का जवाब आता है पिछले एक महीने में ५ बार तुम उसे प्रेस को भेज चुके हो अब तक तो जुबानी याद हो जाना चाहिये।

ब्लोगर/मीडिया
एक पुराना ब्लोगर/मीडिया दूसरे नये उत्साही ब्लोगर/मीडिया से अपना दर्द कुछ यूँ बयाँ करता है - यार मैं इन बम धमाको पर कट-पेस्ट करके लिखते लिखते बोर हो गया हूँ, कुछ नया होना चाहिये। नया ब्लोगर, “कट-पेस्ट” से क्या मतलब है। जवाब मिलता है, “कुछ नही, हर बार एक ही लेख को उठाता हूँ बम धमाके के शहर का नाम बदलता हूँ उसके बाद मरने और घायलों की संख्या। बस हो गया नया लेख तैयार सीधे ब्लोग/प्रेस में पोस्ट कर देता हूँ, गालियाँ और आक्रोश की भाषा बदलने की जरूरत ही नही पड़ती।

नागरिक अधिकारों वाले ग्रुप
एक आम आदमी एक आम सा सवाल एक नागरिक अधिकारों वाले ग्रुप से करता है, “जब काश्मीर में सेना वाले आतंकवादियों को मार रहे थे, तब आप लोगों ने बड़ा हल्ला मचाया था। आपके हल्ले से लगता था जैसे भारत से ज्यादा अत्याचारी कोई और है ही नही लेकिन अब हर एक दिन छोड़कर जो बम धमाके हो रहें हैं उसमें लोग मर रहे हैं। तो आपको नागरिक अधिकारों की याद क्यों नही आती। जवाब मिला, “हम भी सामने वाले को देखकर आवाज उठाते हैं, सामने वाला बम जेब में रखकर जब ऐसे घुम रहा हो जैसे हम चाकलेट रख कर घुमते हैं तो आवाज कौन उठा सकता है।”

नाजायज संबन्धों में उलझे युगल
आदमी अपनी प्रेमिका से जो पहले से ही शादीशुदा है, तुम अपने पति को तलाक जल्दी से दे दो कहीं ऐसा ना हो कि मेरे हाथों से कुछ गलत हो जाय। प्रेमिका का जवाब आता है, “तुम इसकी ज्यादा चिंता मत करो, आज से ही उसे रोज भीड़ वाली जगहों पर भेजती हूँ हमें कुछ करने की जरूरत ही नही पड़ेगी। दूसरे लोग घूम रहे हैं ना हमारा काम करने को।”

निठल्ला इंडिया में किसी के घर पर
निठल्ला देखता है एक आदमी आफिस को जाने के लिये तैयार होकर निकलने से पहले घर के सभी सदस्यों से गले मिल रहा है, सारे जरूरी काम समझा रहा है, बैंक एकाउंट के बैलेंस बता रहा है। और ये भी याद दिला रहा है कि उसका किसी पर कोई उधार वगैरह बाकि नही इसलिये कोई आये भी तो उसकी बात मत मानना। निठल्ले से रहा नही जाता और वो पूछ पड़ता है, “भैये, शाम को तो वापस घर ही आ रहे हो फिर इतना सब क्यों?” जवाब मिलता है, “शहर में नये आये हो क्या? घर से निकल के आफिस पहुँचने की गारंटी नही है तुम तो शाम को वापस घर पहुँचने की बात कर रहे हो। यही नही आफिस में एक ही काम को करने के लिये दो लोग रखे हैं जो अलग अलग दिशाओं में रहते हैं जिससे भगवान ना करे आफिस के काम में कोई बाधा आये”।

जीवन बीमा निगम का आफिस
एजेंट अपने बॉस से, “इस बार मेरे को अच्छा कमीशन मिलना चाहिये, मैं इतना ज्यादा बिजनेस लेकर आया हूँ जितना पिछले २-३ सालों में नही आया”। बॉस भी पलट कर जवाब देता है, “अगर बिजनेस लाने के लिये कमीशन देना ही है तो उसके सही उम्मीदवार तो वो हैं जो लेफ्ट-राइट बम फेंके जा रहे हैं”।

अगर आपके भी दिमाग में भी कुछ निठल्लिकाएँ सूझती है तो टिप्पणी में जरूर बतायें।

शायद आप इन्हें भी पढ़ना पसंद करें

About the Author

Tarun
निठल्ला चिन्तन है थोड़ी मस्ती थोड़ा चिंतन।

[अगर आप चाहें तो निठल्ला चिंतन को सीधे ईमेल के द्वारा सब्सक्राईब कर सकते हैं और या फिर फीड रीडर में सब्सक्राइब करके भी पढ़ सकते हैं]

14 Responses to “ बम धमाकों पर निठल्लिकाएँ ”

  1. सटीक और धारदार।

  2. great side effects

  3. अच्छा लखा है आपने ….सही चिंतन है यह ..

  4. बधाई..इतने ज्वलंत विषय पर कुछ हट के लिखने के लिए…
    नीरज

  5. बहुत ही सही और सार्थक पोस्ट लिखी है। इस नयी विधा निठल्लिकाएं के जन्म दाता आप ही कहलाएंगें।बधाई स्वीकारें।

  6. गजब की निठल्लिकाएं हैं और शब्द की इजाद पर बधाई ! पर ज़रा जल्दी से इसका पेटेंट करवा लीजिये !:)
    बहुत शुभकामनाएं !

  7. कोई निठल्लिका तो नहीं सूझ रही, पर यह मस्त होगा कि हर पोस्ट के नीचे एक निठल्लिका भी हो - आज की निठल्लिका के रूप में!

  8. वाकई अपनी बात को बिक्लुल हट के अभिव्यक्त किया है . बधाई .

  9. मजे हैं। धांसू लिखा। निठल्लिकायें पेश करते रहें। नियमित।

  10. निठल्‍ला चिंतन की निठल्लिकाओं के क्‍या कहने..बहुत बढि़या है..
    साहित्य की नयी विधा के आविष्‍कार पर बधाई.. ताऊ से सहमति.. जल्‍दी पेटेंट करवा लीजिए :)

  11. सही है भाई एक मीडिया रह गया बस …..

  12. @Anurag, aapne para nahi dekhiye second number media ka hi hai :)

  13. Aap sabhi ko ye pasand aayi, shukriya hai ji smiley ke saath :)

  14. नियमिज लिखिए निठल्लिकाएं। गुदगुदा रहीं हैं और हमारे डाक्‍टर अनुराग जी की बात पर जरूर गौर कीजिएगा। मीडिया पर विशेष कृपा जरूर हो।

Leave a Reply

You can use these XHTML tags: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <blockquote cite=""> <code> <em> <strong>