पराशर गौड़ की एक कविताः पीड़ा
पराशर गौड़ उत्तराखंडी सिनेमा के जनक कहे जाते हैं, इनके द्वारा पहाड़ी महिला के संघर्ष की कहानी पर निर्मित फिल्म गौरा अभी इस साल के शुरू में रिलीज हुई थी। इन्होंने फिल्मों के साथ साथ कई नाटक और कवितायें भी लिखीं हैं, आज इन्हीं की एक कविता पोस्ट कर रहा हूँ जो इन्होंने कल-परसों शायद बम धमाकों से व्यथित होने के बाद लिखी होगी।
आज की शाम
वो शाम न थी
जिसके आगोश में अपने पराये
हँसते खेलते बाँटते थे अपना अमनो-चैन
दुःख दर्द, कल के सपने!
घर की दहलीज़ पर देती दस्तक
आज की सांझ, वो सांझ न थी … आज की शामदूर छितिज पर ढलती लालिमा
आज सिंदुरी रंग की अपेक्षा
कुछ ज्यादा ही गाडी लाल दिखाई दे रही थी
उस के इस रंग में बदनियती की बू आ रही थी
जो एहसास दिला रही थी
दिन के कत्ल होने का?
आज की फिजा, वो फिजा न थी …. आज की शामचौक से जाती गलियां
उदास थी …
गुजरता मोड़,
गुमसुम था
खेत की मेंड़ भी
गमगीन थी
शहर का कुत्ता भी चुप था
ये शहर, आज वो शहर न था… आज की शामधमाकों के साथ चीखते स्वर
सहारों की तलाश में भटकते
लहू में सने हाथ ……
अफरा तफरी में भागते गिरते लोग
ये रौनकी बाजार पल में शमशान बन गया
यहाँ पर पहले ऐसा माहौल तो कभी न था
ये क्या हो गया? किसकी नजर लग गयी … आज की शामवर्षो साथ रहने का वायदा
पल में टूटा
कभी न जुदा होने वाला हाथ
हाथ छुटा
सपनों की लड़ी बिखरी
सपना टूटा
देखते देखते भाई से बिछुड़ी बहिना
बाप से जुदा हुआ बेटा
कई माँ की गोदें हुईं खाली
कई सुहागनों का सिन्दूर लुटा
शान्ति के इस शहर में किसने ये आग लगाई
ये कौन है? मुझे भी तो बताओ भाई … २ … आज की शाम
- पराशर गौड़
[कनाडा १५ सितम्बर २००८ शाम ४ बजे]











This post has 6 comments
September 17th, 2008
संवेदनशील कविता है। पढ़वाने के लिये आभार!
September 17th, 2008
बहुत उम्दा अभिव्यक्ति!!! वाह!!
September 17th, 2008
पाराशर गौड़ जी से परिचय कराने को धन्यवाद।
September 17th, 2008
thanks…
September 17th, 2008
देखते देखते भाई से बिछुड़ी बहिना
बाप से जुदा हुआ बेटा
कई माँ की गोदें हुईं खाली
कई सुहागनों का सिन्दूर लुटा
शान्ति के इस शहर में किसने ये आग लगाई
ये कौन है? मुझे भी तो बताओ भाई …
बहुत संवेदनशील रचना है ! धन्यवाद !
September 17th, 2008
वो शाम सच में ऐसी ही थी… पता नहीं किसे ये सब अच्छा लगता है ! अच्छी कविता.
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