जिस रोज मुझे भगवान मिले: अंतिम भाग
नेताओं की तरह तुरंत पाला बदलते हुए अपना आत्म सम्मान, अपना दिल-दिमाग सब कुछ अपनी जेब में रख हाथ जोड़ के हम बोल पड़े, “बस भगवन बस सब समझ गया। लेकिन शक का इलाज तो किसी वैध के पास है नही मन अभी भी शक कर रहा था कि ये भगवान कैसे हो सकते हैं, इतनी देर से हम से बात कर रहे हैं और हमको अभी तक एक बार भी “वत्स” कहकर संबोधित नही किया। बातें तो बहुत पूछनी थी लेकिन डर इस बात का था कि कहीं कोई श्राप ना दे दें। वैसे श्राप से ज्यादा इस बात का डर था कि कहीं जंगल में अकेला छोड़ दिया तो जंगली जानवर सूदखोरों की तरह बोटी बोटी नोच डालेंगे।
अपनी सोच में डूबे हम चुपचाप वैसे ही चल रहे थे जैसे सीता और लक्ष्मण राम के पीछे पीछे वनवास को चल दिये थे। तभी आवाज आयी ‘तुम्हारा नाम क्या है वत्स’? हमारे पैर से जैसे जमीन खिसक गयी हो ऐसा झटका लगा जैसे किसी नेता को कुर्सी छीन जाने पर लगता है। हमें लग गया कि ये जो भी है हमारा दिमाग पढ़ सकता है इसलिये सोचने का काम तो करना ही नही है, बस बोलते जाओ अगर सोचने वाली बात इसने पढ़ ली तो हम तो सौ प्रतिशत काम से गये। तुरंत भगवन किसी प्राइवेट बैंक का लोन लेने के लिये समझाने वाले एजेंट की तरह मिठास घोलते हुए बोले, “कोई संशय लेकर यहाँ से मत जाओ, पूछो क्या पूछना है।बोले, “निठल्ला“। भगवन ऐसे देख रहे थे जैसे कह रहे हों ये भी कोई नाम हुआ, अच्छा काम क्या करते हो? अगला सवाल था। हमने कहा “चिंतन“, क्या? हमने फिर जोर देकर कहा, “निठल्ला चिंतन“। भगवन किसी नासमझ प्रेमिका जैसे बोले, “वो क्या होता है”? हमने समझाया, “कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा” ये होता है। जनता की तरह भगवन बोले अच्छा जाने दो जैसे कह रहे हों जब निठल्ला चिंतन समझ में नही आया तो भानुमती के कुनबे की बात कैसे समझ में आयेगी।
फिर प्यार से बोले, अच्छा अब हमारे भगवान होने पर यकीन आया कि नही। हाथ जोड़ अपनी सारी हिम्मत जुटा हम बोलें, “क्षमा प्रभु, लेकिन मन में कई संशय हैं”। जैसे?, रहने दो प्रभु मान लिया आप ही हो पालनहार, हमारी इस जंगल से नैय्या पार लगा दो बस। भगवन किसी प्राइवेट बैंक का लोन लेने के लिये समझाने वाले एजेंट की तरह मिठास घोलते हुए बोले, “कोई संशय लेकर यहाँ से मत जाओ, पूछो क्या पूछना है।” हमने हिम्मत कर कहा, अपना विराट स्वरूप मत दिखाईयेगा मैं कोई अर्जुन नही, समझ और झेल नही पाऊंगा।
थोड़ा साहस दिखा मैं फिर से शुरू हुआ, एक बात बताओ भगवन, मस्जिद में औरतों और आदमियों के लिये अलग-अलग स्थान क्यों, उनके लिये समान नियम क्यों नही। अब ये तो उन्ही से पूछो जिसने मस्जिद बनाई मेरा काम तो सिर्फ आदमी बनाना (जन्म देना) और मिटाना (मारना) है, भगवन बोले। अच्छा ये बताईये कि किसी-किसी मंदिर में रजस्वला स्त्री के प्रवेश में प्रतिबंध क्यों? भगवन बोले एक बार कहा ना ये मस्जिद बनाने वाले जाने, मैंने बीच में टोका भगवन मैं मंदिर की बात कर रहा हूँ, दोनों में फर्क है। क्या फर्क है भगवन बोले, दोनों में तुम मुझे ही पूजते हो बावजूद इसके कि मैं ना किसी मंदिर में रहता हूँ ना किसी मस्जिद में।
अब मैं तुम्हारे 33 करोड़ भगवानों का गणित समझ गया
भगवन ने उल्टा सवाल दाग दिया, अच्छा ये बताओ कि एक शहर में कुल मिलाकर कितने मंदिर मस्जिद होंगे? मैंने जवाब दिया सारे धार्मिक स्थल मिला कम से कम 30-40 तो होंगे ज्यादा भी हो सकते हैं। ये सुन भगवन मुस्कराने लगे, मैने इसकी वजह पूछी तो जवाब मिला, “अब मैं तुम्हारे 33 करोड़ भगवानों का गणित समझ गया इसलिये”। बात काट हमने कहा फिर काहे मंदिर के अंदर की मूर्त को इतना सजा के क्यों रखा जाता है जब आप वहाँ नही रहते। तुम खुद सोचो कोई किसी पत्थर के अंदर कैसे रह सकता है, भगवन ने पलट वार किया। हर इंसान के अंदर मेरा भी एक अंश रहता है लेकिन उसे कोई नही ढूंढता, तुमने जो राम कृष्ण गिनाये थे वो क्या पत्थर से निकले थे।
मैंने कहा नही, बात में वजन था, सोचने लगा बात तो सही है वो भी हमारी ही तरह इंसान थे और अंत में इंसानों की तरह मृत्यु को प्राप्त हुए अब भला भगवान कैसे मर सकते हैं। कैसे भला एक बहलिया एक तीर से भगवान को मार सकता है, भगवान की संतान भी भगवान होनी चाहिये फिर लव-कुश को काहे लोग नही पूजते। भगवान के माँ-बाप भी भगवान होने चाहिये फिर दशरथ सिर्फ एक राजा बनके क्यों रह गये इतिहास के पन्नों पर। मैं खुद ही अपने सवालों में उलझने लगा था।
सामने रोड दिखायी देने लगी थी यानि कि मैं फिर सही रास्ते पर आने वाला था। रोड पर पहुँच मैं किसी गाड़ी का इंतजार करने लगा। दूर से एक गाड़ी आ रही थी, सोचा जब तक गाड़ी पास आती है क्यों ना एक सवाल और दाग दिया जाय। अच्छा प्रभु ये बताईये कि यहाँ इंसान एक दूसरे के खून के प्यासे क्यों हो रहे हैं, आतंकवाद, धार्मिक उन्माद, भूकंप, बाढ़, प्राकृतिक आपदायें ये सब क्यों? सुख और खुशी के साथ सब मिलकर क्यों नही रहते? भगवन बोले, “बेवकूफ अगर ये सब ठीक कर दिया तो धरती स्वर्ग ना हो जायेगी, जब कोई दुख ही नही रहेगा तो फिर मुझे कौन पूछेगा“।
मुझे अपने को बेवकूफ कहे जाने पर बड़ा गुस्सा आया, जंगल निकल चुका था अब इतना डर भी नही था इसलिये नाराजगी दिखाने के लिये पीछे मुड़ा तो देखा वहाँ कोई नही। जो इतनी देर से अपने को भगवान बता रहा था उसका दूर-दूर तक कोई पता नही। सिर्फ जंगल दिखायी दे रहा था, अपनी तो खोपड़ी ही घूम गई तभी बस वाले ने जोर से होर्न बजाया, मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। घड़ी का अलार्म बज रहा था, 7 बज गये थे यानि कि काम पर जाने का वक्त हो गया था। मैं आंखे मलता बाथरूम की ओर चल दिया। पड़ोस से कहीं गाने की आवाज आ रही थी
मांगों का सिंदूर ना छूटे, माँ बहनों की आस ना टूटे,
देह बिना भटके ना प्राण, सबको सन्मति दे भगवान।
ओ सारे जग के रखवाले, निर्बल को बल देने वाले,
बलवानों को दे दे ज्ञान, सबको सन्मति दे भगवान।।
मैं तैयार हो आफिस को चल दिया, रास्ते में हर आदमी को गौर से देखता जा रहा था सोच रहा था आज से सबके साथ प्यार से पेश आना है, सबको इज्जत देनी है क्योंकि किसे क्या पता ना जाने किस भेष में नारायण मिल जाय।
[ये आलेख अभिव्यक्ति में पूर्व प्रकाशित हो चुका है।]



‘भगवन ने पलट वार किया। हर इंसान के अंदर मेरा भी एक अंश रहता है लेकिन उसे कोई नही ढूंढता’
‘सबको इज्जत देनी है क्योंकि किसे क्या पता ना जाने किस भेष में नारायण मिल जाय।’
दोनों में विरोधाभास है भाई।
सही है। बधाई!भगवान से मुलाकात की।
चलिए भगवान् का दिया हुआ ज्ञान हमें भी मिल गया… आपकी तो अब भगवान् से मुलाकात होती ही रहेगी … फिर कभी मुलाकात हो तो हमारी पैरवी कर दीजियेगा…
क्या करुँ अर्जुन नहीं हूँ !
@द्विवेदीजी, विरोधाभास कहाँ है, पहले वाला भगवान का कहना है वो भी ख्वाब में, दूसरा इंसान का सोचना है ख्वाब टूटने के बाद और होता दोनों में से कुछ नही है।
@अनुप जी धन्यवाद
@अभिषेक, पैरवी करानी है तो द्विदेदी जो को पकड़ो, अच्छी जिरह कर पायेंगे कानून सिखा जो रहे हैं हम सबको
अब गुरुद्वारों ….ओर चर्च का भगवान् ने जिक्र नही किया ….शायद उनके दिमाग से निकल गया होगा…..पर चलिए कुछ आत्मज्ञान भी जरूरी है…….एक वाजिब सवाल पूछना भूल गए आप ….
की गुनाहों के हिसाब का मामला कुछ ग़लत नही हो रहा है ?
ये कड़ी भी शानदार!
भगवान ने संशय दूर कर दिए.
हम अभिव्यक्ति में पूर्व पठन कर चुके हैं अत: बधाई!!
अच्छा प्रयास रहा तरुण जी ~~
ईश्वर / भगवान स्त्री हैँ या पुरुष ?
- लावण्या
धत्.. भगवान सपने में मिले थे.. हम तो सचमुच का मान बैठे थे
हंसी-हंसी में आपने बहुत ही शिक्षाप्रद बात कही है। काश यह सभी लोग समझ पाते। धन्यवाद।
@अनुरागजी, शायद आपने ध्यान से नही पढ़ा, भगवान उत्तर उन्ही बातों का दे रहे थे जो पूछा जा रहा था, हमने सिर्फ मंदिर मस्जिद की बात चलायी, उन्होंने उसकी ही बात करी। रहा सवाल वाजिब सवालों का तो ऐसे ना जाने कितने सवाल हैं जो पूछने से रह गये, क्या करें रास्ता जो इतनी जल्दी मिल गया। लेकिन अगली मुलाकात में जरूरत याद रखेंगे।
@शिव भाई, समीरजी, धन्यवाद
@लावण्या जी, आपके सवाल का जवाब तो पिछली कड़ी में ही दे दिया था, लेकिन आपके लिये एक बार और बता देते हैं -
मैं एक ही हूँ, मैं ही हूँ जिसे तुम भगवान या खुदा कह रहे हो, मैं ही प्रारंभ मैं ही अंत। मैं ही नारी मैं ही पुरूष, मेरा कोई रूप नही मैं हूँ निराकार। मैं ही हूँ शक्ति पुंज, अंनत शक्तियों का संगम।
@अशोकजी, जो बात कहना चाह रहा था वो आप तो समझ ही गये, धन्यवाद
सही कहे हो, न जाने किस भेष में नारायण मिल जाएँ!
बडी जबरदस्त मुलाकात रही। शुरू में बात जितनी हल्की फुल्की और मजाकिया लहज में थी, अंत तक आते आते वह गम्भीर हो गयी। वैसे यह मुलाकात बहुत कुछ कह गयी। बधाई।