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‘ना माया से ना शक्ति से भगवन मिलते हैं भक्ति से’, एक खुबसूरत गीत है और इसको सुनने के बाद लगा कि अगर मिलते होते तो भी प्रभु हमको मिलने से रहते। क्योंकि माया हमे वैसे ही नही आती, शक्ति हममें इतनी है नही और भक्ति हम करते नही, तो कुल जमा अपना चांस हुआ सिफर। लेकिन वो कहते हैं ना कि बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले ना भीख तो एक दिन बिन बुलाय मेहमान से भगवान हम से टकर ही गये। अब इससे आगे का हाल अति धार्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत सज्जन और देवियां ना पढ़ें, इसको पढ़कर आपके मन के क्षीरसागर में उठने वाले तूफान के हम जिम्मेदार नही होंगे और हमें गालियां देने को उठने वाले उफान के आप खुद जिम्मेदार होंगेफिर लगा 33 कहने में मुँह तो नही खुलता। इसलिये थोड़ा हिलाया, भगवान जैसे नींद से जागें हों बोले अच्छा गिनाओ। अब चित होने की बारी हमारी थी हमें तो जैसे सांप सूँघ गया

भयानक रात में ट्रैक से लौटते हुए जंगल में जब रास्ता भटक गये तो ऐसी परेशानी में हमेशा की तरह अपने खुदा को सोते से जगाने की गुहार लगायी और तभी एक आदमी हमें दिख गया। साधारण से कपड़े पहने थे उसने, एक दो जगह से हवा आने के लिये कपड़ों में बनायी खिड़कियां भी नजर आ रही थी। मिलते ही हमने कहा, भैय्या हम रास्ता भटक गये हैं सही रास्ते पर कैसे आयें पता हो तो जरा बता दो। वो आदमी बोला ठीक है तुम मेरे पीछे-पीछे चलो तुम्हें रास्ता अपने आप मिल जायेगा। उत्सुकता वश जंगल पार करते करते टाईम पास करने की गरज से या अंधेरी रात के सन्नाटे से उठने वाले अपने मन के डर को कम करने के लिये हमने पूछ लिया वो कौन है और इस जंगल में रात के वक्त क्या कर रहा है। आदमी बोला, “मैं भगवान हूँ” और यहाँ शांति के साथ आराम करने आया हूँ, हमें तुरंत महाभारत के समय की याद आ गई (याद है मैं समय हूँ) लेकिन हम पूछ ही बैठे, “शांतिजी दिखायीं नही दे रही”। आदमी यानि कि भगवान थोड़ा सकपकाये फिर बोले, मेरा मतलब मन की शांति से है। हमने भी तू शेर तो मैं सवा शेर की तर्ज पर एक और सवाल पूछ लिया, “तो कौन से भगवान हो?” अगर शिव हो तो ये कपड़े क्यों पहने हैं, ना सांप ना अर्धचन्द्र ना भस्म और तो और गंगा भी नही दिखायीं दे रही। और अगर विष्णु तो ये साधारण से वस्त्र क्यों? ना मुकुट ना गहने बगैर शेषनाग कैसे और ब्रहमा हो तो पैदल क्यों? कमल कहाँ है? बोले ये लोग कौन हैं? मैंने कहा, बड़े पहुँचे हुए भगवान हैं, भगवन बोले लेकिन मैं तो एक ही हूँ ये कैसे हो सकता है। ये ही नही अपने यहाँ तो सुनते हैं 33 करोड़ देवी देवता हैं जिन्हें हम भगवान कहते हैं, कहने की बारी हमारी थी। हमारी बात सुन भगवान का मुँह खुला का खुला, हमने सोचा हमारी द्रोपदी की तरह लाज बचाने वाला कोई नही था अपनी इज्जत खुद ही बचानी थी बात दोहरा रहे हों, फिर लगा 33 कहने में मुँह तो नही खुलता। इसलिये थोड़ा हिलाया, भगवान जैसे नींद से जागें हों बोले अच्छा गिनाओ। अब चित होने की बारी हमारी थी हमें तो जैसे सांप सूँघ गया।

अभिमन्यू की तरह चक्रव्यूह में घूस तो गये अब निकले कैसे ये सूझ नही रहा था। 33 करोड़ सुना था, कौन हैं ये तो अपने फरिश्तों को भी शायद ही मालूम हो। द्रोपदी की तरह लाज बचाने वाला कोई नही था अपनी इज्जत खुद ही बचानी थी सो हिम्मत कर गिनती शुरू करी। लेकिन 25 से ऊपर जाने के वांदे दिखने लगे (हालत खराब होने लगी) फिर बड़ी कोशिश कर गंगा, जमुना, सरस्वती जैसी नदियाँ और चंद्र, मंगल, सूर्य जैसे ग्रह जोड़ संख्या किसी तरह 40 तक पहुँचायी। फिर सोचा दक्षिण में लोग फिल्मी हिरोईनों के भी मंदिर बना देते हैं क्यों ना उनकी भी गिनती कर ली जाय लेकिन अंदर से हमें लग गया था कि अपने पूर्वजों के साथ-साथ दुनिया की प्रमुख हस्तियां भी गिनवायेंगे तो भी शायद ही 33 करोड़ का टच डाउन कर पायें। हम उस घड़ी को कोस रहे थे जब किसी ने हमें 33 करोड़ देवी देवता होने की बात बतायी थी।
दिल इतने जोर से धड़कने लगा जैसे सैकड़ों मलिक्का शेरावत सामने आ खड़ी हों
नेताओं की देखा देखी बात बदलने की गरज से हमने दूसरा मुद्दा छेड़ दिया। हमने पूछा, अच्छा ये बतायें कि खुदा से रोज मुलाकात होती रहती है या आप लोगों का भी वही रिश्ता है जो आप लोगों के बंदों का यानि मैं बड़ा, मैं बड़ा। हमारे खुदा का मतलब विस्तार से समझाने के पश्चात भगवन नाराजगी भरे शब्दों में बोले, “मैने कहा ना मैं एक हूँ”। हमने नहले पर दहला मारते हुए तुरंत कहा, “जरा ठीक ये याद कर लीजिये हो सकता है कुंभ के मेले में आप लोग बिछुड़ गये हों”।

ये सुन भगवन की भृकुटी तन गयी, अपनी हालत उस मेमने की तरह हो गयी जिसने अचानक शेर देख लिया हो, बदकिस्मती ऐसी कि अपने भगवान को भी याद नही कर सकते थे डर था कि कहीं ये आग में घी का काम ना कर दे। तभी गरजती सी आवाज सुनायी दी जैसे कोई नेता सरकार की पतलून उतारने के लिये या जनता से वोट मांगने के लिये गरजता है, ‘मैं एक ही हूँ, मैं ही हूँ जिसे तुम भगवान या खुदा कह रहे हो, मैं ही प्रारंभ मैं ही अंत। मैं ही नारी मैं ही पुरूष, मेरा कोई रूप नही मैं हूँ निराकार। मैं ही हूँ शक्ति पुंज, अंनत शक्तियों का संगम।” अपनी सिटीपिटी गुम, दिल इतने जोर से धड़कने लगा जैसे सैकड़ों मलिक्का शेरावत सामने आ खड़ी हों लेकिन मन में कहीं अपने अर्जुन होने का एहसास हो रहा था।

क्रमशः (आगे अगली पोस्ट में पढ़ियेगा अंतिम भाग)……

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