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मैंने कई बार इस देश और इस देश के वाशिंदो (हमें भी गिना जाये) पर संशय किया है, उनके धर्मनिरपेक्ष होने और उनकी धर्मनिरपेक्षता पर सवाल उठाये। लेकिन आज इस खबर को पढ़कर मुझे लगा कि मेरी इस सोच को पुनर्विचार की जरूरत है। क्या अब हम वाकई सही मायनों में धर्मनिरपेक्षता की मिसाल कहे जा सकते हैं? कैसे, देखिये -

गुजरात में मुसलमानों (यदा कदा हिंदू), जम्मू काश्मीर में हिंदुओं (यदा कदा मुसलमान) और उड़ीसा में ईसाईयों (यदा कदा अभी होना है) का मारा जाना/जलाया जाना/काटा जाना क्या इस ओर इशारा नही करता

नई ईबारतः छोटे थे तब ये पढ़ा सुना था -

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई
आपस में है भाई भाई।

वक्त ने करवट ली, सियासत पसंदों ने अंगड़ाई, आपस का प्यार और सोचने का ढंग बदला। आज जब भाई भाई के आपस में झगड़ने की खबरें आम होने लगी है तो क्या इस ईबारत को कुछ ऐसे लिखा जा सकता है -

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई
देखो आपस में लड़ मरे भाई।

एक सवालः सियासत कट्टरता को तानाशाही कह सकते हैं, धार्मिक कट्टरता को क्या कहेंगे?

संबन्धित कड़ियाँ:

  • भस्मासुर को मिला वरदान है धर्मनिरपेक्षता
  • वो लाश अभी तक रोती है
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