उजाला

हर तरफ फैला उजाला, हर कली खिलने लगी
आई सूरज की किरण, रात घर चलने लगी।

पंछी जो सब चुप थे अब तक, सहसा चहचहाने लगे
कहीं शोर बच्चों का है तो, कहीं गीत बजने लगे।

अब भी कुछ ऐसी जगह हैं, जहाँ रहता हरदम अंधेरा
गोलियों के शोर के बीच, सिसकियाँ लेता सवेरा।

पंछी वहाँ मिलते नही हैं, बचपन बच्चों में नहीं है
खून की नदियां है बहती, लाशों की कुछ गिनती नहीं है।

आ ‘तरूण’ दे दें उन्हें भी, अपने हिस्से की एक किरण
चारों तरफ तब हो उजाला, आये जब अगली किरण।

शब्‍दांजलि के अक्‍टूबर 2005 अंक में पूर्व प्रकाशित, निठल्ला चिंतन में भी पूर्व प्रकाशित।

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Tarun
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6 Responses to “ उजाला ”

  1. Beautiful words

    गोलियों की शोर के बीच, सिसकियाँ लेता सवेरा।

  2. सुबह की सुंदर अभिव्यक्ति है।

  3. निट्ठल्ला चिन्तन तो सुन्दर है
    - अफलातून

  4. वाह! गोपालदास नीरज जी की कविता की याद आने लगी। ओजस्वी लिखा है।

  5. ऐसा उजाला आए तो फिर हम भी नहा लें इस किरण में !

    मिलाना पक्का तरुणजी इस गुरूवार को! समय जल्दी ही बताता हूँ.

  6. Tarun ji ekdam gahara chintan hai tabhi to aapki har rachna padne is man karta hai bahut achcha

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