शबाना जी, तेरा मेरा दर्द ना जाने कोई
शबाना आजमी और इनके हमनिवाला और हमप्याला शौहर जावेद अख्तर किसी परिचय के मोहताज नही, ना ही इनके साहेबजादे लख्ते-जिगर फरहान अख्तर को इसकी जरूरत है। इसलिये बजाय इनका परिचय देने के सीधे मुदद्दे पर आते हैं।
शबाना आजमी पूर्व सांसद तो हैं ही, साथ में अच्छी अदाकारा भी हैं और समाज सेवी भी, ये धर्मनिरपेक्ष हैं इसलिये बिंदास कह सकती हैं कि ये मुसलमान हैं इसलिये इन्हें और इनके पति को मुम्बई में नया मकान नही मिल रहा, यही नही इनका तो ये तक कहना है कि इन्होंने किसी रिपोर्ट में पढ़ा था कि छोटे नवाब सैफ अली खान को भी मकान नही मिल रहा। [Dawn: Religion a hurdle in Shabana's bid to find a house in Mumbai]
“भस्मासुर को मिला वरदान है धर्मनिरपेक्षता” लिखकर हम भी धर्मनिरपेक्ष हैं, ये दंभ तो हम नही भर सकते, लेकिन एक अदद मकान को लेकर दिल्ली वालों को गाली तो दे ही सकते हैं। भले ही ये बात किसी IBN नामके चैनल में किसी इंटरव्यू में ना कह पायें अपने ब्लोग में तो कह ही सकते हैं, यहाँ तो सिंह भी हम हैं और किंग भी।
यहाँ तो सिंह भी हम हैं और किंग भी
बात “Once upon a time, there was a king” टाईप की है, जब हम “छोटे छोटे शहरों से देखो भरी दुपहरी में हम तो झोला उठा के चले” गाते हुए दिल्ली की गाड़ी पकड़ दिल वालों के इस शहर आ गये। ये तो यहाँ आकर पता चला कि “दिल वालों की दिल्ली” तो सिर्फ विज्ञापन का एक जुमला था हकीकत में तो ये जालिमों से भरी पड़ी है। यहाँ की जनता तो मुम्बई से भी दो हाथ आगे थी, मकान देना है या नही ये डिसाइड करने के लिये दिल्ली वाले मुम्बई वालों की तरह धर्म तक तो जाते ही नही थे।
शक्ल देखकर ही ये दिल्ली वाले सब सूँघ जाते थे, और अगर आप शक्ल से लड़के कम आदमी ज्यादा नजर आते थे तब एक सवाल हवा में गूँजता था, आप मुहँ से “हाँ” की करतल ध्वनि निकालते और मालिक मकान “ना” कहके उस करतल ध्वनि को तीतर-बीतर कर देता।
हमें भी बहुत लोगों ने कमरा देने से मना कर दिया, कमबख्त दिल्ली वालों ने ये जानने तक कि कोशिश ही नही की कि हमारा धर्म क्या है। हमें तो आज तक नही पता कि धर्म सवालों की श्रृंखला में किस नंबर पर आता था, शक्ल से शक होने पर उन सबका पहला सवाल होता था “छड़े हो” (मतलब कुँवारे), जहाँ हमने कहा, “हाँ, तभी तो सामने खड़े हैं” बस वैसे ही “ना” की कर्कश ध्वनि सुनायी पड़ती और फटाक से दरवाजा मुहँ में बंद। जैसे कि हम ही वो नारीभक्षी थे जिसकी कहानी सुना सुनाकर इन लोगों ने अपनी बिटियाओं को घर से बाहर नही निकलने दिया था।
वो तो भला हो जो हमें, छड़ों के मोहल्ले का पता चल गया (बेर सराय, जिया सराय - IIT से JNU के बीच में बसे इन दोनों जगहों में वो सभी छड़े रहते थे जिनमें ज्यादातर स्टूडेंट होते थे और बाकि हम जैसे लोग)। ऐसे वक्त में जब हमें सहारे के लिये इस अंजान शहर में किसी “छड़ी” की जरूरत थी, हमें रोज छड़े ही नजर आते थे। या फिर वो सूखे ठूँठ जिन्हें हम लोग प्यार से ताऊ कहके संबोधित करते थे, जो खटिया डाले मकान के आगे पड़े होते थे और सिर्फ पहली तारीख को हिलते नजर आते थे जब किराया लेने के लिये हमारे दरवाजे के आगे उनके दर्शन होते थे।
हमारा भी बड़ा मन करता था कि संजीव कुमार की तरह हमें भी गुनगुनाने का मौका मिले, “छड़ी रे छड़ी कैसी गले में पड़ी” लेकिन वाह री किस्मत रोज रात में आसमान को निहारते हुए सिर्फ यही गुनगुना पाते थे, “लाखों तारे आसमान में, एक मगर ढूँढे ना मिला“।
लेकिन हमने भी पहाड़ के नौले-नौले का पानी पिया हुआ था (नौला यानि पानी का प्राकृतिक स्रोत) इतनी जल्दी हार मानने वाले नही थे, हमें जैसे ही पता चला कि इस दुनिया के दूसरे छोर में कोई अमेरिका नाम का देश है जहाँ मकान देने के लिये ना ये पूछते हैं कि तुम छड़े हो कि नही और ना ही पूछते हैं कि किस धर्म के हो, हमने चुपचाप से हवाई जहाज पकड़ा और यहाँ इंसानों के बीच (जहाँ छड़े, छड़ी सभी एक ही घाट में रहते हुए एक साथ पानी पीते हैं) आ मकान किराये पर ले लिया। तब से काफी बक्त गुजर गया है, आराम से जीवन बसर चल रहा है।
अपने अनुभव से शबाना जी, आप से इतना ही कह सकते हैं कि अगर ये नामुराद मुम्बई वाले आपको नया घर नही दे रहे तो इनको मारिये लात और जरा पड़ोसी मुल्क में पता करिये कि आपको एक मकान दे सकते हैं क्या। और अगर वो कहते हैं हाँ तो बस आप भी निकल लीजिये और आराम से जीवन बसर कीजिये। और अगर वो कहते हैं ना तो हम सिर्फ अफसोस ही प्रकट कर सकते हैं क्यों कि उन्हें आप ये भी नही कह सकती कि आप मुसलमान हैं इसलिये आपको नया मकान नही मिल रहा।
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This post has 14 comments
August 20th, 2008
अजी हमारा तो जयपुर में ही यही हाल हुआ.. बिना धर्म पूछे ही चलता कर दिया.. हालाँकि इस बीच कुछ मकान मालिको की आवाज़ दब गयी.. वो कहते थे की हम मुसलमान है इसलिए हमको किरायेदार नही मिला..
August 20th, 2008
I liked this “यहाँ तो सिंह भी हम हैं और किंग भी” and I think she is reaching fast to that age when people start talking non-sense
August 20th, 2008
शबाना और जावेद साहब , हरेकृष्ण मँदिर है वहाँ के इलाके के पास ही एक मकान के फ्लेट मेँ रहते हैँ ~~
( i know this as my Saheli lives there too )
अब क्या वे नया घर तलाश रहीँ हैँ ?
- लावण्या
August 20th, 2008
कुँआरेपन का यह अभिषाप तो हमने भी भूगता है. मगर शिकायत कैसे करते मुसलमान नहीं है ना
थक हार कर शादी कर ली 
August 20th, 2008
हे भगवान कितना दर्द है शबाना जी की बातो मे ,सच मे इन्होने कई लोगो के मकान को किराये पर लेना चाहा था लेकिन कमबख्त मकान मालिक खाली ही नही कर रहा था .
August 20th, 2008
वाकई बड़ा दर्द है उनकी बातो में आप समझ नही रहे ….हमारे भतीजे को नॉएडा में कोई माकन नही दे रहा की तुम यार लड़के लोग कुंआरे हो ,कालोनी के लोग ऐतराज करेगे….हमें भी गाड़ी के लोन के लिए एक बैंक ने मन कर दिया था …IBN तो दूर कोई लोकल newspaper वाला भी इंटरव्यू के लिए नही फटका …..फरहान …जोया बेचारे कहाँ रह रहे इतने दिनों से ?
August 20th, 2008
तरूण जी, भाई साहब ये देश धर्मनिरपेक्ष है, यहाँ केवल धर्मनिरपेक्ष लोगों को धर्म पर बोलने का अधिकार है। आप यदि कुछ बोलेगें तो सामप्रदयिक कहलायेगें। मेरी सलाह माने तो आप ‘शबाना आजमी ‘ से अपनी की गई ख़ता के लिये क्षमा याचना कर लें। आपका दोस्त - शम्भु चौधरी
August 20th, 2008
शबाना जी को आपने बड़ी नेक सलाह दी है। लेकिन मेरा दावा है कि वे नहीं मानेंगी क्योंकि पड़ोसी मुल्क में सेकुलरिज्म की दुकान तो चलने से रही
August 20th, 2008
सब जबलपुर चले आओ, मकान हम दिलवा देंगे बिना धर्म पूछे!! हद है भइ!!
August 21st, 2008
चेन्नई आकर झांक जाओ.. यहां अधिकतर जगहों पर ब्राह्मण से कम पर लोग नहीं मानते..
अब ब्राह्मण ना होते हुये भी हम कैसे घर ढूंढे उसकी कहानी आप यहां पढ सकते हैं..
http://prashant7aug.blogspot.com/2008/08/blog-post_05.html
August 21st, 2008
Arrey, 1-2 Avenue upar hain bol ke bhaag aaye. Kuchh detail mein bataiye kahan hain to milne ka program banaaya jaay !
August 21st, 2008
चलो शुक्र है कि मुझे पर्सनली ये किराए के मकान को पाने की जद्दोजहद नहीं करनी पड़ी है, हैं तो अपन भी छड़े ही फिलहाल!
August 24th, 2008
अब मुंह ना ही खुलवाएं तो अच्छा है, नहीं तो दुनिया जानती है कि किसने बेचारी हनी इरानी का बसा-बसाया घर खाली करवा कर ————!!!!!!!!
January 5th, 2009
अरे सबाना जी के दरद के बारे मैं बहुतै गज़ब लिखे हौ भैया.
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