वो लाश अभी तक रोती है
सोचा था इन बम धमाकों पर अभी कुछ नही लिखूँगा, जाहिर था अंदर का आक्रोश शब्दों को सही शक्ल नही लेने देगा लेकिन फिर……………। अपने को इस आदमी की जगह रखकर पढ़के देखिये -
वो बीस हजार कमाता था,
घर पर राशन पानी लाता था।
जैसे तैसे भी करके वो,
घर का खर्च चलाता था।
आफिस से घर पर आ कर,
लड़के को रोज पढ़ाता था।
रात जब भी घिर आती,
लड़की को लोरी गा सुलाता था।
दिवाली पर पटाखे लाता,
बच्चों को मेला घुमाता था।
आफिस से छुट्टी ले कर,
माँ-बाप को तीर्थ कराता था।
एक रोज फिर से वो घर आया,
सबने उसको चादर में लिपटा पाया।
ना राशन पानी साथ में था,
ना बच्चों को वो बुला पाया।
एक धमाके ने घर की,
सारी तस्वीर बदल रख डाली।
सुहाग किसी का लूटा,
और सारी खुशियाँ छीन डाली।
फिर घर में कुछ नेता आये,
झूठे आँसू आँख में लाये।
मीडिया का भी कैमरा चमका,
जिससे चैनल पे अपने, वो ये मंजर दिखा पाये।
सरकार ने फिर वही काम किया,
हर मृतक को रूपया लाख दिया।
चंद वोट पाने की खातिर,
ढुलमुल नीति से काम लिया।
‘तरूण‘ सभी तब उग्र हुए,
कुछ ने दोनों के पक्ष लिये।
जो तन लागी वो ही जाने,
क्या जख्म मिले, क्या घाव सिये।
दिन बीते, फिर साल गये
वो बच्ची अब खुद सोती है।
अपने घर की हालत को देख,
वो लाश अभी तक रोती है।

….. bahut badiya rchna….. sochne pr vivash kr diya….
good poem, it has real exprssion of expression ,keep it up
देश जिस दौर से गुज़र रहा है, उसमे उम्मीद का दामन कस के थाम कर ही जिया जा सकता है. वक्त बुरा है, और हर शै से नाउम्मीदी ही मिल रही है. फिर भी हताश नहीं होता हूं, क्योंकि मुझे विश्वास है — There’s something called natural justice.
vakai bhut bhavuk rachana. kya kahe yhi aajkal ho rha hai.
बहुत ही मार्मिक किंतु एक नगन सत्य को बयां किया इस कविता के माध्यम से.
यह दर्द ब्यान करती है उस हालत का जो शायद अब सच बनता जा रहा है
बहुत भावनात्मक प्रस्तुति. मार्मिक!!
बहुत लम्बे समय तक रोना है इस लाश को! और कोई अन्त नजर नहीं आता।
बहुत अच्छी कविता लिखी है तरुण। हम सब जो भी बोलें जिनके परिवार के लोग गए हैं या घायल हुए हैं वे ही समझ सकते हैं कि आतंक क्या होता है। बीमारी या दुर्घटना को स्वीकार किया जा सकता है परन्तु इस प्रकार से जानबूझकर अनजान लोगों के हाथों मरना कोई भी स्वीकार नहीं कर सकता।
घुघूती बासूती
Tarun bhai aapaki yah kavita padhkar aakho se aasu aagaye is kavita ne to dill chir ke rakh diya
Tarun bhai aapaki yah kavita padhkar aakho se aasu aagaye is kavita ne to dill chir ke rakh diya aapaki yah kavita vaasatav me hamare dilo me lagi aag hai
यह दर्द तो ऐसा है जिस तन लागे उसे तो है ही…लेकिन हर वह इंसान भी इस दर्द का
भागीदार है जो इस दर्द को महसूस करता है… यही एहसास इंसानियत को मरने न देगा.
[...] कल की लाश का रोना अभी थमा नही है, जिस हिसाब से सूरत में बम मिल रहे हैं उससे वो ही लगता है जो ज्ञान दद्दा फरमा के गये। [...]
‘तरूण‘ सभी तब उग्र हुए,
कुछ ने दोनों के पक्ष लिये।
जो तन लागी वो ही जाने,
क्या जख्म मिले, क्या घाव सिये।
waah tarun bhaiji,,,,chaa gaye ,,,aapto ekdam professional sayar type hoo bhai…bahut hi achcha hai,,,aadmi ka sachche pahalu ko parkha hai..