मसंद, Viewers की पसंद जाने तू या जाने ना

एक व्यक्ति हैं राजीव मसंद जो IBNLive पर फिल्मों की क्रिटिक्सगिरी यानि आलोचना (शायद मुझे समीक्षा कहना चाहिये) करते हैं, वैसे ही जैसे अपने चवन्नी छाप यानि अजय ब्रह्मात्मज (जाने तू अब्बास की जुबानी, इस फिल्म पर छवन्नी की छाप)।

उनके द्वारा समीक्षा की गयी कई फिल्में जिन्हें उन्होंने अच्छा बताया (४ स्टार टाईप) वो हमको झेलनी ही मुश्किल हो गयी (मसलन ओम शांति ओम) और कई फिल्में जिन्हें उन्होंने बकवास करार दिया (१ या २ स्टार टाईप) वो ठीक ठाक या अच्छी लगी। यानि सीधे सीधे पर्सनल च्वाइस का मामला है जबकि मुझे ऐसा लगता है कि एक समीक्षक को किसी भी फिल्म की समीक्षा ऐसे नही करनी चाहिये कि वो पर्सनल च्वाइस का मामला लगे (जैसी समीक्षा हम लोग लिखते हैं अपनी अपनी पसंद के हिसाब से)। हर फिल्म की समीक्षा ब्लैंक स्लेट के ऊपर करनी चाहिये ना कि पहले से ही कुछ एक्सपेक्टेशन लेकर।

फिल्म की समीक्षा यानि किसी फिल्म को दिये गये स्टार उस फिल्म को पूरा पैकेज समझ कर करनी चाहिये ना कि एक या दो पक्ष देखकर। क्योंकि ज्यादातर जनता इन्हीं समीक्षा को पढ़कर फिल्में देखने जाती हैं और जरा सी भी गलत समीक्षा से किसी की मेहनत पर पानी फिर सकता है।

अब आप सोच रहे होंगे कि अचानक मैं ये क्या कह रहा हूँ, दरअसल अभी अभी एक फिल्म रीलिज हुई है जिसका नाम है - जाने तू या जाने ना। इस फिल्म के ट्रेलर और आमिर और अब्बास टायरवाला के जुड़े होने से कम से कम ऐसा आभास था कि फिल्म अच्छी होगी, तो इस फिल्म के बारे में जानने के लिये रीलिज होने के बाद हम जा पहुँचे समीक्षाओं की खोज में। शुक्रवार के दिन IBNLive पर कुछ नही मिला तो याहू पर जाकर देखा, वहाँ सभी लोगों (आम जनता) ने फिल्म को बहुत अच्छा बताया था। फिर एक दो लोगों से और सुनने को मिला कि फिल्म अच्छी है।

लेकिन उसके बाद आज हम जा पहुँचे मसंद की पसंद देखने और यहीं लोचा हो गया, जिसको देखकर कई बार मुझे ऐसा लगता है फिल्मों को स्टार इसके स्टार देख कर दिये जाते हैं पढ़कर हमें ये कहना पड़ रहा है - जाने तू या जाने ना। पहले तो ऐसा लगा कि हम फिल्म की नही बल्कि अब्बास टायरवाला की समीक्षा पढ़ रहे हैं फिर जब फिल्म के बार में थोड़ा विस्तार से पढ़ने को मिला तो फिल्म की कहानी साधारण और जानी पहचानी (predictable Bollywood love story) सी बतायी गयी, इसमें ऐसा कुछ नया तो नही है क्योंकि ज्यादातर फिल्में ऐसी ही होती हैं जो थोड़ा अलग होती हैं वो किसी की कॉपी। खैर, कहानी को छोड़ दिया जाय तो फिर उन्होंने कहा कि सब कुछ ताजा तरीन है।

Silliness aside, at its heart, Jaane Tu Ya Jaane Na is a refreshing film. Refreshing because of its spectacular performances. Refreshing because of A R Rahman’s outstanding soundtrack. Refreshing because the film’s actors look like they actually enjoyed making this film. And refreshing because sitting there watching the film, you can’t help feeling very old.

उसके बाद नानुकुर करते हुए थोड़ा और तारीफ पेली फिर Verdict दे दिया कि सामान्य से थोड़ा ऊपर की फिल्म है और 5 में से 2 स्टार दे दिये। इन समीक्षकों को पढ़कर कई बार मुझे ऐसा लगता है फिल्मों को स्टार इसके स्टार देख कर दिये जाते हैं, मसलन शाहरूख फिल्म में हैं तो इसके 2 स्टार, अच्छा जौहर या चोपड़ा कैंप की फिल्म है इसका 1 स्टार, रानी, ऐश्वर्या टाईप हिरोईन हैं 1 स्टार इसका और 1 स्टार फिल्म का यानि टोटल हो गये 4 या 5 स्टार

खैर स्टार देखकर उपजी हताशा को छुपाने के लिये हमने उनकी लिखी समीक्षा के ऊपर मिले कमेंट पढ़ने शुरू किये और अईला सभी लोग समीक्षा के Dead against। समीक्षा से ज्यादा मजा उस पर मिले कमेंट पढ़कर आ रहा था। एक बानगी देखिये -

But I was really surprised, you review sounded like it was Abbas Tyrewala’s performance appraisal and you were a hard headed boss who is not goin to give him credit no mater what.

जबकि इस बात से हम भी इत्तेफाक रखते हैं -

As for you Rajeev, the only reason why we like your reviews is because they arent biased or illogical, but in this instance, I must admit I am very dissappointed, and am bit curious to know your justification on this review..hopefully you have one

वहीं इस बात से भी इन्कार नही करते -

Hey Rajeev, you are giving false reports man. For many films you gave 1 or 2 stars and later they became hits. Please give better reviews

यानि जो आम जनता (Viewers) को पसंद आया या आ रहा था, वो मसंद (क्रिटिक्स) को नही इसलिये हमें ये कहने का मन किया - मसंद, Viewers की पसंद जाने तू या जाने ना

[इसके बावजूद, राजीव मसंद की लिखी समीक्षा हम पहले भी पढ़ते थे और आगे भी पढ़ेंगे, ये फिल्म हमने अभी देखी नही है लेकिन देखेंगे जरूर।]

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Tarun
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2 Responses to “ मसंद, Viewers की पसंद जाने तू या जाने ना ”

  1. बाकी पोस्ट तो हमारे लिये आउट आफ कोर्स है। पर “क्रिटिक्सगिरी” हमें मस्तेस्ट (मोस्ट मस्त) शब्द लगा। हमारे ख्याल से हिन्दी के शुद्धतावादियों को अंगूठा दिखाने को ऐसे शब्दों की सतत रचना करनी चाहिये। अन्यथा ब्लॉगरी पर साहित्य वाले सदा चड्डी गांठने का यत्न करते रहेंगे।

  2. वहां तो बहुत टिप्पणी आ रही हैं लेकिन इहां काहे कम हैं जी? लेख तो मजेदार है।

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