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मैं तब अल्मोड़ा में था जब गुलाम अली का ये एलबम निकला था, लाला बाजार में घूमते हुए अक्सर इसकी एक गजल जो सुनायी पड़ती थी, वो थी - एक पगली मेरा नाम जो ले, शरमाये भी, घबराये भी। तब गुलाम अली की गजलें मुझे इतनी पसंद नही थी लेकिन फिर भी ना जाने क्यूँ तब ये गजल बहुत पसंद आयी और इस एक गजल के लिये मैने वो एलबम खरीद ही लिया। उस गजल एलबम का नाम था - हसीन लम्हें, आज गीत और संगीत में इसी दिलकश गजल का लुत्फ उठाते हैं।

एक पगली मेरा नाम जो ले, शरमाये भी, घबराये भी
गलियों गलियों मुझसे मिलने, आये भी घबराये भी।

रात गये घर जाने वाली, गुमशुम लड़की राहों में
अपनी उलझी जुल्फों को, सुलझाये भी घबराये भी।

कौन बिछड़ कर फिर लौटेगा, क्यों आवारा फिरते हो
रातों को एक चाँद मुझे, समझायें भी घबराये भी।

आने वाली रूत का कितना खौफ है उसकी आँखों में
जाने वाला दूर से हाथ हिलाये भी घबराये भी।

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नोटः निठल्ला चिंतन के होम पेज को भी एक नया कलेवर चढ़ाया है, एक नजर जरूर देखियेगा, शुक्रिया एडवांस में कबूल फरमायें :)।

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