एक पगली मेरा नाम जो ले, शरमाये भी, घबराये भी
मैं तब अल्मोड़ा में था जब गुलाम अली का ये एलबम निकला था, लाला बाजार में घूमते हुए अक्सर इसकी एक गजल जो सुनायी पड़ती थी, वो थी - एक पगली मेरा नाम जो ले, शरमाये भी, घबराये भी। तब गुलाम अली की गजलें मुझे इतनी पसंद नही थी लेकिन फिर भी ना जाने क्यूँ तब ये गजल बहुत पसंद आयी और इस एक गजल के लिये मैने वो एलबम खरीद ही लिया। उस गजल एलबम का नाम था - हसीन लम्हें, आज गीत और संगीत में इसी दिलकश गजल का लुत्फ उठाते हैं।
एक पगली मेरा नाम जो ले, शरमाये भी, घबराये भी
गलियों गलियों मुझसे मिलने, आये भी घबराये भी।रात गये घर जाने वाली, गुमशुम लड़की राहों में
अपनी उलझी जुल्फों को, सुलझाये भी घबराये भी।कौन बिछड़ कर फिर लौटेगा, क्यों आवारा फिरते हो
रातों को एक चाँद मुझे, समझायें भी घबराये भी।आने वाली रूत का कितना खौफ है उसकी आँखों में
जाने वाला दूर से हाथ हिलाये भी घबराये भी।
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नोटः निठल्ला चिंतन के होम पेज को भी एक नया कलेवर चढ़ाया है, एक नजर जरूर देखियेगा, शुक्रिया एडवांस में कबूल फरमायें :)।
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This post has 9 comments
July 6th, 2008
बहुत मीठी धुन और नाजुक एहसास लिये शब्द !
July 6th, 2008
धांसू है। गीत भी और ये नया कलेवर भी-जिसके लिये एडवांस शुक्रिया दे दिये।
July 6th, 2008
अच्छा लगा, गीत, संगीत दोनों ही।
July 6th, 2008
मस्त गीत और कलेवरम! भैया आप तो जबरदस्त मस्त मानस है!
अब यह देखिये न, अपनी तबियत टनाटन न होने पर भी हम “मस्त-मस्त” कहने को प्रेरित हुये हैं!
July 6th, 2008
बहुत सुंदर ..मीठा मीठा प्यारा गीत है ..सुनवाने के लिए शुक्रिया
July 6th, 2008
सही है! ‘हसीन लम्हे’ नाम की इस सीरीज़ में एक-एक कर के कुल चार अल्बम आए थे. वेस्टन कम्पनी निकाला करती थी इन्हें. अब तो कम्पनी ही बन्द हो गई. आपने यहां उस में से एक ग़ज़ल यहां चढ़ा कर मज़ा बांध दिया.
July 6th, 2008
sundar gajal..aur nya templet bhi khubsurat lag raha hai
July 7th, 2008
sahi main Almora ke Bazar ki yaad hi aa rahi hai…is tarah ka kuch scene mere time pe bhi hua karta tha…thnx for sharing tarun ji
++
July 9th, 2008
not so great.
The lyrics is profound but not the style with which Gulamji has presented it.
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