एक पगली मेरा नाम जो ले, शरमाये भी, घबराये भी

मैं तब अल्मोड़ा में था जब गुलाम अली का ये एलबम निकला था, लाला बाजार में घूमते हुए अक्सर इसकी एक गजल जो सुनायी पड़ती थी, वो थी - एक पगली मेरा नाम जो ले, शरमाये भी, घबराये भी। तब गुलाम अली की गजलें मुझे इतनी पसंद नही थी लेकिन फिर भी ना जाने क्यूँ तब ये गजल बहुत पसंद आयी और इस एक गजल के लिये मैने वो एलबम खरीद ही लिया। उस गजल एलबम का नाम था - हसीन लम्हें, आज गीत और संगीत में इसी दिलकश गजल का लुत्फ उठाते हैं।

एक पगली मेरा नाम जो ले, शरमाये भी, घबराये भी
गलियों गलियों मुझसे मिलने, आये भी घबराये भी।

रात गये घर जाने वाली, गुमशुम लड़की राहों में
अपनी उलझी जुल्फों को, सुलझाये भी घबराये भी।

कौन बिछड़ कर फिर लौटेगा, क्यों आवारा फिरते हो
रातों को एक चाँद मुझे, समझायें भी घबराये भी।

आने वाली रूत का कितना खौफ है उसकी आँखों में
जाने वाला दूर से हाथ हिलाये भी घबराये भी।

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नोटः निठल्ला चिंतन के होम पेज को भी एक नया कलेवर चढ़ाया है, एक नजर जरूर देखियेगा, शुक्रिया एडवांस में कबूल फरमायें :)।

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Tarun
निठल्ला चिन्तन एक आक्रौश है विचारों की आंधी का, एक द्वंद है सच और झूठ का, एक भावना है प्यार की, एक तमन्ना है आकाश छूने की, कुछ कहने की और कुछ अनकही छोड़ देने की; संक्षेप में कहूँ तो ये है थोड़ी मस्ती थोड़ा चिंतन।

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9 Responses to “ एक पगली मेरा नाम जो ले, शरमाये भी, घबराये भी ”

  1. बहुत मीठी धुन और नाजुक एहसास लिये शब्द !

  2. धांसू है। गीत भी और ये नया कलेवर भी-जिसके लिये एडवांस शुक्रिया दे दिये। :)

  3. अच्छा लगा, गीत, संगीत दोनों ही।

  4. मस्त गीत और कलेवरम! भैया आप तो जबरदस्त मस्त मानस है!
    अब यह देखिये न, अपनी तबियत टनाटन न होने पर भी हम “मस्त-मस्त” कहने को प्रेरित हुये हैं! :-)

  5. बहुत सुंदर ..मीठा मीठा प्यारा गीत है ..सुनवाने के लिए शुक्रिया

  6. सही है! ‘हसीन लम्हे’ नाम की इस सीरीज़ में एक-एक कर के कुल चार अल्बम आए थे. वेस्टन कम्पनी निकाला करती थी इन्हें. अब तो कम्पनी ही बन्द हो गई. आपने यहां उस में से एक ग़ज़ल यहां चढ़ा कर मज़ा बांध दिया.

  7. sundar gajal..aur nya templet bhi khubsurat lag raha hai

  8. sahi main Almora ke Bazar ki yaad hi aa rahi hai…is tarah ka kuch scene mere time pe bhi hua karta tha…thnx for sharing tarun ji
    ++

  9. not so great.
    The lyrics is profound but not the style with which Gulamji has presented it.

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