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Teen Pregnancy: इस फर्क का मतलब समाज की रजामंदी नही

मैने पिछली पोस्ट में बताया था कि यहाँ अमेरिका के एक शहर में हाईस्कूल में पढ़ने वाली १६ से १७ साल के बीच की १७ लड़कियों ने आपस में करार किया कि एक साथ Pregnant होते हैं और अब वो १७ लड़कियाँ Pregnant भी हो गयी है। इस घटना ने यहाँ एक नही बहस को जन्म दिया है।

पिछली पोस्ट में तीन टिप्पणियाँ आयीं थी, मुझे लगा था कि अच्छी खासी प्रतिक्रिया होगी लेकिन मेरा अंदाजा गलत निकला। कह नही सकता वजह क्या थी कि प्रतिक्रिया नही मिली, लेकिन सोचने लगा कि क्या हमारी संवेदना मरती जा रही है? वैसे ही जैसे डाक्टर पर एक लाश या सीरियस मरीज को बिमार देख कर भी दर्द नही उमड़ता, जैसे एक फौजी का दिल खून देख कर भी इतना नही पसीजता जितना आम आदमी का। (क्योंकि ये इनके लिये रोज की बात है।) वैसे ही आजकल इस तरह की घटनायें इतनी आम होने लगी हैं कि अब शायद इन बातों का असर कम होने लगा हो। बरहाल वजह जो भी रही हो मैने सोचा क्यों ना उनकी टिप्पणियों का जवाब अलग से पोस्ट में दे दूँ।

ज्ञानदद्दा ने इन्हें लेमिंगो की नयी जमात बतायी, अब ये वाकई में इनकी नयी जमात है कि नही ये तो तभी बता सकते हैं जब पता चले ये “लेमिंगो” भला चीज क्या है। इसलिये ज्ञानजी जरा विस्तार से इनके बारे में बताया जाय।

डा अमर कुमार ने कुछ यूँ लिखा, “अरे ईश्वर ने गर्भ दिया ही है, गर्भधारण के लिये ?
कम उम्र और पकी उम्र का क्या, क्या भारत में लड़कियाँ 15-16 की आयु में माँ नहीं बना दी जातीं ? उनका समाज जब उन्हें नहीं दुत्कार रहा तो हम अपने चश्में को उतार कर ही रख लें तो बेहतर रहेगा

अब अमर जी से मैं इतना ही कहूँगा कि ईश्वर ने बहुत कुछ दिया है बहुत कुछ करने को लेकिन साथ ही इनका कुछ वक्त भी तय किया है। कम उम्र और पकी उम्र के लिये इतना ही कह सकता हूँ कि दूसरों के जलते घर को देखने से इसका फर्क शायद पता ना चले। जहाँ तक भारत की बात है वो आपने खुद ही साफ कर दी है, भारत में लड़कियाँ १५-१६ की आयु में माँ बना दी जाती हैं जबकि यहाँ अमेरिका में ये अपनी मर्जी से बनती हैं

जहाँ तक दुत्कारने का सवाल है तो वो समाज की उदारता है रजामंदी नही, भारत में ऐसा ही कुछ होता तो आधी से ज्यादा लड़कियाँ या तो समाज के ठेकेदारों द्वारा मार दी जाती या समाज के तानों से खुद ही ऐसा कुछ कदम उठा लेती। दुनिया के किसी भी समाज में शायद ही कोई ऐसे माँ बाप होंगे जो ये चाहेंगे कि बचपने में ही उनके बच्चों के बच्चे हो जायें

चश्में उतारने की बात से मुझे जाने क्यों शुतुर्मुर्ग की याद आ गयी, जो खतरा देखते ही अपना सिर (आंखे) ढक लेता है उसे लगता है सिर ढकने से अब कोई खतरा नही रहा। लेकिन ऐसी घटना के भारत में घटने पर जरूर देखना चाहूँगा कि कितने लोग चश्में उतार के रख पाते हैं।

अनुप शुक्ल जी ने बहुत ही नपी-तुली बातों में इस तरह की घटनाओं के कारणों की नब्ज ही पकड़ ली। उनका कहना था, “इसका अबला, सबला से कोई लेना-देना नहीं है। जब कुछ सार्थक करने के लिये प्रेरित करने वाले तत्व न होंगे तो इसी तरह की ऊल-जलूल बातों में ऊर्जा लगेगी।” बात बिल्कुल सही भी है जब माँ-बाप दोनों घर चलाने की चिंता में जुटे हों, दोनों self-centered हों तो शायद ऐसा ही कुछ होगा।

आप सभी तीनों लोगों को अपने विचार रखने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद, इंडियन मीडिया को कमीश्नर के कुत्ते खोने की खबर को ब्रेकिंग न्यूज बनाने से फुर्सत मिले तो शायद भारत के भी किसी कोने में घटती कुछ इस तरह की खबरें लोगों तक पहुँचे।

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10 Responses to “Teen Pregnancy: इस फर्क का मतलब समाज की रजामंदी नही”

  1. Rajesh Roshan Says:

    मेरी तो एक बात समझ में आती है इन गोरे लोगो को लेकर ये लोग हर समय कुछ नया करना चाहते हैं नया से एकदम मतलब नही है अच्छा या बुरा….. कुछ नया… जो उन्हें रोमांच दे जाए… कुछ भी करने को तैयार होते इसके लिए…

  2. Gyandutt Pandey Says:

    लेमिंग (lemming) वे जीव हैं जो भेड़चाल में समुद्र की ओर दौड़ लगाते हैं और आत्महत्या कर लेते हैं।
    अब यह कृत्य लड़कियों की लेमिंगियत नहीं तो और क्या है!?

  3. सुजाता Says:

    तरुण ,
    अच्छा किया यहाँ खबर आप प्रकाश मे लाए । कल जब मैने इसे अखबार मे पढा था तो मुझे भी बहुत अजीब स लगा था । समयाभाव से लिख नही पायी । खबर की तफसील नही है सो अन्दाज़ा ही है – मेरे हिसाब से लड़कियाँ जीवन से प्रयोग करने के चक्कर में , या सिस्टम से विरोध स्वरूप ऐसा कर रही हों ।संरचना और मानयताएँ तोड़ने की मंशा से । उसके पीछे भी क्या कारण है ? मुझे इस खबर की डिटेल्स जानने की इच्छा है । उम्मीद है नेट पर कहीं कुछ मिल ही जाए ।

  4. समीर लाल Says:

    शायद चोकिंग गेम जैसा ही बिना दूरगामी परिणामों का आभास लिए किया गया एक और युवाओं का एडवेन्चर या पागलपन.

    नव युवाओं में पनपती दुखद एवं अफसोसजनक मानसिकता.

  5. अनूप शुक्ल Says:

    इस ऊर्जा का सार्थक उपयोग तो दुनिया बदल जाये। लेकिन इस भटकन से उनको बचाये कौन?

  6. sanjupahari Says:

    ye kaisi sarmnaak baat hai,,,bachche ab bachche janmenge, ye vinaas ki taraf sayad next generation ka kadam hai,,,bhagwaan raksha karna,,>>>

  7. Rewa Smriti Says:

    Anup Shukla ji ke baton se main sahmat hun…..ajkal shayad ham nariyan sablapan ka defination hi change kar rahe hein….na to parents ke paas bachchon ke liye time hai na hi bachchon ke paas itna hi waqt hai ki wo parents ko apna best frends samajh unse sari baaten dil khul kar kah sake….iska nateeza hame samne dikh raha hai…

    Dusri baat, jab child marriage ko nahi rok paa rahe hein to iska result yahi hoga….bachchiyan 15-16 ke age mein hi maan banegi….aur ye to sadiyon se INDIA mein chalta aa raha hai….fir ham kis kis ko, kahan kahan blame karen? Aap sab bataiye……Main abhari rahungi.

    rgds.

  8. Rewa Smriti Says:

    Main US or UK ki baat nahi karna chahti hun abhi…..bus India ki baat karna chahti hun……India mein bhi to aisa ho raha hai…akhir kyun?

    Hamare bharitya samaj mein yeh kabhi nahi kahin bhi kisi bhi sociology or science or anywhere yeh nahi kaha gaya hai ki buddhe log bachchiyon se shadi kare…lekin hamare desh mein log karte hein…..jab bachchiyon se shadi karenge to maan bhi to bachchiyan hi banegi……massom bachchiyan ko uska pita hi aisa karne per mazboor karta hai……ham kyun nahi rok paa rahe hein? kyunki yahan sab yahi kahte hein….”are chodiye yeh sab chalta rahega…” haan ye sab chalta rahega aur tabtak chalega jabtak ham aisa kahte rahenge……fir US or UK to hamse kahin peeche hai insab kartoot mein….mujhe aisa kabhi-2 feel hota hai. I may be wrong but this is wat my heart is saying now!

  9. Tarun Says:

    @सुजाता खबर के लिंक पिछली पोस्ट में हैं।

    @ज्ञानजी, मतलब बताने के लिये धन्यवाद।

    @राजेश, ये रोमांच का शगल कई बार शुर्खियों में आने के लिये भी होता है।

    @समीर जी, वाकई में ये अफसोसजनक मानसिकता ही है।

    @अनुपजी, ये भटकन कहीं ज्यादा उन्मुक्तता का नतीजा तो नही।

    @संजू भाई, लगता है आने वाले समय में भगवान बहुत व्यस्त रहने वाले हैं।

    @रेवा, स्वागत है आपका :) , आपका कहना सही है लेकिन समस्या दोनों जगह हैं, क्या भारत क्या यहाँ। वहाँ बाल विवाह से यहाँ बिना विवाह से भुगतना मासूम बच्चों को ही पड‌ता है। ताज्जुब तो ये है कि वहाँ परेशानी की वजह शायद निरक्षरता या गरीबी हो जबकि यहाँ अति साक्षरता भी है इतनी गरीबी भी नही फिर भी समस्या वैसी है।

  10. lovely kumari Says:

    sahi- galat pahchanane ki chhmata ka abhaw aur kuchh nahi.har chij ki ek umr hoti hai.tabiyat kharab rahne ke karan aapki pahli post nahi padh payi thi.isse sambandhit ek lekh maine kadambini patrika me bhi padha tha.aapne ispar likh kar sanwedna jagane ka kary kiya hai.

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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