फिल्म समीक्षाः धर्म
This summer do yourself a favour and watch this film Dharm. वैसे तो 2007 में रीलिज हुई इस फिल्म की समीक्षा का अब उतना कोई औचित्य नही है लेकिन फिर भी अच्छे सिनेमा के लिये तारीफ के दरवाजे कभी भी खोले जा सकते हैं। फिल्म धर्म का निर्देशन किया है भावना तलवार ने जो उनकी पहली फिल्म है और इसका प्रीमियर सीधे जाकर हुआ 60th Cannes Film Festival में।

फिल्म की कहानी शुरू से लेकर आखिर तक बनारस में ही घुमती है, और इस पूरी फिल्म का ताना बाना एक हिन्दू पुजारी चतुर्वेदी (पंकज कपूर) के इर्द गिर्द बुना गया है। पुजारी चतुर्वेदी एक विद्वान और धर्म ग्रंथों का ज्ञाता है, धर्म को लेकर उसमें उग्रता नही दिखायी देती लेकिन जब छोटी जात का कोई उसे छू जाता है तो अपने शुद्दिकरण के लिये दोबारा गंगा स्नान भी करता है। एक दिन किसी छोटे बच्चे को कोई महिला छोड़ जाती है जिसे उसकी बेटी घर ले आती है।
पुजारी के उस बच्चे की जात पूछने पर माँ (सुप्रिया पाठक) और बेटी दोनों झूठ बोल देते हैं कि ये ब्राहमण का बेटा है। फिर अपनी बीबी के कहने पर माँ-बेटी का उस बच्चे के प्रति मोह देख वो अपने घर में पालने देने के लिये राजी हो जाता है।
धीरे धीरे वक्त बीतने पर पुजारी का बच्चे के साथ काफी लगाव हो जाता है लेकिन फिर कहानी मोड़ लेती है और बच्चे की माँ बच्चा लेने आ पहुँचती है। तब सबको पता चलता है कि वो बच्चा वास्तव में मुस्लिम है, पुजारी परिवार उस बच्चे को उसकी माँ को दे देता है। वहीं दूसरी ओर पुजारी एक मुस्लिम के साथ संपर्क होने की वजह से अपने शरीर,
मन और आत्मा की शुद्धि के लिये व्रत और अनुष्ठान वगैरह करने लगता है। लेकिन जब पुजारी को लगता है कि वो पूरी तरह से शुद्ध हो गया है तभी वो बच्चा दोबारा उसके सामने आ जाता है, जिसे हिन्दू-मुस्लिम दंगों के कारण शरण लेने के लिये उसकी माँ पुजारी के घर में लेकर आ जाती है। लेकिन उस बच्चे के लिये कोई दरवाजा नही खोलता और वो वापस लौट जाता है। दंगों के दौरान ही पुजारी को ये ऐहसास होता है कि सच्चा धर्म वास्तव में मानवता है और वो दंगाईयों की परवाह किये बगैर उस बच्चे को वापस लाने के लिये घर से निकल पड़ता है।
फिल्म का अंत सुखद है साथ ही ये संदेश भी देता है कि सच्चा धर्म वो नही जो किताबों में पढ़ा होता है बल्कि सच्चा धर्म है इंसानियत, मानवता। पंकज कपूर ने अभिनय से पुजारी के किरदार में जान डाल दी है, सुप्रिया पाठक, के के रैना, ऋषिता भट्ट, दया शंकर पांडे और बच्चे सभी ने सराहनीय काम किया है। फिल्म का संगीत मधुर है जो देबाज्योति मिश्रा ने दिया है, गीत भी भाव प्रधान हैं जिन्हें कलमबद्ध किया है वरूण गौतम और मृत्युंजय के सिंह ने, विभा सिंह की लिखी कहानी में दम है, फिल्म के गीतों को कहानी से अलग रखा गया है।
मुझे ताज्जुब होता है (जो कि नही होना चाहिये था) ये फिल्म आस्कर के लिये भारत की एंट्री की दौड़ में फिल्म एकलव्य से हार गयी थी। मेरे हिसाब से तो ये फिल्म ही आस्कर के लिये जानी चाहिये थी। भावना तलवार इस फिल्म को बनाने के लिये वाकई में बधाई की हकदार हैं।
Dharma was premiered at the 60th Cannes Film Festival, and became the closing film of the World Cinema Section at the festival; it was also the official Indian entry to the Festival. It was also screened at 38th International Film Festival of India (2007), in Goa, and later went to film festivals like the ‘Cancun Film Festival’, Mexico; Asian Film Festival of first films, Singapore; and the ‘Palms Spring Festival’, California.
आज का गीतः सोनू निगम का गाया इसी फिल्म धर्म का गीत आज पेश है जो कि बहुत ही मधुर बन पड़ा है। बोल कुछ यूँ हैं - “भई भोर जागो, भई भोर। जैसे छायी अरूणायी, घुले रतिया का घनघोर, भई भोर जागो, भई भोर“।
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This post has 4 comments
June 29th, 2008
film dekhney yogya hai…2 baar mai dekh chuki huun
June 29th, 2008
सुन्दर फिल्म कथा। मैं यह चाहता था कि यह अदर-वे-राउण्ड होता - एक मौलवी ब्राह्मण के बच्चे को बिना मुसलमान कन्वर्ट किये अपनाता अन्तत:।
June 29th, 2008
आप सलाह दे रहे हैं, तो जरुर देखेंगे इसे. आभार समीक्षा के लिए.
July 6th, 2008
मुझे एक मित्र ने भी कहा कि मैँ इस फिल्म को अवश्य देखूँ -
अब जुगाड करते हैँ शीघ्र ही - गीत भी अच्छा लगा —
Do please read this also —
http://www.lavanyashah.com/2008/07/blog-post_05.html
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