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पुस्तक-चर्चाः खुबसूरत लोगों को लड़कियां ज्यादा क्यों होती हैं

March 10th, 2008 | 4 Comments | Posted in Books Reviews, खालीपीली

मैने अभी अभी ये किताब खत्म की है, इस किताब का पूरा नाम कुछ यूँ है – Why beautiful people have more daughters from dating, shopping, and Praying to going to War and Becoming a Billionaire– Two Evolutionary Psychologists Explain Why We Do What We Do। एक किताब के लिये, है ना कुछ लम्बा नाम। इतना लंबा नाम रखने की तुक तो खैर इसके लेखक ही जानें। मैने सोचा क्यों ना इस किताब को थोड़ा आप लोगों से भी रूबरू कराया जाय।

इस किताब के लेखक हैं एलन एस मिलर और सातोषी केनाजावा (Alan S. Miller and Satoshi Kanazawa), पहले सारे मूल लेख मि मिलर ही लिख रहे थे लेकिन इस किताब के ड्राफ्ट के दौरान ही बिमारी से उनके आकस्मिक निधन के बाद उन लेखों को मि केनजवा ने पुनः लिखा। चूँकि ये पहले से तय था कि मि मिलर पहले लेखक माने जायेंगे इसलिये बाद में भी उनका नाम ही पहले लिखा गया।

ये किताब वास्तव में इंसानी व्यवहार के बारे में है, इंसानी व्यवहार जो हमारे स्वाभाविक व्यवहार और अनूठे (यूनिक) व्यक्तिगत अनुभव और आसपास के वातावरण के मिश्रण से परिलिक्षित होता है। इंसानी व्यवहार की जब भी बात की जाय तो उसका सीधा सा मतलब होता है कि ये मनोविज्ञान का विषय है। वातावरण को लेकर “The Forgotten Half of the Equation” सब्जेक्ट के अंतर्गत लेखक शुरूआत में ही कुछ ये लिखते हैं -

Everyone agrees that experience and environment are both important influences on human behavior. Despite critics’ claims to the contrary, there are no serious biological or genetic determinists in science. There are a few genetic diseases, such as Huntington’s diseases, which are 100 percent determined by genes; if someone carries the effected gene, they will develop the disease no matter what their experiences or environment. An individual’s eye color and blood type are also 100 percent determined by genes. So these (and a few other) traits are entirely genetically determined. Otherwise, there are no human traits that are 100 percent determined by genes.

अब कुछ दिनों पहले ही मैने एक ओर खबर पड़ी थी जिसमें ये कहा गया था कि बहुत ज्यादा संभव है कि दुनिया के सभी नीली आंखों वाले व्यक्ति किसी एक ही आयरिश व्यक्ति का जींस शेयर कर रहे हों। इंसानी स्वभाव को टटोलने की ये कोशिश मनोविज्ञान के एक बिल्कुल ही नये क्षेत्र Evolutionary Psychology के अंतर्गत आती है। लेखकगण इस किताब के माध्यम से इसी विषय की बातों को साफ सरल और व्यवाहरिक उदाहरणों को लेकर समझाने की अपनी कोशिश मानते हैं।

पढ़ने के बाद मुझे लगा कि ज्यादातर टॉपिक स्त्री और पुरूष के आपसी और अलग अलग संबन्ध को व्यवहार को लेकर लिखे गये हैं। शायद ये ही वजह होगी कि कई स्त्रियां ये मानती हैं कि इसमें भी स्त्री को एक भोग की वस्तु दिखाने की कोशिश की गयी है। इस किताब में उठाये गये सवाल कुछ यूँ हैं -

Why is beauty Not in the eye of the beholder; He said, she said: Why do men and women perceive the same situation differently?; Why does having sons reduce the likelihood of divorce?; Why are diamonds a girl’s best friend?; Boy or girl? What influences the sex of your child?; Why is family more important to women than to men?; Why are almost all violent criminals men? Why are most neurosurgeons male and most kindergarten teachers female? Where does religion come from? Why are women more religious than men? Why are most suicide bombers muslim?

और भी बहुत सारे सवालों का हल निकालने की कोशिश इस किताब में की है। इनमें से ज्यादातर सवालों के उत्तर देने के लिये लेखकद्वय अंत में आकर पुरूष और महिलाओं के आंतरिक संबन्धों में आकर अटक जाते थे। जिस वजह से उनकी दी गयी थ्योरी मुझे कुछ सवालों के लिये नही जमी। लेकिन फिर भी ये किताब एक बार पढ़नी जरूर बनती है क्योंकि काफी कारणों की वजह पता तो चलती ही है।

इस किताब के पहले अध्याय में Evolutionary Psychology के बारे में बताया गया है, दूसरे अध्याय में कोशिश की है ये बताने की कि Why are Men and Women So Different?। जबकि बाकि के अध्यायों में ऊपर लिखे सवालों और ऐसे ही कुछ अन्य सवालों की वजह तलाशने या बताने की कोशिश की है। कुल मिलाकर एक रोचक किताब है अगर मौका मिले तो मैं पढ़ने के लिये जरूर सिफारिश करूँगा।

अंत में पिछली पोस्ट की एक टिप्पणीः
महेन्द्र मिश्रा ने कहा, “बहुत बढ़िया जानकारी दी है धन्यवाद”

महेन्द्रजी, धन्यवाद आपको है जो आप महिला दिवस की उस पोस्ट पर अकेले अपने कंधों में पुरूषों के प्रतिनिध्त्व की ध्वजा लहराते रहे।

अब जाते जाते सुजाता, ममता, महेन्द्र, और लावण्याजी सब को टिप्पणी देने और अपने विचार रखने के फलस्वरूप एक निठल्ली झप्पी। सुजाता, कौन बनेगा तो मैं नही देखता लेकिन इतना कह सकता हूँ कि ये मुन्ना भाई की जादू की झप्पी का ब्लोगिया संस्करण है।

और अगर आपने, अभी तक रिडर्स कैफे पर हुए बदलाव पर नजर नही मारी है तो एक नजर मारकर अपने विचार जरूर रखियेगा।

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4 Responses to “पुस्तक-चर्चाः खुबसूरत लोगों को लड़कियां ज्यादा क्यों होती हैं”

  1. ghughutibasuti Says:

    अवसर लगा तो पढ़ूँगी ।
    घुघूती बासूती

  2. अनूप शुक्ल Says:

    सही बता दिये किताब के बारे में।

  3. amit Says:

    हुम्म, अपने मतलब की नहीं है इसलिए आई विल स्किप दिस! ;)

  4. anitakumar Says:

    टॉपिक हमारी रुचि का है बहुत बढ़िया जानकारी दी, ये किताब कहां से मिल सकती है मतलब पब्लिशर कौन है, प्लीज बतायें

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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