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कबीरा खड़ा बाजार में: कबीर दास और उनके दोहे

March 11th, 2008 | 18 Comments | Posted in हिन्दी साहित्य

ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर कहने वाले कबीर दास जैसा व्यक्तित्व शायद ही किसी और हिन्दी साहित्यकार का होगा। स्कूल के वक्त भी वो कबीर और उनके दोहे ही थे जो आसानी से समझ में आते थे। उनका व्यक्तित्व अनुपम तो था ही लेकिन उनके जन्म को लेकर कई किंवदन्तियाँ भी प्रचलित थी।

कुछ लोगों का मानना है कि वो काशी में किसी गरीब विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए फिर उसने बदनामी की डर से नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक दिया, जहाँ से नीरु नाम का जुलाहा उन्हें अपने घर ले आया। फिर नीरू और उसकी पत्नी नीमा ने उनका पालन-पोषण किया।

वहीं कुछ कबीर पंथियों का मानना है कि वो काशी के लहरतारा तालाब में उत्पन्न मनोहर पुष्प कमल के ऊपर बालक के रुप में पाये गये। ऐसे ही एक प्राचीन ग्रंथ के अनुसार किसी प्रतीति नाम देवाङ्गना के गर्भ से भक्तराज प्रहलाद ही कबीर के रुप में प्रकट हुए थे। लेकिन ये तो तय है कि कबीर दास और लहरतारा तालाब में एक संबन्ध तो था ही।

कबीर का जन्म १२९७ में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन हुआ वो निडर और खरा खरा बोलने वाले कवि थे। जिन्हें बाद में संत का दर्जा भी प्राप्त हुआ। उन्होंने कभी भी किसी सम्प्रदाय और रुढियों की परवाह नही करी। यही नही उन्होंने हिंदू-मुसलमान सभी समाज में व्याप्त रुढिवादिता तथा कट्टपरंथ का खुलकर विरोध किया। १४१० में देह त्यागने से पहले काशी छोड़कर मगहर चले जाने की वजह भी उसी रूढ़िवादिता को उनका जवाब था, उस समय ये मान्यता थी कि काशी में मरने वाले को मोक्ष प्राप्त होता है। मगहर में कबीर की समाधि भी है और यहाँ हिन्दू मुसलमान दोनों श्रद्धा से सिर नवाने आते हैं।

कबीर दास वास्तव में फकीर थे वाणी से भी पहनावे और रहन सहन में भी। अपने पढ़े लिखे होने के संबन्ध में वो कहते हैं – ‘मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहीं हाथ।’ कबीर के नाम से जितना भी हमें पढ़ने को मिलता है वो उनके शिष्यों का लिखा हुआ है, वो तो सिर्फ मुहँ से बाँचते थे। कबीर कर्मकाण्ड के विरोधी थे, ना ही मूर्तिपूजक थे इसलिये मंदिर मस्जिद भी नही जाते थे, उनका मानना था कि ईश्वर एक ही है। मूर्ति पूजा को लक्ष्य करते हुए उन्होंने कहा -

पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौं पहार।
वा ते ता चाकी भली, पीसी खाय संसार।।

कबीर की वाणी का संग्रह ‘बीजक’ नाम के संग्रह के रूप से प्रसिद्ध है। इस संग्रह के तीन भाग हैं – रमैनी, सबद और साखी। यह कई भाषाओं की खिचड़ी है जिनमें पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूर्बी, ब्रजभाषा प्रमुख हैं।

अब नजर डालते हैं कबीर के कुछ प्रसिद्ध दोहों पर

कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सब की खैर
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर!

साँईं इतना दीजिये जामें कुटुम्ब समाये
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू ना भूखा जाये।

बुरा जो देखन में चला, बुरा ना मिलया कोई
जो मन खोजा आपना, मुझ से बुरा ना कोई।

माया मरी ना मन मरा, मर मर गये शरीर
आशा त्रिश्णा ना मरी, कह गये दास कबीर।

दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे ना कोये
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होये।

चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोए
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा ना कोए।

धीरे धीरे रे मना, धीरज से सब होये
माली सिंचे सौ घड़ा, ऋतु आये फ़ल होये।

ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोये
औरों को शीतल करे, आपहुँ शीतल होये।

जाती ना पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान
मोल करो तलवार की पड़ी रेहन जो म्यान।

माटी कहे कुम्हार से, काहे रोंदे मोहे
ईक दिन ऐसा आयेगा, मैं रौंदूगीं तोहे।

साधु ऐसा चाहिये, जैसा सूप सुहाय
सार सार को गही रहे, थोथा देय उडाय।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर
पंथी को छाया नही, फल लगे अति दूर।



कबीर के दोहों में जो मिठास और सच्चाई है वो मुझे भजनों में भी नजर नही आती इसीलिये कबीर के दोहे कभी भी, कहीं भी मैं सुन सकता हूँ, जबकि भजनों के लिये ऐसा नही कह सकता। कबीर कभी किसी धर्म से नही बंधे ना ही उनके दोहे, जितने भक्तिभाव से उनकी रचनायें भारत में गायी गयी और सराहयी गयी उतने ही तन्मयता से देश के बाहर भी। नीचे के कुछ विडियों में यही परीलिक्षित होता है, अब कबीर दास से संबन्धित कुछ विडियो भी देखिये और उनके बांचे दोहों को भी सुनिये -

विडियो -१


विडियो -२

विडियो -३

In this video Robert Bly performs the poetry of Kabir at one of the Mythic Journeys conferences

अब फरी ऐयाज और भाईयों की गाया कबीर का ये कलाम सुनिये – भला हुआ मोरी गगरी फूटी


अब इसे दूसरे अंदाज में आबिदा परवीन की आवाज में सुनिये -

और अब आबिदा परवीन को सुनिये विद द ग्रेट टच आफ गुलजार – सौंउ तो सपने मिलूँ

वैसे ही बहुत कुछ सुनने और देखने को दे दिया है लेकिन क्या करूँ कंट्रोल नही होता इसलिये जाते जाते एक और सुन लीजिये -



झीनी झीनी बीनी चदरिया:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ
ये भी शायद एक संयोग ही है कि जब मै कबीर पर पोस्ट लिख रहा था उसी समय संजीत भी दूर छतीसगढ़ में बैठे कबीर बांचते हुए झीनी झीनी चदरिया बुन रहे थे। छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ की ये श्रृंखला अगर नही पढ़ी तो वो आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

कबीर के राम
अगर आप कबीर के राम के बारे में जानने के इच्छुक हैं तो उसके लिये सृजन शिल्पी का कबीर और रामचरित मानस की विवेचना करता ये आलेख पढ़िये।

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18 Responses to “कबीरा खड़ा बाजार में: कबीर दास और उनके दोहे”

  1. maithily Says:

    आनन्ददायी अनुभव
    वाह तरुण जी,

  2. अनूप शुक्ल Says:

    सुन्दर! शानदार प्रस्तुति!

  3. kakesh Says:

    वाह वाह जी..फुरसत से सुनते हैं…

  4. जयप्रकाश मानस Says:

    यह रहा कुछ महत्वपूर्ण और शोध सामग्री

    http://tdil.mit.gov.in/coilnet/ignca/chgr0047.htm

  5. जयप्रकाश मानस Says:
  6. Tarun Says:

    @जयप्रकाश जी दोनों ही लिंक काम नही कर रहे हैं।

  7. yunus Says:

    सहेज के रखने लायक़ पेज । वक्‍त मिलने पर इन वीडियोज़ को ऑडियो में कनवर्ट करके सीडी छाप लेंगे । पहले से बताए दे रहे हैं ।

  8. Sanjeet Tripathi Says:

    सुंदर, इन विडियोज़ को देकर आपने तो दिल खुश कर दिया, शुक्रिया शुक्रिया!!

    दास कबीर की बातें जितना गुनिए उतना डूबिए……

    तेरा मेरा मनुवां कैसे एक होइ रे ।
    मै कहता हौं आँखन देखी, तू कहता कागद की लेखी ।
    मै कहता सुरझावन हारी, तू राख्यो अरुझाई रे ॥
    मै कहता तू जागत रहियो, तू जाता है सोई रे ।
    मै कहता निरमोही रहियो, तू जाता है मोहि रे ॥
    जुगन-जुगन समझावत हारा, कहा न मानत कोई रे ।
    तू तो रंगी फिरै बिहंगी, सब धन डारा खोई रे ॥
    सतगुरू धारा निर्मल बाहै, बामे काया धोई रे ।
    कहत कबीर सुनो भाई साधो, तब ही वैसा होई रे ॥

    साथ ही…………

    झीनी झीनी बीनी चदरिया ॥
    काहे कै ताना काहे कै भरनी,
    कौन तार से बीनी चदरिया ॥ १॥
    इडा पिङ्गला ताना भरनी,
    सुखमन तार से बीनी चदरिया ॥ २॥
    आठ कँवल दल चरखा डोलै,
    पाँच तत्त्व गुन तीनी चदरिया ॥ ३॥
    साँ को सियत मास दस लागे,
    ठोंक ठोंक कै बीनी चदरिया ॥ ४॥
    सो चादर सुर नर मुनि ओढी,
    ओढि कै मैली कीनी चदरिया ॥ ५॥
    दास कबीर जतन करि ओढी,
    ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया ॥ ६॥

  9. परमजीत बाली Says:

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति।आभार।

  10. mamta Says:

    बेहतरीन प्रस्तुति।

  11. ghughutibasuti Says:

    सुबह से सुन रही हूँ । मन प्रसन्न हुआ । अब बाहर जाना है तो बन्द करना पड़ रहा है । वैसे पहले दो ही सुन सकी, बाद के विडीओ खुले नहीं ।
    घुघूती बासूती

  12. सृजन शिल्पी Says:

    कबीर की रचनाओं की सुन्दर प्रस्तुति। सुन्दर, आनन्ददायक। शुक्रिया।

  13. अरूण Says:

    बहुत सुन्दर जी ,पर थोडा थोडा देते तो और मजा आता, रोज एक ..;)

  14. RA Says:

    तरुण, कबीर के दोहों के कई और भी कई audios है: भीमसेन जोशी, नीला भागवत, कुमार गंधर्व ,आशा भोंसले के गाये ।सुननें लायक ।

  15. Ashish Says:

    bahut achchha laga

  16. aastha Says:

    please kuch kavita mujhe bhi dijia

  17. dileep gupta mamta Says:

    achchi prastuti….aabhar

Trackbacks

  1. Srijan Shilpi » Blog Archive » कबीर के राम  

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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