19 Mar
Posted as खालीपीली, मस्ती-मजा, व्यंग्य
Tags: व्यंग्य, मस्ती मजा, मस्ती मजा, व्यंग्यहमें ये बताते हुए बड़ा दुख हो रहा है कि अत्यधिक खुशी के सदमें से हमारे पहचान के एक ब्लोगर की आकस्मिक मौत हो गयी। सुबह सुबह जब भाभीजी का फोन आया और जब उन्होने ये बताया तो हमें कुछ बूझते नही बना।
हमारे डिटेल से पूछने पर इतना ही पता चल पाया कि रोज की तरह आज सुबह भी ये अपनी ब्लोगिंग की रिसर्च में कंप्यूटर में नजरे गढ़ायें अपनी आंखेङ फोड़ रहे थे कि अचानक उछल-उछल के खुशी के साथ “यूरेका यूरेका” चिल्लाने लगे (ज्ञात रहे कि किसी अन्य भाषा में यूरेका का मतलन मिल गया होता है)। जब बहुत देर तक इनका उछलना चिल्लाना बंद नही हुआ तो इनकी पत्नी ने उन्हें शांत होने को कहा और ये ऐसे शांत हुए कि अब उठ ही नही रहे, हमेशा के लिये शांत हो गये।
हम कर भी क्या सकते थे खेद प्रकट किया और फोन रख दिया लेकिन मन ही मन ये सोच रहे थे कि काश दिलकार नेगी की इस “ब्लोगिंग छोड़ो …” वाली किताब का पता कुछ दिन पहले चल जाता तो एक प्रति उन्हें ही भेंट कर आते। अब आप उस ब्लोगर और उसकी रिसर्च से परिचित तो होंगे नही इसलिये हम आपको उसके बारे में बताये देते हैं।
ये साहेब अच्छे खासे हंसते खेलते इंसान थे फिर एक दिन अचानक ना जाने क्या हुआ कि ब्लोगर हो गये। हमने बहुत समझाया कि ब्लोगर मत बनो, तरह तरह से अपना दुखड़ा रोया लेकिन ये साहेब मानने को ही तैयार नही हुए।
ब्लोगर बनने के १-२ हफ्ते बाद मिले तो थोड़ा दुःखी लग रहे थे, हमने पूछा क्यों क्या हो गया ये मुँह क्यों लटका हुआ है? ये साहेब बोले, “वो अजदकिया गये हैं“।
अब हम शार्टपिच खेलने वालों को कोई बाउंसर मारे तो सिर से ही निकलेगी, हम चारों खाने चित। हमने कहा, भैया अपने भेजे में कुछ ना घुसा ये तुम किया केरिये हो। तब इन्होंने बताया कि एक दिन घूमते घूमते वो “अजदक” पहुँच गये, जब पढ़ना शुरू किया तो कुछ पल्ले ही नही पड़ के दिया क्या लिखा है। हम समझ गये बुढ़ऊ के शब्दों के जाल में चक्करघिन्नी खाकर ही ये अजदकिया गये हैं। वो फिर आगे बोले, एक तो वैसे ही कुछ पल्ले नही पड़ रहा था ऊपर से कहीं कहीं ऐसी भाषा थी कि पूछो मत, इतने सस्ते सस्ते शब्द गालियों जैसे। हमने टोका कि गालियों जैसे नही वो गालियां ही होंगी (गाली यानि श्लील का विलोम शब्द) जो गूढ़ साहित्यिक भाषा को अत्यधिक गूढता से बचाने के लिये उपयोग में लायी जाती है। तुम अजदक नही समझोगे, उसे जाने दो, यहाँ और भी बहुत ब्लोगर हैं जो अजदक नही समझते। एक तो हम ही हैं, जब टिप्पणी करने का मन नही होता है तो हम भी अजदक हो आते हैं। अब जो बात समझ ही ना आये उस पर टिप्पणी कैसे करेंगे जो टिप्पणी करने से भी बच जाते हैं और ब्लोगिंग से भी टच में रहते हैं।
ये साहेब फिर भी बोले, “हम तो अजदक समझकर ही रहेंगे, जो अजदक ना समझे वो हिंदी ब्लोगर ही नही। हमें बीच में टोकना पड़ा, अमाँ मियाँ शुभ-शुभ बोलो अगर ऐसा हो जाय तो हिंदी ब्लोग जगत का हाल भी Bear Stearns जैसा हो जायेगा जहाँ मुश्किल से ढूँढे से कोई ब्लोगर मिलेगा।
लेकिन ये महाशय थमने का नाम ही नही ले रहे थे, बोले, “क्यों नही बचेगा, जो उनके ब्लोग में टिपियाते हैं उनके तो समझ आता है वो बचेंगे”। हमने तब समझाया कि उनके साथ तो “अजदकिया करार” हुआ पड़ा है यानि कि तुम हमको गलियाओ हम तुमको गलियायेंगे टाईप करार है, इसलिये उनको देख कोई कॉम्प्लेक्स मत पालो। लेकिन ये साहेब अपनी जिद पर अड़े रहे बोले, “वहाँ हमने कुछ महिलाओं की भी टिप्पणी देखी हैं अगर शालीनता का ऐसा लोचा होता तो वो भला वहाँ क्यों टिपियाती”। हमने एक बार फिर समझाया कि भैया अभी-अभी आये हो ज्यादा उड़ो मत वो चोखरबालियाँ हैं, बालियाँ मार-मार ऐसा घायल कर देती हैं कि सामने वाले की बोलती बंद हो जाये। उन्ही के टिपियाने की वजह से वो शब्द जिन्हें तुम अश्लील कह रहे हो, अश्लील होकर भी इतनी शालीनता के साथ लिखे जाते हैं।
हमने आगे कहा, अच्छा ये छोड़ो तुम कहाँ इसके चक्कर में पडे हो, जितना टाईम तुम अजदक की एक पोस्ट पढ़कर समझने में लगाते हो उतनी देर में कम से कम ४-५ फुरसतिया पोस्ट पढ़ लोगे, पढ़ ही नही लोगे बल्कि समझ भी लोगे। ये साहेब बोले, “हमें नही पढ़ना फुरसतिया उनकी पोस्ट पढ़कर लगता है टीवी में कोई सास-बहू सीरियल देख रहे हैं, हर पैराग्राफ के बाद यही सोचते बैठते हैं कि अब खत्म होगा तब खत्म होगा।
हमने हार मानते हुए एक ट्राई और मारा कि अच्छा फुरसतिया छोड़ो उड़नतश्तरी देख आया करो। उनकी पोस्ट तो ठीक ठाक साईज की होती है, समझ में भी आ जाती है। और तो और समीरजी अपने बगल में बैठी लड़की/महिला के बारे में भी ऐसे लिखते हैं जैसे लगेगा कि वो तुम्हारे ही बगल में बैठी है। इन्होंने ने तो जैसे हमारी बात ना मानने की कसम खायी थी बोले, “उड़नतश्तरी, वहाँ तो मैं कभी ना जाऊँ, उनकी पोस्ट पढ़ने से ज्यादा वक्त तो उस पर मिली टिप्पणियाँ पढ़ने के लिये चाहिये। उतनी देर में तो मैं कितनी ही बार अगड़म-बगड़म करता हुआ ना जाने कितने सारथियों को निपटा आफिस के लिये नौ दो ग्यारह हो जाऊँ। ऊपर से बीबी को अगर पता चल गया तो घर निकाला मिल जायेगा। बीबी ने साफ-साफ शब्दों में कहा है, कहीं भी जाओ लेकिन उड़नतश्तरी देखने मत जाना”।
हमने टोका क्यों ऐसा क्या गुनाह कर दिया समीर ठंडी हवा का झोंका ने। तब महाशय ने बताया कि कुछ दिनों पहले भाभीजी के साथ इनकी पत्नी की बातें हुई थीं, फोन पर कह रही थी कि किसी को भी शराब, जुआ, सिगरेट कैसी भी लत लग जाये लेकिन ये साधुवाद की लत ना लगे। साधुवाद की टिप्पणी करते करते इनका ये हाल हो गया है कि पूछो मत। कुछ दिन पहले डिनर पर खाना देने के बाद जब पूछा कैसा बना है तो समीर बोले, “साधुवाद, आगे भी इसी तरह का देते रहें”। परसों जब कहा कि बच्चे बड़े हो गये हैं अब जल्दी से उनके लिये लड़की ढूँढ लेते हैं तो बोले, “क्या बात कही है आनंदम, अभी प्रत्युतर में एक पोस्ट ठेलता हूँ, साधुवाद इस बात के लिये”।
वो तो भला हो कुवैत वाले जुगाड़ी भाईसाहब का जिन्होंने इसके लिये भी जुगाड़ी लिंक बता दिया, हमें लग गया जरूर भाई इन्हें भी चौधरी बना गया। हमने पूछ ही लिया क्या जुगाड़ था, तब इन्होंने बताया कि कुवैत वाले भाई साहब बोले कि सीधे-सीधे धमका दो कि ये सब बंद नही किया तो उनके सारे कंप्यूटर के सारे ब्राउजर पर अजदक का होमपेज लगा देंगी। बस इतना सुनना था कि सुना है वो उनका गुस्सा शांत करने के लिये इंडिया ले गये हैं। जहाँ उन्हें वो किसी की मानसिक हलचल दिखाने वाले हैं।
हम सुनकर जैसे ही मुस्कुराये ये साहेब बोले, इसमें मुस्कुराने जैसा क्या है? हमने तब बताया कि हमें पता है समीरजी मानसिक हलचल क्यों दिखाने वाले हैं। देख लेना कनाडा लौटते ही भाभीजी भी साधुवाद देती नजर आने लगेंगी क्योंकि समीरजी का पिलान (ज्ञानी इसे प्लान पढ़ें) मानसिक हलचल के बहाने रीता भाभी की खिचड़ी खिलाने का है। बहुत जल्द उड़नतश्तरी में भी पारिवारिक पोस्ट का बोर्ड नजर आयेगा कि आज से बृहस्पतिवार के दिन हमारी श्रीमतीजी उड़नतश्तरी में नजर आयेंगी।
बात को लंबा खिंचता देख हमने कहा अच्छा ठीक है, हरी मिर्च तो चख सकते हो, मिर्च की तारीफ ही यही होती है तीखी लगे तो बचा लो या छोड़ दो नही तो पूरी की पूरी पेट में (यहाँ दिमाग में पढ़ें)। हरी मिर्च का दूसरा फायदा ये है कि अगर गल्ती से ज्यादा तीखी खा ली तो “सी सी” करते हुए जो भी शब्द मुँह से निकले उन्हें जाकर सस्ता शेर में पेल आओ, २-३ दाद तो कहीं नही गयी और साथ में शायर भी कहलाये जाने लगोगे। वहाँ से कबाड़खाना भी ज्यादा दूर नही है वहाँ जाकर भी अपने लायक कबाड़ ढूँढ सकते हो।
शायद वो हमारी इस फालतू बकवास से उब चुके थे, उन्होंने सीधे-सीधे हमें चैलेंज कर दिया कि वो अजदक समझ कर ही रहेंगे। आज से एक ही ब्लोग पड़ेंगे अजदक, ब्लोग में उपयोग में लायी जाने वाली गालियों का अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और जो-जो शास्त्र संभव है वो शास्त्र समझकर ही रहेंगे। आज से ही हमारी ये रिसर्च तब तक चालू रहेगी जब तक हम इसका तोड़ नही ढूँढ लेंगे। ये कह वो दनदनाते हुए चले गये।
उस दिन के बाद उनके हमेशा के लिये शांत होने की खबर इस फोन से ही पता चली जो सुबह-सुबह आया था। उनके यूरेका कहने से हमने अनुमान लगा लिया कि उन्होंने जरूर अजदक समझ लिया होगा और वो ये खुशी शायद संभाल नही पाये।
पुन्श्चः जब हम उन्हें फूल चढ़ाने गये तो उनके चेहरे पर अजदक समझने की संतुष्टता से एक अजब सी शांति व्याप्त थी। हम सोच रहे थे कि काश इससे अच्छा तो वो मोहल्ला समझने की कोशिश करते, ज्यादा से ज्यादा शब्दरूपी पत्थरों की मार से थोड़े घायल ही होते लेकिन ये हश्र तो ना होता।
उन सभी से क्षमा याचना सहित जिनका इस पोस्ट में जिक्र हुआ है। बुरा ना मानो होली है, निठल्ला चिंतन पढ़ने वाले सभी लोगों को होली की बहुत बहुत बधाई।
अब होली के अवसर पर ये एक प्यारी सी क्लिप, इसे होली का बोनस ही समझ लीजिये।
21 Responses
अनिल रघुराज
March 19th, 2008 at 8:50 am
1जबरदस्त। कहीं भी प्रवाह नही टूटा। यहां तक कि पुनश्च भी सायास नहीं लगता। वाकई पढ़कर आनंद गया।
दिनेशराय द्विवेदी
March 19th, 2008 at 9:03 am
2होली के नाम से इतनी सीरियस पोस्ट ठीक नहीं सजा या जुर्माना हो सकता है।
rachna
March 19th, 2008 at 9:16 am
3nice though a bit lengthy yet worth a read
अरूण
March 19th, 2008 at 9:28 am
4अच्छा हुआ हमसे पंगा नही लिये हो,वरना % ऽ ^&*%#$@……..
abha
March 19th, 2008 at 10:28 am
5बहुत बढिया ,आन्नदम।
जीतू
March 19th, 2008 at 10:38 am
6सही है, लगे रहो।
हमारे कानपुर मे बन्दे को पूरा रंग पोत कर बोलते है….बुरा ना मानो होली है…मान भी गए तो….
Sanjeet Tripathi
March 19th, 2008 at 1:10 pm
7शानदार, हुरियाएं रहे ऐसे ही, और लिखें!!
मस्त है!!
amit
March 19th, 2008 at 2:57 pm
8साधू साधू!! क्या लिखे हैं, मज़ा आ गया, हंसते-हंसते लोट पोट हो गया, पड़ोसी अखबार माँगने आया तो उसको डंडा मार भगा दिया(कमबख्त डिस्टर्ब करने की गरज से आया था)। समीर जी की क्या खिंचाई की है, सबसे बढ़िया वही दो पैराग्राफ़ लगे, साधू साधू!!
हिन्दी ब्लागिंग पर सोमरस ठाकुर की ये कविता सुनिये. « लल्लू
March 19th, 2008 at 3:37 pm
9[…] अर्श फर्श पे पटका मारें तरुण निठल्लौ चिन्तन, चंद औरतों के खुतूत कूं शोध रह्यो लिंकित मन बोधिसत्व आभा कौ मानस समझें मां की चुप्पी हथरिक्शा की सुनें विदाई, बरसे अन्तस: नीर; सौ सौ नमन करू मैं भईया सौ सौ नमन करूं; […]
mamta
March 19th, 2008 at 4:15 pm
10खूब रही होली की हुड़दंग।
होली मुबारक हो।
ज्ञान दत्त पाण्डेय
March 19th, 2008 at 5:31 pm
11क्या मजाक करते हैं! अजदक भी अपनी पोस्ट समझ नहीं पाते तो और कोई कैसे समझेगा!
RA
March 19th, 2008 at 6:22 pm
12निठल्ला चिन्तन की मंशा होली पर टाईटल देने जैसी लगती है। मज़ेदार लेख है ।
अजित वडनेरकर
March 20th, 2008 at 3:32 am
13सार्थक हास्य । आनंदम् आनंदम् …
अनूप शुक्ल
March 20th, 2008 at 7:41 am
14धांसू है जी। मौज ली गयी । हमें भी आ गयी। जो मजा छेड़ने में आता है ,उससे कम नहीं आता छिड़ने में ।
manish
March 20th, 2008 at 6:53 pm
15भईया जी अपने चरण इ-मेल कर दें - पैलागा करना है - [
]
समीर लाल
March 20th, 2008 at 6:57 pm
16हा हा!!!! श्रीमती उड़न तश्तरी वाली बात लीक कैसे हो गई..अचरज!!!
और ये बाद वाली क्लिप होली का बोनस समझिये का क्या मतलब..पहले वाला ईनाम था क्या??
बहुत खूब..आनन्द आ गया…बहुत साधुवाद!!!
समीर लाल
March 20th, 2008 at 6:58 pm
17उपर की टिप्पणी मे आनन्द आ गया को अति आनन्द आ गया अमित को करके भी एक बार और पढ़ें.
kakesh
March 20th, 2008 at 7:16 pm
18मस्त है जी.
मीनाक्षी
March 21st, 2008 at 4:39 am
19रंगों के त्यौहार पर ऐसी रंग-बिरंगी पोस्ट पढ़कर सतरंगी आनन्द आ गया.
होली मुबारक
Tarun
March 21st, 2008 at 7:54 am
20आप सब लोगों की टिप्पणियां पा हमें भी आ गया - आनंदम और इसी बात पर आप सभी लोगों को टिप्पणी करके हौसला बढ़ाने के लिये - साधूवाद
Shrish
March 22nd, 2008 at 9:10 pm
21वाह तरुण भईया खूब रंगे हो सबको होली के रंग में। वैसे एक बात तय है कि अपनी किस्मत में इस जन्म में अजदक का ब्लॉग समझना नहीं लिखा है।
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