हमें ये बताते हुए बड़ा दुख हो रहा है कि अत्यधिक खुशी के सदमें से हमारे पहचान के एक ब्लोगर की आकस्मिक मौत हो गयी। सुबह सुबह जब भाभीजी का फोन आया और जब उन्होने ये बताया तो हमें कुछ बूझते नही बना।

हमारे डिटेल से पूछने पर इतना ही पता चल पाया कि रोज की तरह आज सुबह भी ये अपनी ब्लोगिंग की रिसर्च में कंप्यूटर में नजरे गढ़ायें अपनी आंखेङ फोड़ रहे थे कि अचानक उछल-उछल के खुशी के साथ “यूरेका यूरेका” चिल्लाने लगे (ज्ञात रहे कि किसी अन्य भाषा में यूरेका का मतलन मिल गया होता है)। जब बहुत देर तक इनका उछलना चिल्लाना बंद नही हुआ तो इनकी पत्नी ने उन्हें शांत होने को कहा और ये ऐसे शांत हुए कि अब उठ ही नही रहे, हमेशा के लिये शांत हो गये।

हम कर भी क्या सकते थे खेद प्रकट किया और फोन रख दिया लेकिन मन ही मन ये सोच रहे थे कि काश दिलकार नेगी की इस “ब्लोगिंग छोड़ो” वाली किताब का पता कुछ दिन पहले चल जाता तो एक प्रति उन्हें ही भेंट कर आते। अब आप उस ब्लोगर और उसकी रिसर्च से परिचित तो होंगे नही इसलिये हम आपको उसके बारे में बताये देते हैं।

ये साहेब अच्छे खासे हंसते खेलते इंसान थे फिर एक दिन अचानक ना जाने क्या हुआ कि ब्लोगर हो गये। हमने बहुत समझाया कि ब्लोगर मत बनो, तरह तरह से अपना दुखड़ा रोया लेकिन ये साहेब मानने को ही तैयार नही हुए।

ब्लोगर बनने के १-२ हफ्ते बाद मिले तो थोड़ा दुःखी लग रहे थे, हमने पूछा क्यों क्या हो गया ये मुँह क्यों लटका हुआ है? ये साहेब बोले, “वो अजदकिया गये हैं“।

अब हम शार्टपिच खेलने वालों को कोई बाउंसर मारे तो सिर से ही निकलेगी, हम चारों खाने चित। हमने कहा, भैया अपने भेजे में कुछ ना घुसा ये तुम किया केरिये हो। तब इन्होंने बताया कि एक दिन घूमते घूमते वो “अजदक” पहुँच गये, जब पढ़ना शुरू किया तो कुछ पल्ले ही नही पड़ के दिया क्या लिखा है। हम समझ गये बुढ़ऊ के शब्दों के जाल में चक्करघिन्नी खाकर ही ये अजदकिया गये हैं। वो फिर आगे बोले, एक तो वैसे ही कुछ पल्ले नही पड़ रहा था ऊपर से कहीं कहीं ऐसी भाषा थी कि पूछो मत, इतने सस्ते सस्ते शब्द गालियों जैसे। हमने टोका कि गालियों जैसे नही वो गालियां ही होंगी (गाली यानि श्लील का विलोम शब्द) जो गूढ़ साहित्यिक भाषा को अत्यधिक गूढ‌ता से बचाने के लिये उपयोग में लायी जाती है। तुम अजदक नही समझोगे, उसे जाने दो, यहाँ और भी बहुत ब्लोगर हैं जो अजदक नही समझते। एक तो हम ही हैं, जब टिप्पणी करने का मन नही होता है तो हम भी अजदक हो आते हैं। अब जो बात समझ ही ना आये उस पर टिप्पणी कैसे करेंगे जो टिप्पणी करने से भी बच जाते हैं और ब्लोगिंग से भी टच में रहते हैं।

ये साहेब फिर भी बोले, “हम तो अजदक समझकर ही रहेंगे, जो अजदक ना समझे वो हिंदी ब्लोगर ही नही। हमें बीच में टोकना पड़ा, अमाँ मियाँ शुभ-शुभ बोलो अगर ऐसा हो जाय तो हिंदी ब्लोग जगत का हाल भी Bear Stearns जैसा हो जायेगा जहाँ मुश्किल से ढूँढे से कोई ब्लोगर मिलेगा।

लेकिन ये महाशय थमने का नाम ही नही ले रहे थे, बोले, “क्यों नही बचेगा, जो उनके ब्लोग में टिपियाते हैं उनके तो समझ आता है वो बचेंगे”। हमने तब समझाया कि उनके साथ तो “अजदकिया करार” हुआ पड़ा है यानि कि तुम हमको गलियाओ हम तुमको गलियायेंगे टाईप करार है, इसलिये उनको देख कोई कॉम्प्लेक्स मत पालो। लेकिन ये साहेब अपनी जिद पर अड़े रहे बोले, “वहाँ हमने कुछ महिलाओं की भी टिप्पणी देखी हैं अगर शालीनता का ऐसा लोचा होता तो वो भला वहाँ क्यों टिपियाती”। हमने एक बार फिर समझाया कि भैया अभी-अभी आये हो ज्यादा उड़ो मत वो चोखरबालियाँ हैं, बालियाँ मार-मार ऐसा घायल कर देती हैं कि सामने वाले की बोलती बंद हो जाये। उन्ही के टिपियाने की वजह से वो शब्द जिन्हें तुम अश्लील कह रहे हो, अश्लील होकर भी इतनी शालीनता के साथ लिखे जाते हैं।

हमने आगे कहा, अच्छा ये छोड़ो तुम कहाँ इसके चक्कर में पड‌े हो, जितना टाईम तुम अजदक की एक पोस्ट पढ़कर समझने में लगाते हो उतनी देर में कम से कम ४-५ फुरसतिया पोस्ट पढ़ लोगे, पढ़ ही नही लोगे बल्कि समझ भी लोगे। ये साहेब बोले, “हमें नही पढ़ना फुरसतिया उनकी पोस्ट पढ़कर लगता है टीवी में कोई सास-बहू सीरियल देख रहे हैं, हर पैराग्राफ के बाद यही सोचते बैठते हैं कि अब खत्म होगा तब खत्म होगा।

हमने हार मानते हुए एक ट्राई और मारा कि अच्छा फुरसतिया छोड़ो उड़नतश्तरी देख आया करो। उनकी पोस्ट तो ठीक ठाक साईज की होती है, समझ में भी आ जाती है। और तो और समीरजी अपने बगल में बैठी लड़की/महिला के बारे में भी ऐसे लिखते हैं जैसे लगेगा कि वो तुम्हारे ही बगल में बैठी है। इन्होंने ने तो जैसे हमारी बात ना मानने की कसम खायी थी बोले, “उड़नतश्तरी, वहाँ तो मैं कभी ना जाऊँ, उनकी पोस्ट पढ़ने से ज्यादा वक्त तो उस पर मिली टिप्पणियाँ पढ़ने के लिये चाहिये। उतनी देर में तो मैं कितनी ही बार अगड़म-बगड़म करता हुआ ना जाने कितने सारथियों को निपटा आफिस के लिये नौ दो ग्यारह हो जाऊँ। ऊपर से बीबी को अगर पता चल गया तो घर निकाला मिल जायेगा। बीबी ने साफ-साफ शब्दों में कहा है, कहीं भी जाओ लेकिन उड़नतश्तरी देखने मत जाना”।

हमने टोका क्यों ऐसा क्या गुनाह कर दिया समीर ठंडी हवा का झोंका ने। तब महाशय ने बताया कि कुछ दिनों पहले भाभीजी के साथ इनकी पत्नी की बातें हुई थीं, फोन पर कह रही थी कि किसी को भी शराब, जुआ, सिगरेट कैसी भी लत लग जाये लेकिन ये साधुवाद की लत ना लगे। साधुवाद की टिप्पणी करते करते इनका ये हाल हो गया है कि पूछो मत। कुछ दिन पहले डिनर पर खाना देने के बाद जब पूछा कैसा बना है तो समीर बोले, “साधुवाद, आगे भी इसी तरह का देते रहें”। परसों जब कहा कि बच्चे बड़े हो गये हैं अब जल्दी से उनके लिये लड़की ढूँढ लेते हैं तो बोले, “क्या बात कही है आनंदम, अभी प्रत्युतर में एक पोस्ट ठेलता हूँ, साधुवाद इस बात के लिये”।

वो तो भला हो कुवैत वाले जुगाड़ी भाईसाहब का जिन्होंने इसके लिये भी जुगाड़ी लिंक बता दिया, हमें लग गया जरूर भाई इन्हें भी चौधरी बना गया। हमने पूछ ही लिया क्या जुगाड़ था, तब इन्होंने बताया कि कुवैत वाले भाई साहब बोले कि सीधे-सीधे धमका दो कि ये सब बंद नही किया तो उनके सारे कंप्यूटर के सारे ब्राउजर पर अजदक का होमपेज लगा देंगी। बस इतना सुनना था कि सुना है वो उनका गुस्सा शांत करने के लिये इंडिया ले गये हैं। जहाँ उन्हें वो किसी की मानसिक हलचल दिखाने वाले हैं।

हम सुनकर जैसे ही मुस्कुराये ये साहेब बोले, इसमें मुस्कुराने जैसा क्या है? हमने तब बताया कि हमें पता है समीरजी मानसिक हलचल क्यों दिखाने वाले हैं। देख लेना कनाडा लौटते ही भाभीजी भी साधुवाद देती नजर आने लगेंगी क्योंकि समीरजी का पिलान (ज्ञानी इसे प्लान पढ़ें) मानसिक हलचल के बहाने रीता भाभी की खिचड़ी खिलाने का है। बहुत जल्द उड़नतश्तरी में भी पारिवारिक पोस्ट का बोर्ड नजर आयेगा कि आज से बृहस्पतिवार के दिन हमारी श्रीमतीजी उड़नतश्तरी में नजर आयेंगी।

बात को लंबा खिंचता देख हमने कहा अच्छा ठीक है, हरी मिर्च तो चख सकते हो, मिर्च की तारीफ ही यही होती है तीखी लगे तो बचा लो या छोड़ दो नही तो पूरी की पूरी पेट में (यहाँ दिमाग में पढ़ें)। हरी मिर्च का दूसरा फायदा ये है कि अगर गल्ती से ज्यादा तीखी खा ली तो “सी सी” करते हुए जो भी शब्द मुँह से निकले उन्हें जाकर सस्ता शेर में पेल आओ, २-३ दाद तो कहीं नही गयी और साथ में शायर भी कहलाये जाने लगोगे। वहाँ से कबाड़खाना भी ज्यादा दूर नही है वहाँ जाकर भी अपने लायक कबाड़ ढूँढ सकते हो।

शायद वो हमारी इस फालतू बकवास से उब चुके थे, उन्होंने सीधे-सीधे हमें चैलेंज कर दिया कि वो अजदक समझ कर ही रहेंगे। आज से एक ही ब्लोग पड़ेंगे अजदक, ब्लोग में उपयोग में लायी जाने वाली गालियों का अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और जो-जो शास्त्र संभव है वो शास्त्र समझकर ही रहेंगे। आज से ही हमारी ये रिसर्च तब तक चालू रहेगी जब तक हम इसका तोड़ नही ढूँढ लेंगे। ये कह वो दनदनाते हुए चले गये।

उस दिन के बाद उनके हमेशा के लिये शांत होने की खबर इस फोन से ही पता चली जो सुबह-सुबह आया था। उनके यूरेका कहने से हमने अनुमान लगा लिया कि उन्होंने जरूर अजदक समझ लिया होगा और वो ये खुशी शायद संभाल नही पाये।

पुन्श्चः जब हम उन्हें फूल चढ़ाने गये तो उनके चेहरे पर अजदक समझने की संतुष्टता से एक अजब सी शांति व्याप्त थी। हम सोच रहे थे कि काश इससे अच्छा तो वो मोहल्ला समझने की कोशिश करते, ज्यादा से ज्यादा शब्दरूपी पत्थरों की मार से थोड़े घायल ही होते लेकिन ये हश्र तो ना होता।

उन सभी से क्षमा याचना सहित जिनका इस पोस्ट में जिक्र हुआ है। बुरा ना मानो होली है, निठल्ला चिंतन पढ़ने वाले सभी लोगों को होली की बहुत बहुत बधाई।

अब होली के अवसर पर ये एक प्यारी सी क्लिप, इसे होली का बोनस ही समझ लीजिये।




डिस्क्लेमरः ये पोस्ट पूरी तरह काल्पनिक है जो होली की पार्टी में बगैर भांग की ठंडाई पीने के तीन दिन बाद लिखी गयी है। आशा है होली के दिन आप लोग भी एक दिन के लिये ब्लोगिंग छोड अपने परिवार के साथ इस रंगों के त्यौहार का खूब आनंद उठायेंगे।

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