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कुछ समय पहले मैंने अंग्रेजी के एक ब्लोग में इस विषय पर देखा था कि बड़ी अच्छी चर्चा चली थी। सब अपने अपने कारणों को बता रहे थे। तो मुझे लगा क्यों ना हिंदी चिट्ठाकारों में भी इस विषय को उठा के देखा जाय।

चाहे आप चिट्ठे लिखते पढ़ते है या सिर्फ पढ़ते हैं, दोनों ही कभी ना कभी किसी ना किसी चिट्ठे पर किसी ना किसी पोस्ट पर कभी तो टिप्पणी करते ही होगे। आखिर ऐसा क्या लिखा होता है जो आपको कोई टिप्पणी लिखने के लिये प्रेरित करता है, कई ऐसी साधारण पोस्ट भी होती हैं फिर भी उनमें आप टिप्पणी कर आते हैं तो आखिर क्या वजह है जो टिप्पणी के लिये उकसाती है, कब ऐसे लगता है कि टिप्पणी करी जाय और क्यों करी जाय। और जो कुछ चिट्ठाकार सिर्फ पढ़ते हैं कभी टिप्पणी नही करते आखिर क्या वजह है जो उनको लगता है कि टिप्पणी करने जरूरत नही है। (वैसे मैने पूछ तो लिया फिर ख्याल आया जो टिप्पणी कभी करते ही नही वो यहाँ भी कैसे करेंगे)।

अंग्रेजी चिट्ठे पर इस विषय में जब मैने पढ़ा था तब तक करीब १०० ब्लोगरस और पाठक अपने विचार रख चुके थे, काफी दिनों से उस अंग्रेजी पोस्ट को ढूँढ रहा था लिंक लेकिन मिला नही।

मैं जितने चिट्ठे पढ़ता हूँ कोशिश करता हूँ ज्यादा से ज्यादा में टिप्पणी कर सकूँ, उनमें से ७०-८० प्रतिशत चिट्ठों या पोस्टों में अपने विचार टिप्पणी के रूप में छोड़ ही आता हूँ। बाकि बचे २०-३० प्रतिशत में ज्यादातर कविता वाली पोस्टें होती हैं या फिर वो जिन्हें मैं लंच के दौरान खाते हुए पढ़ता हूँ। अब मेरी टिप्पणियों को देखकर पता चल ही गया होगा कि मैं चिट्ठे बहुत कम ही पढ़ पाता हूँ। मेरे लिये टिप्पणी करना एक क्रिया की प्रतिक्रिया है और टिप्पणी करने की वजह वही है जो चिट्ठे लिखने की।

अब आप बतायें आप टिप्पणी कब और क्यों करते हैं।

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