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	<title>Comments on: चौंकाने वाला विज्ञापन</title>
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	<description>निठल्ला चिन्तन एक आक्रौश है विचारौं की आंधी का, एक द्वंद है सच और झूठ का, एक भावना है प्यार की, एक तमन्ना है आकाश छूने की, कुछ कहने की और कुछ अनकही छोड़ देने की॥</description>
	<pubDate>Fri, 04 Jul 2008 07:42:30 +0000</pubDate>
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		<title>By: अनूप शुक्ल</title>
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		<dc:creator>अनूप शुक्ल</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Mar 2008 16:13:37 +0000</pubDate>
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		<description>देखा। फोटो भी और कमेंट भी। कमेंट भी कम मजेदार नहीं हैं। फोटो का उद्देश्य to draw attention as much as possible पूरा हुआ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>देखा। फोटो भी और कमेंट भी। कमेंट भी कम मजेदार नहीं हैं। फोटो का उद्देश्य to draw attention as much as possible पूरा हुआ।</p>
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		<title>By: Tarun</title>
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		<dc:creator>Tarun</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Mar 2008 13:03:07 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;i&gt;आप इस पत्रिका के विज्ञापन को पचा ना की बात कर रहे है। जर्मनी के टीवी चैनलो पर आने वाले विजापन देख लें, और छोड़िए, फ्रेंच फिल्मे देखे, इटली के रिएअल्टी शो देख लीजिए, या फिर किसी सैक्स ट्वाय कम्पनी का विज्ञापन देख लें, आप तो शायद बेहोश ही हो जाएं। लेकिन मुझे ताज्जुब है ये आप अमरीका मे बैठकर कह रहे है।&lt;/i&gt;
जीतू भाई, कम से कम अमेरिका में खुलेआम टेलिविजन में मैने ऐसा नही देखा, प्लेबॉय जैसे अलग चैनल हैं जिनके लिये अलग से सब्सक्रिप्सन लेना होता है या फिर किसी किसी में रेटिंग के साथ देर रात में। रही बेहोश होने की बात वो तो मैं होंगा नही क्योंकि ये सब मुझे पता है, रूस में तो एक बार रेटिंग के लिये न्यूज भी टॉप लैस एंकरों से करवायी गयी है। बात यहाँ इस बात की है कि किस माध्यम में किसको लिया गया है और उसे किस तरह से पेश किया गया है और वो नैतिक रूप से कितनी सही है, जानवर की जगह आदमी होता तो कॉमन बात होती लेकिन। बात उस नैतिकता को पचाने की है।

&lt;i&gt;अभी पिछले दिनो मे इटली मे हुई एक सैक्स इक्जीबिशन का लाइव कवरेज देख रहा था। सभी लोग सहज व्यवहार कर रहे थे, हालांकि आधे लोग बिना कपड़े के थे वहाँ।&lt;/i&gt; 
सैक्स इक्जीबिशन का प्रेसेन्टेशन किस तरह से किया गया है इस पर सब निर्भर करता है, और इस पर असहज होने जैसा कुछ नही। यहाँ न्यूयार्क में भी है ऐसा म्यूजियम है

&lt;i&gt;एक राज की बात बताऊं, यूरोप मे लाइव हॉट टेलीफोन लाइन्स होती है, जहाँ पर लड़किया बिना कपड़े पहने, फोन मिलाने वालों से विभिन्न भाषाओं मे बाते करती है।इनका लाइव टीवी ब्राडकास्ट भी किया जाता है। डिमांड एंड सप्लाई का खेल देखिए, अंग्रेजी, यूरोपियन, अरबी भाषा के साथ अब वे हिन्दी मे भी बात करने लगी है। इन कम्पनियों को दोहरी कमाई होती है, एक तो टेलीफोन का खर्चा और टीवी चैनल के लिए फ्री का कंटेट। भारतीयों की (विशेषकर 30+ की बड़ी संख्या है इनको फोन करने वालों की)&lt;/i&gt;
ये तो सभी जगह होती हैं, इसमें कुछ नया नही है यहाँ भी हैं, भारत में भी होंगी नही होंगी तो हो जायेंगी, टेलिफोन तो वैसे भी सस्ता हो गया है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p><i>आप इस पत्रिका के विज्ञापन को पचा ना की बात कर रहे है। जर्मनी के टीवी चैनलो पर आने वाले विजापन देख लें, और छोड़िए, फ्रेंच फिल्मे देखे, इटली के रिएअल्टी शो देख लीजिए, या फिर किसी सैक्स ट्वाय कम्पनी का विज्ञापन देख लें, आप तो शायद बेहोश ही हो जाएं। लेकिन मुझे ताज्जुब है ये आप अमरीका मे बैठकर कह रहे है।</i><br />
जीतू भाई, कम से कम अमेरिका में खुलेआम टेलिविजन में मैने ऐसा नही देखा, प्लेबॉय जैसे अलग चैनल हैं जिनके लिये अलग से सब्सक्रिप्सन लेना होता है या फिर किसी किसी में रेटिंग के साथ देर रात में। रही बेहोश होने की बात वो तो मैं होंगा नही क्योंकि ये सब मुझे पता है, रूस में तो एक बार रेटिंग के लिये न्यूज भी टॉप लैस एंकरों से करवायी गयी है। बात यहाँ इस बात की है कि किस माध्यम में किसको लिया गया है और उसे किस तरह से पेश किया गया है और वो नैतिक रूप से कितनी सही है, जानवर की जगह आदमी होता तो कॉमन बात होती लेकिन। बात उस नैतिकता को पचाने की है।</p>
<p><i>अभी पिछले दिनो मे इटली मे हुई एक सैक्स इक्जीबिशन का लाइव कवरेज देख रहा था। सभी लोग सहज व्यवहार कर रहे थे, हालांकि आधे लोग बिना कपड़े के थे वहाँ।</i><br />
सैक्स इक्जीबिशन का प्रेसेन्टेशन किस तरह से किया गया है इस पर सब निर्भर करता है, और इस पर असहज होने जैसा कुछ नही। यहाँ न्यूयार्क में भी है ऐसा म्यूजियम है</p>
<p><i>एक राज की बात बताऊं, यूरोप मे लाइव हॉट टेलीफोन लाइन्स होती है, जहाँ पर लड़किया बिना कपड़े पहने, फोन मिलाने वालों से विभिन्न भाषाओं मे बाते करती है।इनका लाइव टीवी ब्राडकास्ट भी किया जाता है। डिमांड एंड सप्लाई का खेल देखिए, अंग्रेजी, यूरोपियन, अरबी भाषा के साथ अब वे हिन्दी मे भी बात करने लगी है। इन कम्पनियों को दोहरी कमाई होती है, एक तो टेलीफोन का खर्चा और टीवी चैनल के लिए फ्री का कंटेट। भारतीयों की (विशेषकर 30+ की बड़ी संख्या है इनको फोन करने वालों की)</i><br />
ये तो सभी जगह होती हैं, इसमें कुछ नया नही है यहाँ भी हैं, भारत में भी होंगी नही होंगी तो हो जायेंगी, टेलिफोन तो वैसे भी सस्ता हो गया है।</p>
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		<title>By: जीतू</title>
		<link>http://www.readers-cafe.net/nc/2008/03/13/shockingly-controversial-ad-campaign-in-germany/#comment-12865</link>
		<dc:creator>जीतू</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Mar 2008 05:07:38 +0000</pubDate>
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		<description>तरुण भाई, आप इस पत्रिका के विज्ञापन को पचा ना की बात कर रहे है। जर्मनी के टीवी चैनलो पर आने वाले विजापन देख लें, और छोड़िए, फ्रेंच फिल्मे देखे, इटली के रिएअल्टी शो देख लीजिए, या फिर किसी सैक्स ट्वाय कम्पनी का विज्ञापन देख लें, आप तो शायद बेहोश ही हो जाएं। लेकिन मुझे ताज्जुब है ये आप अमरीका मे बैठकर कह रहे है।

अभी पिछले दिनो मे इटली मे हुई एक सैक्स इक्जीबिशन का लाइव कवरेज देख रहा था। सभी लोग सहज व्यवहार कर रहे थे, हालांकि आधे लोग बिना कपड़े के थे वहाँ। कवरेज मे ही इत्ता सबकुछ था कि जो कि एक आम भारतीय के पैसे वसूल कर दे। 

एक राज की बात बताऊं, यूरोप मे लाइव हॉट टेलीफोन लाइन्स होती है, जहाँ पर लड़किया बिना कपड़े पहने, फोन मिलाने वालों से विभिन्न भाषाओं मे बाते करती है।इनका लाइव टीवी ब्राडकास्ट भी किया जाता है। डिमांड एंड सप्लाई का खेल देखिए, अंग्रेजी, यूरोपियन, अरबी भाषा के साथ अब वे हिन्दी मे भी बात करने लगी है। इन कम्पनियों को दोहरी कमाई होती है, एक तो टेलीफोन का खर्चा और टीवी चैनल के लिए फ्री का कंटेट। भारतीयों की (विशेषकर 30+ की बड़ी संख्या है इनको फोन करने वालों की)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>तरुण भाई, आप इस पत्रिका के विज्ञापन को पचा ना की बात कर रहे है। जर्मनी के टीवी चैनलो पर आने वाले विजापन देख लें, और छोड़िए, फ्रेंच फिल्मे देखे, इटली के रिएअल्टी शो देख लीजिए, या फिर किसी सैक्स ट्वाय कम्पनी का विज्ञापन देख लें, आप तो शायद बेहोश ही हो जाएं। लेकिन मुझे ताज्जुब है ये आप अमरीका मे बैठकर कह रहे है।</p>
<p>अभी पिछले दिनो मे इटली मे हुई एक सैक्स इक्जीबिशन का लाइव कवरेज देख रहा था। सभी लोग सहज व्यवहार कर रहे थे, हालांकि आधे लोग बिना कपड़े के थे वहाँ। कवरेज मे ही इत्ता सबकुछ था कि जो कि एक आम भारतीय के पैसे वसूल कर दे। </p>
<p>एक राज की बात बताऊं, यूरोप मे लाइव हॉट टेलीफोन लाइन्स होती है, जहाँ पर लड़किया बिना कपड़े पहने, फोन मिलाने वालों से विभिन्न भाषाओं मे बाते करती है।इनका लाइव टीवी ब्राडकास्ट भी किया जाता है। डिमांड एंड सप्लाई का खेल देखिए, अंग्रेजी, यूरोपियन, अरबी भाषा के साथ अब वे हिन्दी मे भी बात करने लगी है। इन कम्पनियों को दोहरी कमाई होती है, एक तो टेलीफोन का खर्चा और टीवी चैनल के लिए फ्री का कंटेट। भारतीयों की (विशेषकर 30+ की बड़ी संख्या है इनको फोन करने वालों की)</p>
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	<item>
		<title>By: Tarun</title>
		<link>http://www.readers-cafe.net/nc/2008/03/13/shockingly-controversial-ad-campaign-in-germany/#comment-12860</link>
		<dc:creator>Tarun</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Mar 2008 01:25:45 +0000</pubDate>
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		<description>चलो भई, जब सबके लिये ये नार्मल है तो हम काहे अपना खून जलायें, राज भाई ये पिछले साल अक्टूबर के आसपास का विज्ञापन है उस समय विरोध हुआ था ऐसा पढ़ा था। चलो इस बहाने आपके पराये देश का नाम तो पता चला :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>चलो भई, जब सबके लिये ये नार्मल है तो हम काहे अपना खून जलायें, राज भाई ये पिछले साल अक्टूबर के आसपास का विज्ञापन है उस समय विरोध हुआ था ऐसा पढ़ा था। चलो इस बहाने आपके पराये देश का नाम तो पता चला <img src='http://www.readers-cafe.net/nc/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /></p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: राज भाटिया</title>
		<link>http://www.readers-cafe.net/nc/2008/03/13/shockingly-controversial-ad-campaign-in-germany/#comment-12854</link>
		<dc:creator>राज भाटिया</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 13 Mar 2008 20:22:56 +0000</pubDate>
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		<description>तरुन भाई मे जर्मनी से ही हु, मेने तो यहा ऎसा कोई हगंमा नही देखा, यह सब बाते इन गोरो के लिये नोर्मल हे, भाई आप टेंशन मत ले, अभी गर्मिया शुरु होने दो फ़िर सभी तरफ़ नगं धडंग ही नजर आये गे , *जिसे आधी से ज्यादा जर्मन जनता पचा नही पा रही है * यह आप को किस ने बोल दिया यह सब, अरे यह लोगो के पास भी समय नही सब को अपनी अपनी पढी हे,जर्मन के बारे ज्यादा जान्कारी चाहिये तो मुझे  e mail कर ले.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>तरुन भाई मे जर्मनी से ही हु, मेने तो यहा ऎसा कोई हगंमा नही देखा, यह सब बाते इन गोरो के लिये नोर्मल हे, भाई आप टेंशन मत ले, अभी गर्मिया शुरु होने दो फ़िर सभी तरफ़ नगं धडंग ही नजर आये गे , *जिसे आधी से ज्यादा जर्मन जनता पचा नही पा रही है * यह आप को किस ने बोल दिया यह सब, अरे यह लोगो के पास भी समय नही सब को अपनी अपनी पढी हे,जर्मन के बारे ज्यादा जान्कारी चाहिये तो मुझे  e mail कर ले.</p>
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	<item>
		<title>By: Tarun</title>
		<link>http://www.readers-cafe.net/nc/2008/03/13/shockingly-controversial-ad-campaign-in-germany/#comment-12839</link>
		<dc:creator>Tarun</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 13 Mar 2008 13:32:35 +0000</pubDate>
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		<description>कमाल है जिसे आधी से ज्यादा जर्मन जनता पचा नही पा रही है उसे यहाँ काफी लोगों ने आसानी से पचा लिया। आज कोई भी देश बाउंड्री बंद करके नही बैठा है, इसलिये आज जो वहाँ बह रहा है, हो सकता है कल बहकर इंडिया भी आये। मुझे इंतजार रहेगा उस दिन का जब उसे भी इंडिया में इसी सहजता से लिया जायेगा जैसा कि आज। 

वैसे भी हर देश में सहजता के मायने अलग होते हैं, जैसे यहाँ ट्रेन रोककर उसके डब्बे काट उन्हें आग के हवाले की बात कोई हजम नही कर सकता उसे इंडिया में सहजता से लिया जाता है तभी तो आये दिन ऐसी घटनायें होती रहती हैं।

रहा सवाल चैनलों का तो वो कोई ओपन चैनल नही होते जिसे जब भी कोई देख ले, यहाँ भी हैं। लेकिन ये विज्ञापन एक मैगजीन में है जिसे कोई भी देख सकता है। क्या करियेगा अगर वो मैगजीन किसी दिन इसी तरह के कवर में सजी आपके सामने पढ़ी हो। कुछ चीजें होती हैं जिन्हें शुरूआत में कड़क होके ना रोका जाय तो वो नासूर बन जाती हैं। 

भईया जो भी है, हमसे तो हजम नही हुई काश हमारी डाईजेशन पावर भी थोड़ा ठीक होती। आप सभी लोगों के विचारों के लिये धन्यवाद। :) और जर्मन लोगों के लिये कही अमित की बात का हम भी समर्थन करते हैं एक की वजह से सब को दोष नही देना चाहिये वरना अगर इसी थ्योरी पर अमल करें तो भारतीयों को कितनी गालियाँ पड़ेंगी।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कमाल है जिसे आधी से ज्यादा जर्मन जनता पचा नही पा रही है उसे यहाँ काफी लोगों ने आसानी से पचा लिया। आज कोई भी देश बाउंड्री बंद करके नही बैठा है, इसलिये आज जो वहाँ बह रहा है, हो सकता है कल बहकर इंडिया भी आये। मुझे इंतजार रहेगा उस दिन का जब उसे भी इंडिया में इसी सहजता से लिया जायेगा जैसा कि आज। </p>
<p>वैसे भी हर देश में सहजता के मायने अलग होते हैं, जैसे यहाँ ट्रेन रोककर उसके डब्बे काट उन्हें आग के हवाले की बात कोई हजम नही कर सकता उसे इंडिया में सहजता से लिया जाता है तभी तो आये दिन ऐसी घटनायें होती रहती हैं।</p>
<p>रहा सवाल चैनलों का तो वो कोई ओपन चैनल नही होते जिसे जब भी कोई देख ले, यहाँ भी हैं। लेकिन ये विज्ञापन एक मैगजीन में है जिसे कोई भी देख सकता है। क्या करियेगा अगर वो मैगजीन किसी दिन इसी तरह के कवर में सजी आपके सामने पढ़ी हो। कुछ चीजें होती हैं जिन्हें शुरूआत में कड़क होके ना रोका जाय तो वो नासूर बन जाती हैं। </p>
<p>भईया जो भी है, हमसे तो हजम नही हुई काश हमारी डाईजेशन पावर भी थोड़ा ठीक होती। आप सभी लोगों के विचारों के लिये धन्यवाद। <img src='http://www.readers-cafe.net/nc/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> और जर्मन लोगों के लिये कही अमित की बात का हम भी समर्थन करते हैं एक की वजह से सब को दोष नही देना चाहिये वरना अगर इसी थ्योरी पर अमल करें तो भारतीयों को कितनी गालियाँ पड़ेंगी।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Sanjeet Tripathi</title>
		<link>http://www.readers-cafe.net/nc/2008/03/13/shockingly-controversial-ad-campaign-in-germany/#comment-12834</link>
		<dc:creator>Sanjeet Tripathi</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 13 Mar 2008 11:33:29 +0000</pubDate>
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		<description>ह्म्म, नॉट शॉकिंग एक्चुअली, दुनिया है सब तरह के मानसिकता/शौक वाले लोग होते हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ह्म्म, नॉट शॉकिंग एक्चुअली, दुनिया है सब तरह के मानसिकता/शौक वाले लोग होते हैं।</p>
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