13 Mar
Posted as रहन-सहन
Tags:advertisement, रहन सहन, controversial, german shepherd, germanyमैने शायद इतना चौंकाने वाला विज्ञापन आजतक नही देखा था, इस पर ज्यादा ताज्जुब इस बात का है कि ये एक महिला द्वारा बनाया गया है और एक महिला के ऊपर ही शूट भी किया गया है। ये विज्ञापन जर्मनी में बनाया गया है और वहाँ की ही किसी मैगजीन के लिये। कह नही सकता कि अगर ये किसी पुरूष दिमाग की ऊपज होती तो इस के ऊपर कितना हंगामा मचता लेकिन जो भी है फिलहाल इसके ऊपर का बवाल इतना नही मचा कि सब जगह सुनायी दे।
इस विज्ञापन के बारे में हम इतना ही लिख सकते हैं कि ये एक महिला मॉडल और जर्मन शैपर्ड कुत्ते के ऊपर शूट किया गया है अब किस तरह से फोटो शूट हुआ है (दोनों लिंक के लिये वार्निंग है - रेड फ्लैग, खासकर फोटो वाला) वो आप यहाँ जाकर खुद पढ़ लें और फोटो शूट के चौंकाने वाले फोटो यहाँ देख सकते हैं।
ये सारा भी रेटिंग पाने का चक्कर है, अटेंशन पाने के लिये कोई कितना नीचे तक सोच सकता है विश्वास नही होता। हमारी बोलती तो अभी तक बंद है अगर आप भी कुछ कहने की स्थिति में नही होते हैं तो भी लिखकर जरूर बतायें कि आप का क्या कहना है।
15 Responses
अशोक कुमार
March 13th, 2008 at 6:46 am
1सब गंदा है पर धंधा है
ब्लागजगत में भी बहुतौ गंद है इधर उधर लोग सस्ती प्रसिद्धी पाने के लिये गंद पेल रहे हैं और उछाल उछाल के कहते है कि ये जनता कि आवाज है
जनता के बीच ऐसी आवाज लगाओ तो इत्ते जुत्ते पड़े की चांद गंजा जाये
kakesh
March 13th, 2008 at 7:32 am
2लिंक तो खुला ही नहीं.चलिये हम आपकी बात मान के ही शौक हो जाते हैं.
sanjupahari
March 13th, 2008 at 8:29 am
3Ab kya kahein…is sharmnak KALMUHI ke barein main kya likhu,,,namuraaad,,,naamuzakkatt,,,nasreeen (i hope ye sab galiyan hi hoti hain urdu main),,,,karam jali,,,,kambakhque,,,kan-khazurii,,,jaaaa tuzhey agle zanam main bhagwan female-german shepherd hi banaye…
विस्फोट
March 13th, 2008 at 9:01 am
4इंसान की बुद्धि कुत्ते से भी गयी गुजरी हो जाए तो वह ऐसे ही सब काम करता है. तकलीफ है कि ऐसे ही कुत्ता मानसिकता के लोग भारत आकर सभ्यता की सीख देते हैं. और हमारी सरकार उन्हें विकास का अग्रदूत मानती है. आखिर यह भी किसी कंपनी का ही विज्ञापन होगा जिसने क्रिएटिविटी के नाम पर यह सब किया है.
थू….
quin
March 13th, 2008 at 12:13 pm
5इसे चोखेरबालियों के ध्यान में लाया जाए……. उनके लिये बहुत अच्छा तरीका है…….. यही तो है New Faminism
जीतू
March 13th, 2008 at 12:44 pm
6सीधा सीधा डिमांड एंड सप्लाई का गेम है ये। जर्मनी मे इस विज्ञापन को देखने वाले अलग नज़र से देखेंगे भारत मे अलग नज़र से। अब चूंकि इंटरनैट से आने से दुनिया एक गाँव सा बन गयी है, इसलिए लोग अलग प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे है।
इसमे इतना हल्ला कैसा? यूरोप मे तो हर तरह से सेक्स प्ले के लिए अलग अलग चैनल है। अगर आप उनको देख ले तो शायद आपा ही खो दें।
amit
March 13th, 2008 at 3:48 pm
7तरूण भाई, कम से कम मुझे तो इसको देख कोई आश्चर्य नहीं हुआ और न ही झटका लगा, कदाचित् इसलिए कि इससे भी अधिक हाई-फाई चीज़े हैं दुनिया में, जैसा की जीतू भाई ने कहा। यह विज्ञापन भारतीय जनता के लिए बनाया गया होता तो अलग बात होती, हल्ला मचता, लेकिन यह जर्मन जनता के लिए है और उनको कोई आपत्ति नहीं, हम काहे अपना खून जला रहे हैं?
महोदय, पहली बात तो यह कि जो चीज़ आपको पसंद न आए इसका अर्थ यह नहीं कि वह घटिया हो गई। उन लोगों की सभ्यता में यह “चलता” है तो आपको क्या दिक्कत? दूसरी बात यह कि यदि मान लिया जाए कि यह गंदी हरकत है तो एक-दो लोगों की इस हरकत के लिए आप पूरी जनता को ही क्यों गाली दे रहे हैं? कल को आप कोई बुरा काम करते हैं तो इसका अर्थ क्या यह होगा कि सभी भारतीय कमीने हैं? थोड़ा संयम रखा कीजिए जनाब और आप इतने समझदार इंसान है तो थोड़ी परिपक्वता भी दिखाई, आपको भला-बुरा कहने का कोई इरादा नहीं है सिर्फ़ आपको यह बता रहा हूँ कि किसी एक-दो लोगों के आधार पर पूरे समाज को नहीं आंका जाता।
संजय बेंगाणी
March 13th, 2008 at 4:20 pm
8हाय तौबा वाली बात समझ में नहीं आयी, शॉकिंग तो कतई नहीं….
Sanjeet Tripathi
March 13th, 2008 at 5:03 pm
9ह्म्म, नॉट शॉकिंग एक्चुअली, दुनिया है सब तरह के मानसिकता/शौक वाले लोग होते हैं।
Tarun
March 13th, 2008 at 7:02 pm
10कमाल है जिसे आधी से ज्यादा जर्मन जनता पचा नही पा रही है उसे यहाँ काफी लोगों ने आसानी से पचा लिया। आज कोई भी देश बाउंड्री बंद करके नही बैठा है, इसलिये आज जो वहाँ बह रहा है, हो सकता है कल बहकर इंडिया भी आये। मुझे इंतजार रहेगा उस दिन का जब उसे भी इंडिया में इसी सहजता से लिया जायेगा जैसा कि आज।
वैसे भी हर देश में सहजता के मायने अलग होते हैं, जैसे यहाँ ट्रेन रोककर उसके डब्बे काट उन्हें आग के हवाले की बात कोई हजम नही कर सकता उसे इंडिया में सहजता से लिया जाता है तभी तो आये दिन ऐसी घटनायें होती रहती हैं।
रहा सवाल चैनलों का तो वो कोई ओपन चैनल नही होते जिसे जब भी कोई देख ले, यहाँ भी हैं। लेकिन ये विज्ञापन एक मैगजीन में है जिसे कोई भी देख सकता है। क्या करियेगा अगर वो मैगजीन किसी दिन इसी तरह के कवर में सजी आपके सामने पढ़ी हो। कुछ चीजें होती हैं जिन्हें शुरूआत में कड़क होके ना रोका जाय तो वो नासूर बन जाती हैं।
भईया जो भी है, हमसे तो हजम नही हुई काश हमारी डाईजेशन पावर भी थोड़ा ठीक होती। आप सभी लोगों के विचारों के लिये धन्यवाद।
और जर्मन लोगों के लिये कही अमित की बात का हम भी समर्थन करते हैं एक की वजह से सब को दोष नही देना चाहिये वरना अगर इसी थ्योरी पर अमल करें तो भारतीयों को कितनी गालियाँ पड़ेंगी।
राज भाटिया
March 14th, 2008 at 1:52 am
11तरुन भाई मे जर्मनी से ही हु, मेने तो यहा ऎसा कोई हगंमा नही देखा, यह सब बाते इन गोरो के लिये नोर्मल हे, भाई आप टेंशन मत ले, अभी गर्मिया शुरु होने दो फ़िर सभी तरफ़ नगं धडंग ही नजर आये गे , *जिसे आधी से ज्यादा जर्मन जनता पचा नही पा रही है * यह आप को किस ने बोल दिया यह सब, अरे यह लोगो के पास भी समय नही सब को अपनी अपनी पढी हे,जर्मन के बारे ज्यादा जान्कारी चाहिये तो मुझे e mail कर ले.
Tarun
March 14th, 2008 at 6:55 am
12चलो भई, जब सबके लिये ये नार्मल है तो हम काहे अपना खून जलायें, राज भाई ये पिछले साल अक्टूबर के आसपास का विज्ञापन है उस समय विरोध हुआ था ऐसा पढ़ा था। चलो इस बहाने आपके पराये देश का नाम तो पता चला
जीतू
March 14th, 2008 at 10:37 am
13तरुण भाई, आप इस पत्रिका के विज्ञापन को पचा ना की बात कर रहे है। जर्मनी के टीवी चैनलो पर आने वाले विजापन देख लें, और छोड़िए, फ्रेंच फिल्मे देखे, इटली के रिएअल्टी शो देख लीजिए, या फिर किसी सैक्स ट्वाय कम्पनी का विज्ञापन देख लें, आप तो शायद बेहोश ही हो जाएं। लेकिन मुझे ताज्जुब है ये आप अमरीका मे बैठकर कह रहे है।
अभी पिछले दिनो मे इटली मे हुई एक सैक्स इक्जीबिशन का लाइव कवरेज देख रहा था। सभी लोग सहज व्यवहार कर रहे थे, हालांकि आधे लोग बिना कपड़े के थे वहाँ। कवरेज मे ही इत्ता सबकुछ था कि जो कि एक आम भारतीय के पैसे वसूल कर दे।
एक राज की बात बताऊं, यूरोप मे लाइव हॉट टेलीफोन लाइन्स होती है, जहाँ पर लड़किया बिना कपड़े पहने, फोन मिलाने वालों से विभिन्न भाषाओं मे बाते करती है।इनका लाइव टीवी ब्राडकास्ट भी किया जाता है। डिमांड एंड सप्लाई का खेल देखिए, अंग्रेजी, यूरोपियन, अरबी भाषा के साथ अब वे हिन्दी मे भी बात करने लगी है। इन कम्पनियों को दोहरी कमाई होती है, एक तो टेलीफोन का खर्चा और टीवी चैनल के लिए फ्री का कंटेट। भारतीयों की (विशेषकर 30+ की बड़ी संख्या है इनको फोन करने वालों की)
Tarun
March 14th, 2008 at 6:33 pm
14आप इस पत्रिका के विज्ञापन को पचा ना की बात कर रहे है। जर्मनी के टीवी चैनलो पर आने वाले विजापन देख लें, और छोड़िए, फ्रेंच फिल्मे देखे, इटली के रिएअल्टी शो देख लीजिए, या फिर किसी सैक्स ट्वाय कम्पनी का विज्ञापन देख लें, आप तो शायद बेहोश ही हो जाएं। लेकिन मुझे ताज्जुब है ये आप अमरीका मे बैठकर कह रहे है।
जीतू भाई, कम से कम अमेरिका में खुलेआम टेलिविजन में मैने ऐसा नही देखा, प्लेबॉय जैसे अलग चैनल हैं जिनके लिये अलग से सब्सक्रिप्सन लेना होता है या फिर किसी किसी में रेटिंग के साथ देर रात में। रही बेहोश होने की बात वो तो मैं होंगा नही क्योंकि ये सब मुझे पता है, रूस में तो एक बार रेटिंग के लिये न्यूज भी टॉप लैस एंकरों से करवायी गयी है। बात यहाँ इस बात की है कि किस माध्यम में किसको लिया गया है और उसे किस तरह से पेश किया गया है और वो नैतिक रूप से कितनी सही है, जानवर की जगह आदमी होता तो कॉमन बात होती लेकिन। बात उस नैतिकता को पचाने की है।
अभी पिछले दिनो मे इटली मे हुई एक सैक्स इक्जीबिशन का लाइव कवरेज देख रहा था। सभी लोग सहज व्यवहार कर रहे थे, हालांकि आधे लोग बिना कपड़े के थे वहाँ।
सैक्स इक्जीबिशन का प्रेसेन्टेशन किस तरह से किया गया है इस पर सब निर्भर करता है, और इस पर असहज होने जैसा कुछ नही। यहाँ न्यूयार्क में भी है ऐसा म्यूजियम है
एक राज की बात बताऊं, यूरोप मे लाइव हॉट टेलीफोन लाइन्स होती है, जहाँ पर लड़किया बिना कपड़े पहने, फोन मिलाने वालों से विभिन्न भाषाओं मे बाते करती है।इनका लाइव टीवी ब्राडकास्ट भी किया जाता है। डिमांड एंड सप्लाई का खेल देखिए, अंग्रेजी, यूरोपियन, अरबी भाषा के साथ अब वे हिन्दी मे भी बात करने लगी है। इन कम्पनियों को दोहरी कमाई होती है, एक तो टेलीफोन का खर्चा और टीवी चैनल के लिए फ्री का कंटेट। भारतीयों की (विशेषकर 30+ की बड़ी संख्या है इनको फोन करने वालों की)
ये तो सभी जगह होती हैं, इसमें कुछ नया नही है यहाँ भी हैं, भारत में भी होंगी नही होंगी तो हो जायेंगी, टेलिफोन तो वैसे भी सस्ता हो गया है।
अनूप शुक्ल
March 14th, 2008 at 9:43 pm
15देखा। फोटो भी और कमेंट भी। कमेंट भी कम मजेदार नहीं हैं। फोटो का उद्देश्य to draw attention as much as possible पूरा हुआ।
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