8 मार्च यानि एक बार फिर महिला दिवस, ऐसे समय में दो चौंकाने वाली खबरें जो बताती हैं कि अभी भी बेटियाँ कोई नही चाहता। ताज्जुब की बात ये है कि पढ़े लिखे लोग भी ऐसी संकुचित सोच रखते हैं।

अब पहले ही बच्चे के लिंग का पता चल जाने की वजह से कई लोग लड़कियों को पहले ही मरवा डालते हैं। अगर इस खबर की मानें तो करीब 10 लाख लड़कियाँ ऐसे सलेक्टिव गर्भपात की शिकार हो चुकी हैं।

देश छुट गया लेकिन मानसिकता नही बदली, इसलिये देश छोड़कर इंग्लैंड में जा बसी भारतीय महिलायें भी बेटे की चाह में लड़कियों को पैदा होने से पहले ही मरवा देती हैं। ऐसा माना जाता है कि वहाँ 1990 के बाद से ऐसी लड़कियों की संख्या कोई 1500 के आसपास पहुँच गयी है। यही नही अगर एक भारतीय महिला की बात माने तो अब इंग्लैंड की कुछ महिलायें भी इस नक्शे कदम में चलना शुरू कर रही हैं।

इस खबर से ये भी पता चलता है कि सलेक्टिव गर्भपात के ऐसे मामले खासकर पंजाब और गुजरात प्रांत में ज्यादा देखने में आये हैं।

ये तो था तस्वीर का एक पहलू, इसी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है जो नीचे के दो विडियों में देखने को मिलता है। ये खास उनके लिये जो लड़कों को हमेशा लड़कियों के ऊपर तरजीह (Importance) देते हैं।

Education helps you to see what is wrong in the world and gives you the confidence to question it.
- Bhanwari Malavat, Police Constable

पहला विडियो है बिकानेर राजस्थान की पुलिस कांस्टेबल भंवरी मालावत के ऊपर, जिसकी शादी बचपन में ही हो गयी थी लेकिन बावजूद इसके वो स्कूल गयी, फेल भी हुई लेकिन फिर से पढ़ाई करने गयी और फिर जब एक दिन किरन बेदी के बारे में सुना तो उसने तय किया कि वो भी पुलिस में जायेगी और दुनिया में एक बदलाव लाने का हिस्सा बनेगी।


दूसरा विडियो जमखेद नामके एक ऐसे ग्रुप के बारे में है जो गांवों में जाकर किशोर लड़कियों को जागरूक बनाने के साथ साथ उनमें आत्मविश्वास भी भरता है और इस प्रोग्राम का नाम है Jamkhed CRHP Adolescent Girls Program (AGP), CRHP stands for Comprehensive Rural Health Project। ये प्रोग्राम खासकर भारत के ग्रामीण इलाकों में लड़कियों की दशा सुधारने के मकसद से बनाया गया है।

The need for an adolescent girls program is to address the extreme gender inequity and the low status of women in Indian society, particularly in the rural areas. Girl children are given far less opportunities than boys and are considered a burden on the family due to the eventual need for dowry and their marriage out of the family. They are consequently disadvantaged in such areas as education, nutrition, health care, employment and social mobility. The practice of sex-selective abortions and female infanticide is another manifestation of women’s poor social standing and has resulted in highly skewed gender ratios throughout India, particularly in the North. Early marriage, sometimes prior to puberty, often results in early sexual initiation and teenage pregnancy thereby compromising education and livelihood choices. Such are the factors that are being addressed and even reversed through the participation of girls in the AGP.





अंत में पिछली पोस्ट की एक टिप्पणीः
सुजाता ने कहा, “गज्जब की चीज़ दिखाई आपने । शुक्रिया ! अब तो लगता है इसे बैन ही कर देना चाहिये । पर ये बैन अगर महिलाओ का सेल्फ इम्पोज़्ड हो तो ज़्यादा अच्छा है न!”

सुजाता, महिलाओं के खिलाफ ये कोई साजिश नही ना ही उन्हें कम आंकने की कोई कोशिश ये तो सिर्फ घटिया रसायन के प्रभाव से बचाने की एक कवायद है जैसे कि उन्मुक्तजी ने अपनी टिप्पणी में कहा। जहाँ तक सेल्फ इम्पोज्ड बैन की बात है तो वो तो कैसे भी हो सकता है चाहे ये प्रोडक्ट मार्केट में आये या ना आये।

अब जाते जाते समीर, सुजाता, जूली, ममता, संजीत, घुघूती बासूती, उन्मुक्त, ज्ञानजी, संजू और अमित सब को टिप्पणी देने और अपने विचार रखने के फलस्वरूप एक निठल्ली झप्पी।

अब से पिछली पोस्ट पर पड़ी टिप्पणियो पर निठल्ली झप्पी का ये सिलसिला आगे भी जारी रहेगा, इसे हमारी तरफ से एक छोटा सा शुक्रिया समझें।

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