एक दिन में ही आकाश छुने की चाहत
आज जो कुछ हिंदी ब्लोग जगत में हो रहा है, और कल जो कुछ हिंदी ब्लोग जगत में हुआ था वो सब इसी चाहत का नतीजा है। ऐसा नही है कि ये आज थम गया तो फिर नही होगा, ये कल भी हुआ था, आज भी हो रहा है और आगे भी होगा। जब तक व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है ऐसा ही कुछ होता रहेगा।
पिछले साल जो हुआ था तब मुझे लगा था वो शर्मनाक था लेकिन अब जो कुछ हो रहा लगता है नही ये शर्मनाक है लेकिन हो सकता है आने वाले वक्त के समीकरणों के सामने आज की घटना कम शर्मनाक लगे। किसी १-२ या ५-६ पोस्ट के चलते किसी ब्लोग को बैन करने की बात कुछ जमती नही शायद, हाँ जिन पोस्ट या लेख को लेकर समस्या है उन पोस्ट के लिये विरोध दर्ज किया जाना चाहिये।
एक दूसरे पर व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप से किसी का कोई भला नही होने वाला और इस तरह के आरोपों का कोई अंत भी नही है। अगर मेरी यादाश्त गलत नही है तो इस तरह की तू-तू मैं मैं पत्रकारों के ब्लागिंग में आने के बाद ही शुरू हुई मानो वो एक ही दिन में वो पा लेना चाहते हैं जो अब तक हासिल नही कर पाये।
और ऐसा लगता है बहती गंगा में हर कोई ज्यादा से ज्यादा हिट पा लेना चाहता है, मैने कभी सुना था पुलिस वाले किसी के सगे नही होते लेकिन जिस तरह से पर्सनल बातें सार्वजनिक हो रही हैं उससे हो सकता है कल कोई कहे पत्रकार किसी के सगे नही होते।
ऐसा भी नही है कि जो कुछ हुआ वो किसी एक क्रिया की प्रतिक्रिया हो बल्कि ये तो कई छोटी छोटी घटनाओं की परीणिती है। लेकिन इन सबमें मनीषा कम से कम मेरी नजरों में एक ऐसी हिम्मती महिला चिट्ठाकार के रूप मे नजर आयी हैं जिन्हें ना किसी महिला चिट्ठाकारा के शब्दों और सहारे की जरूरत है और ना किसी ऐसे पुरूष चिट्ठाकार की जो मदद के नाम पर किसी भी तरह के फायदे की सोचता हो।
मै तो यही कहूँगा कि सब अपने अपने चिट्ठों से ऐसे व्यक्तिगत आक्षेप वाले पोस्ट वापस लेकर फिर से विचारों के इस सफर को वापस पटरी पर ले आयें, अब ये कितना संभव है कह नही सकता। हो सके तो कम से कम इतना जरूर करें कि जो जनता आज टीवी पत्रकारिता को गलियाती है कल कहीं वो ब्लोगर पत्रकारिता को लेकर गलियाना शुरू ना कर दे, बस इतना ध्यान रहे। बाकि तो यहाँ सभी कम से कम इतने समझदार तो होंगे जो सही गलत का फैसला खुद कर सकें। अंत में एक शेर को दोहराना चाहूँगा,
दुश्मनी जमकर करो, मगर इतनी गुँजाईश रहे
कल अगर हम दोस्त बन जायें तो शर्मिंदा ना हों।
सही ।
घुघूती बासूती
बिल्कुल ठीक कह रहे है।
सत्यवचन महाराज!!
हमारे और निठल्ले के विचार कुछ मिलते से हैं।
हो सकता है कल कोई कहे पत्रकार किसी के सगे नही होते।
मैंने पहले ही ऐसा सुना है तीन P यानी प्रेस, पुलिस और पोलिटिशियन को कोई भी बैंक लोन नहीं देती। बुजुर्ग लोग तो इनके साथ साथ वकीलों का नाम भी लेते हैं और कहते हैं कि इन सबसे दोस्ती और दुश्मनी दोनों ही नहीं होना चाहिए।