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चिट्ठाजगत जैसे चांदनी चौक, ब्लोगवाणी जैसे कोयल की कूक

बहुत दिनों से सोच रहा था कि इन दोनों को आमने सामने रख के तोलूँ, अब आप पूछोगे कितने दिनों से? तो जनाब उन दिनों से जब चिट्ठाजगत का स्वरूप धारावी (मुम्बई की मशहूर झोपड़पट्टी) जैसा हो गया था। लेकिन हर वक्त कंप्यूटर खोलते ही भूल जाता था।

पिछले कई हफ्तों से मैने नोट किया है मेरे सभी चिट्ठों मे ज्यादातर लोग ब्लोगवाणी से आते हैं इसका सीधा सा मतलब है कि ज्यादातर लोग ब्लोगवाणी को प्राथमिकता देते हैं। अब सोचने वाली बात ये है कि ब्लोगवाणी में ऐसा क्या है जो चिट्ठाजगत में नही।

ब्लोगवाणी का जो इंटरफेस है (यानि कि पेज) वो बहुत ही साफ सुथरा वैसा ही जैसा किसी समय नारद का होता था (यानि नयी बोतल में पुरानी दारू) जो आजकल अपने ट्रांजिशन फेस से गुजर रहा है। वहीं अगर चिट्ठाजगत की तरफ देखें तो ये पहली नजर में ही दिल्ली की चांदनी चौक जैसा दिखता है पता ही नही चलता रोड कहाँ पर खत्म है और दुकान कहाँ पर शुरू, वहाँ की भीड़भाड़ जैसा। आज जब चिट्ठाजगत देखा तो वहाँ थोड़ी सफाई हुई है लगती है लेकिन अगर आप दूसरी गली की तरफ जाओ यानि कि दूसरे पेज में तो चिट्ठाजगत का चौखटा ही बदल जाता है वही पुरानी ईस्टायल में पोस्ट दिखायी देने लगी है यानि पेजों की दिखावट में समानता नही है।

दूसरा चिट्ठाजगत के नये फारमेट में जो ग्रुपिंग के डब्बे लगे हैं उनका कोई इतना उपयोग नही दिखता क्योंकि अधिकांश में वो ही पोस्टे दोहराती हैं जो सबसे बायें कॉलम में हैं। तीसरा इसके प्रथम पेज में सबसे नीचे दिखने वाले चिट्ठाजगत के नये लिक्खाड़ का लॉजिक क्या है समझ नही आता क्योंकि इसमें हमने अभी अमित गुप्ता का नाम देखा है जो कम से कम नये लिक्खाड़ तो कतई नही हैं।

चौथा इसका हैडर ब्लोगवाणी से कम से कम दुगनी जगह लेता है साथ ही ये इतना ज्यादा कलरफुल है कि आंखों में चुभता है। और अंत में चिट्ठाजगत की भाषा यानि कि हिन्दी जो है वो सरल बिल्कुल नही है इसलिये कई शब्दों को समझने में या तो वक्त लगता है या समझ में ही नही आते।

ऐसा नही है कि मेरी नजर में चिट्ठाजगत में सब नकारात्मक चीजें ही हैं इसका सबसे बड़ा प्लस प्वाइंट ये है कि ये फिलहाल तकनीकी रूप से सबसे उन्नत है यानि ब्लोगवाणी और नारद से आगे है। ये पॉडकास्ट और वॉडकास्ट वाली पोस्टों को अलग से दिखाता है शायद ये Manual किया जाता है क्योंकि कई बार मेरी वो पोस्ट इसमें नही दिखती जिसमें मैने विडियो दिया हो। चिट्ठाजगत में उससे कही ज्यादा है जिसकी एक सामान्य पाठक को दरकार होती है।

संक्षेप में व्यावहारिक भाषा में समझाऊँ तो ये उस लड़की (महिला ब्लोगर इसे लड़का पढ़ें) की तरह है जो दिखने में तो सुंदर नही हैं लेकिन दिमाग या सीरत में जबरदस्त है। और ज्यादा डिटेल में मैने चिट्ठाजगत को देखा नही है लेकिन जब शुरूआती दिनों में चिट्ठों को क्लेम करने वाली प्रोसेस पढ़ रहा था तो उसमें लिखे ज्यादातर शब्द मेरे सिर के ऊपर से निकल गये थे।

अब बात करते हैं कोयल की कूक यानि ब्लोगवाणी की, जहाँ इसके पेज में दिखने वाले शब्दों में व्यवहारिकता का ईस्तेमाल हुआ है वहीं इसके इंटरफेस (यानि पेज) में सादगी है जिसे पढ़ने या कुछ ढूँढने में आंखों में जोर नही पढ़ता। दूसरा किसी भी पेज में जाओ पोस्ट और चिट्ठों के Display में समानता रहती है। ये नही कि पहले पेज में चिट्ठे और ढंग से दूसरे में किसी और ढंग से सजायें हों।

कुछ समस्यायें ब्लोगवाणी में भी हैं जैसे इसके दूसरे कॉलम में दिखने वाले Tab, जिसमें अभी पढ़े जा रहे, आज ज्यादा पढ़े गये का लॉजिक कुछ समझ में नही आता। क्योंकि कई बार ज्यादा हिट वाले आलेख ज्यादा पढ़े गये में शामिल नही होते और कम हिट वाले इसमें दिख जाते हैं। जैसे अभी शायद १ या २ दिन पहले इसमें कोई तो आलेख था जो ज्यादा पढ़े गये में दूसरे या तीसरे नंबर पर दिख रहा था और उसके आगे हिट संख्या आ रही थी १। अभी पढ़े जा रहे हैं को समझने के लिये हमने कई बार उन ब्लोगस को ओपन करके रखा जो इसमें नही दिखते जैसे कि मैने अपने ब्लोग को ओपन करके रखा लेकिन फिर भी वो इसमें नजर नही आया।

ब्लोगवाणी की सबसे बड़ी खामी ये है कि ये कहीं पर भी नही बताता कि ब्लोगवाणी में कोई अपने चिट्ठे को अगर जोड़ना चाहे तो कैसे जोड़ेगा, उसकी क्या प्रोसेस है। ब्लोगवाणी में एक प्रोब्लम और है ये कि किसी भी पोस्ट को बगैर पढ़े उसमें पसंद करने के लिये क्लिक किया जा सकता है, अब बगैर पढ़े वैसे तो कोई पसंद पर क्लिक करेगा नही फिर भी लॉजिक से ये है तो गलत ही।

लेकिन इन सबके बावजूद ये दोनों हिंदी चिट्ठों को एक जगह (मंच) में लाने में कारगर सिद्ध हुए हैं। इन दोनों की ये विवेचना प्रथम दृष्टि के हिसाब से की गयी है यानि कि पहले पहले इनको देखकर एक सामान्य पाठक के मन में क्या विचार आ सकते हैं वो बताने की कोशिश की है। आशा है चिट्ठाजगत और ब्लोगवाणी का प्रबंधन इसे सकारात्मक दृष्टि से लेगा और इन्हें और बेहतर बनाने की कोशिश में लगा रहेगा।

हाँ एक बात और, चिट्ठाजगत में फीड से पढ़ने वालों की संख्या ये ७२२ बता रहा है क्या वाकई में इतने लोग इसे फिड से पढ़ते हैं?

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12 Responses to “चिट्ठाजगत जैसे चांदनी चौक, ब्लोगवाणी जैसे कोयल की कूक”

  1. Sanjeet Tripathi Says:

    सटीक विश्लेषण!!
    सहमत!!
    चिट्ठा जगत का इंटरफेस वाकई आंखो को चुभता है।
    और शुद्ध संस्कृतनिष्ठ हिंदी का आग्रह हमेशा ही लोगों को दूर करता है।

    ब्लॉगवाणी पर चिट्ठे जोड़ने वाली समस्या का उल्लेख आपने सही किया पर पहले ही ब्लॉगवाणी की ओर से इस मुद्दे पर कहा जा चुका है कि ब्लॉगवाणी बनाने का उद्देश्य प्रथमतया स्वांत: सुखाय है इसलिए चिट्ठे जोड़ने की सुविधा शायद उसमें नही दी गई है।

    चिट्ठा जोड़ना हो तो उन्हें ई मेल कीजिए, अगर उन्हे चिट्ठा अच्छा लगा तो जोड़ दिया जाएगा।या फिर जो चिट्ठा अगर उन्हे लगता है कि इसे ब्लॉगवाणी मे होना चाहिए उसे वे खुद ही जोड़ देते हैं बिना ई मेल किए ही।

    इसमें कोई दो राय नही कि आज अगर सबसे ज्यादा प्रयोग किया जाना वाला कोई एग्रीगेटर है तो वह ब्लॉगवाणी ही है भले ही उसका निर्माण स्वांत: सुखाय किया गया हो।

  2. poonam Says:

    बहुत सही लिखा है आपने.

  3. Cyril Gupta Says:

    तरुण जी,

    आपने ब्लागवाणी कि कमियों की और ध्यान दिलाया. धन्यवाद.

    हमारी कोशिश जारी है. समय जैसे-जैसे गुजरेगा, आप ब्लागवाणी में बदलाव देखते रहेंगे. ये एक ऐसा प्रोजेक्ट है जिस पर काम करना बहुत ही सुखदायक है हमारे लिये.

    हम कोशिश करेंगे की आपके बताई हुई कमियां दूर हों. आप हमें बताते रहें की क्या पसंद आया, और क्या नापसंद.

  4. mamta Says:

    बहुत खूब और बहुत बारीकी से विश्लेषण किया है आपने।

  5. रवीन्द्र रंजन Says:

    बिल्कुल सही बात कही है आपने। मैंने भी इस बात को गौर किया है।

  6. Amit Says:

    ब्लोगवाणी का जो इंटरफेस है (यानि कि पेज) वो बहुत ही साफ सुथरा वैसा ही जैसा किसी समय नारद का होता था

    था से क्या कहना चाहते हो तरूण भाई? नारद से ज़्यादा साफ़-सुथरा और simple और easy-to-use इंटरफेस आज भी किसी अन्य एग्रीगेटर का नहीं है, सिंपल तरीके से पोस्ट आदि प्रस्तुत होती हैं और ध्यान भटकाऊ कोई चीज़ नहीं दिखती। :)

    चिट्ठाजगत के नये लिक्खाड़ का लॉजिक क्या है समझ नही आता क्योंकि इसमें हमने अभी अमित गुप्ता का नाम देखा है जो कम से कम नये लिक्खाड़ तो कतई नही हैं

    ही ही ही!! हो जाता है कई बार तकनीकी लो़चा तरूण भाई। :D अब देखना विपुल जी और आलोक भाई जल्दी इसके सुधार पर लग लेंगे। :)

  7. eswami Says:

    तरुण,

    चिट्ठाजगत का कोड तेजी, परिपक्वता और तकनीक में दूसरों से उतना ही आगे है जितना द्रूपल का कोड वर्डप्रेस से आगे है!:)

    ये और बात है की जनता को आसान इन्टरफ़ेस ही पल्ले पडता है – नारद नें उसे इतना आसान कर दिया है की वो नारद-लाईट हो कर दूसरे सिरे पर पहूंच गया है!

    जरूर, इन्टरफ़ेस डिज़ाईन विपुल भाई का स्ट्रांग पाईंट भले ही ना हो लेकिन सधा हुआ तेज़ काम करने वाला और MIS स्तर की जानकारी सीधे देने वाला कोड लिखने में वो बाकी सब से मीलों आगे हैं.

  8. sanjupahari Says:

    haaan bhaiyyaa ekdam saaf suthra hai…waise apni koshish bhi jari hai aapko aur bhi bahut saare takiya kalaam (oooppss sorry meri hindi bhatkau kisham ki shararati hoti jaa rahi hai blog pad pad ke)..haan to main kah raha tha ki aaram deh takiyaaa khooz rahe hain fir dekhoo aur bhi maza aata rahega pad-pad ke

  9. Tarun Says:

    @संजीत, मै यही कहना चाह रहा हूँ कि ये कहीं पर लिखा होना चाहिये जिसपर किसी नये ब्लोगर की नजर तुरंत पढ़ सके।

    @पूनम, सिरिल, ममता, रविन्द्र :)

    @अमित, था इसलिये कहा क्योंकि अंतिम सूचना के मुताबिक इस पर अभी भी काम चल रहा है यानि कि ट्रांजिसन फेस और अगर जो अभी है वही फाईनल है तो वो कुछ ज्यादा ही साफ और फीका सा है। इससे पहले वाला कहीं बेहतर था ऐसा मुझे लगता है।

    हाँ लोचा वो जल्दी सुधार लेंगे ये तो पक्का है

    @स्वामीजी, इसमें कोई दो राय नही है और मैने भी यही कहा है बल्कि मैने तो ये भी लिखा था कि चिट्ठाजगत उससे कहीं अधिक देता है जिसकी समान्य पाठक को दरकार होती है। लेकिन मैने ये जनता की नजर से ही लिखा है इसलिये इंटरफेस पर ही जोर दिया। बाकि तकनीक के मामले मै तो विपुल आगे हैं ही वो तो दिखता ही है लेकिन जनता और मार्केट में इंटरफेस ज्यादा जरूरी है इसलिये उस पर ध्यान देना भी ज्यादा जरूरी है।

    @संजू भाई, क्या बात है :)

  10. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह Says:

    भाई आपने सत्‍य कहा है, और आपकी काफी बातों से मै सहमत हूँ और कई बार मैने भी उपरोक्‍त बातों को लाया, फिर उन्‍ही बातों को पढ़कर अच्‍छा लगा। आपका विश्‍लेषण अच्‍छा है :)

  11. Amit Says:

    था इसलिये कहा क्योंकि अंतिम सूचना के मुताबिक इस पर अभी भी काम चल रहा है यानि कि ट्रांजिसन फेस

    काम तो निरंतर चलता ही रहेगा तरूण भाई। वैसे जैसे गूगल वाले और उसकी नकल करने वालों को “बीटा” लाँच करने का चस्का लगा तो हमने थोड़ा हट के काम किया और “एल्फ़ा” वर्जन ही लाँच कर दिए!! ;)

  12. हरिराम Says:

    उत्तम समीक्षा.

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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