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…और ब्लोगिंग के 4 साल पूरे

February 15th, 2008 | 31 Comments | Posted in खालीपीली

आज हमें ब्लोगिंग करते हुए ४ साल पूरे हो गये हैं, आज से ४ साल पहले जब हमने ये चिट्ठाकारी शुरू करी थी तब सोचा भी ना था कि इतनी देर तक टिक पायेंगे।

रेडिफ की साईट सर्फ करते समय हमें एक दिन एक लिंक दिखा ब्लोग, शायद पहले सुना था लेकिन तब पता नही था होता क्या है इसलिये जिज्ञासा वश हमने एक ब्लोग वहाँ बना लिया, तारीख थी १० फरवरी २००४। कुछ दिन समझने और खुद को समझाने में लगे फिर १५ फरवरी २००४ को पहली पोस्ट लिखी जिसमें हमने खुद ही ब्लोगिंग का C-Section करते हुए इसको बताने की कोशिश करी। जो कुछ यूँ थी,

B-log: what does that mean
when first I heared about blog, I didn’t pay any attention and then a year later after coming from India, one day suddenly I started c-section of ‘blog’. Log is widely used in computer term to store error message or some kind of history of program. In the same fashion, I believe when someone starts building history of their thoughts we call it ‘Blog‘ (building logs). I also believe blog is a unisex, how? when “Banda” (male) writes a log it’s blog or if “Bandi” (female) writes a log still it’s blog. That’s the reason it’s unisex. Blog is with no “C” that means their is no copywite for it. So Finally here is the result:

Patient name: Blog
Diagnosis: in-progress
Other operations: possible and could be done by AAA (Anyone, Anywhere, Anytime)

अरे नाम तो अभी तक बताया नही क्या रखा, नाम हमने रखा “मॉय लोनली प्लेनेट” ये ब्लोग अंग्रेजी में था। बस फिर धीरे-धीरे एक करके पोस्ट लिखनी शुरू करी। जब कुछ लिखने का मन नही किया तब ब्लोग टेंपलेट बदलने बैठ गये। १ साल तक वहाँ रेडिफ ब्लोग में टिके रहे फिर ब्लोगर का पता चला तो १ साल बाद यानि ९ फरवरी २००५ को अपना लोनली प्लेनेट ब्लोगर में शिफ्ट कर दिया और अपनी पहली पोस्ट लिखी

ब्लोगर में ये सुविधा है कि आप सबसे ऊपर दिये गये Next के लिंक पर क्लिक करके दूसरे ब्लोगों में आसानी से जा सकते हैं। ऐसे ही लंच के वक्त आफिस में Next Next क्लिक करते करते हम पहुँचे रोजनमचा, और देखकर चौंक गये कि अरे ये ब्लोग तो हिंदी में है। लेकिन किसी कारणवश इससे पहले की इस नाम को ढंग से समझ पाते ब्राउजर बंद करना पड़ा और उसके बाद ये ढूँढे से भी ना मिला। हमें इतना पता चल चुका था कि हिंदी में लिखा जा सकता है कैसे लिखना है ये पता लगाना हमारे लिये आसान था। जल्दी से गुगल किया और रेडिफ की ही साईट पर कोई आलेख दिख गया हिंदी लिखने के बारे में।

फिर निठल्ला चिंतन नाम से हिंदी ब्लोग बना २६ फरवरी २००५ को पहली हिंदी पोस्ट पोस्ट कर दी जिसकी घोषणा अंग्रेजी ब्लोग में भी उसी दिन कर दी। ताज्जुब तो अगले दिन हुआ जब देखा अपनी २ लाईन की हिंदी पोस्ट में १०-१२ कमेंट आ गये और इसी के साथ बाकि हिंदी चिट्ठाकारों का पता भी चल गया। उनमें से अभी बहुत कम लोग सक्रिय हैं। आज की तारीख में आपको मेरी पुरानी पोस्टों में एक भी टिप्पणी नजर नही आयेगी उसकी वजह उस समय ब्लोगर में एक बग का होना था जिसका पता हमें नही था। काफी महीनों तक एक ही तरह का टैंपलेट उपयोग में लाते लाते जब मन भर गया तो एक दिन टैंपलेट बदलने की सोची और वहीं गलती कर दी। नया टैंपलेट बदलते ही सारी टिप्पणियाँ गायब, पता नही ये प्राब्लम अभी भी है या ठीक हो गयी।

लेकिन एक बात पक्का थी तब पढ़ने वाले और टिप्पणियों में बड़ा अच्छा अनुपात होता था यानि कि अगर १० लोगों ने पड़ा तो ७ टिप्पणियाँ तो आ ही जाती थी। उस वक्त मुश्किल से हिंदी चिट्ठाकार भी १०-१५ ही थे। आज पढ़ने वाले तो बढ़ गये लेकिन टिप्पणियों की संख्या घट गयी।

मुंगेरी के नाम से एक कहानी भी शुरू करी साथी चिट्ठाकारों ने पसंद तो किया ही साथ में उत्साहवर्धन भी किया लेकिन वो कहानी ३-४ भाग लिखने के बाद भी आज तक पूरी नही कर पाये। इसकी एक मुख्य वजह उस पेपर का खो जाना भी था जिसमें हमने ये लिखी हुई थी।

इस दौरान साथी चिट्ठाकारों के ब्लोग देखते देखते किसी किसी के ब्लोग में अनुगूँज लोगो दिखता तब समझ नही आता था कि ये क्या बला है, फिर जब पता चला तब हमने अपनी पहली अनुगूँज प्रवष्टि “आशा ही जीवन है” के लिये लिखी जिसमें शुरूआत कुछ इस तरह से करी।

आशा ही जीवन है, सुनने मे बड़ा अच्‍छा लगता है लेकिन अगर देखा जाये तो अपने देश में क्‍या ये संभव है। क्‍योंकि आशा स्‍त्रीलिंग है, जीवन पुलिंग और अपने देश में आशा और जीवन के बीच कितना अन्‍तर है ये बताने की जरूरत नही है। जहाँ आशा को किसी श्राप से कम नही समझा जाता हो वहाँ कैसे कह सकते हैं कि आशा ही जीवन है।…

इस हिंदी ब्लोग की शुरूआत के २-३ महीने बाद हमने लिखी “उत्पत्ति निठल्ला चिंतन की” (इसे पढ़ेंगे तो आपको उस दौरान के हिंदी चिट्ठों के नाम पता चल जायेंगे), फिर अपनी एक फोरम (eCharcha) के सदस्यों के नामों का उपयोग करके “एक पाती प्रीटी वूमेन के नाम” लिखी जिसमें इंडिया से अमेरिका तक के सफर के बारे में लिखते हुए कहा,

यहाँ एक बात मेरी समझ मे नही आयी कि हम सब लोग तो यहाँ ‘विदेशी’ हैं फिर क्‍यों एक दूसरे को देशी कहते हैं। ऐसे ही दिन गुजरने लगे। एक दिन फिर मै न्‍यूयार्क गया, इंडिया मे अपने शहर मे छोटी-छोटी गलियां हुआ करती थीं यहाँ ‘बिग-ग’लियां थीं। टाईम स्‍कवायर मे रात के वक्‍त ऐसा लगा जैसे सैकड़ों ‘चिराग २०००’ वोल्‍ट के जल रहे हों। वक्‍त गुजरने के साथ-साथ मेरा स्‍टेटस भी एन आर आइ का हो गया लेकिन मै अपने को ‘इ-एनआरआइ’ कहलाना पंसद करता था। एन आर आइ होते ही मै अमेरिका की बड़ी-बड़ी बातें करने लगा और इंडिया मुझे एक बेकार सा देश लगने लगा।…

अपने ई-स्वामी भी उस फोरम के सदस्य थे ये हमें बाद में पता चला। प्रीटी वूमेन के बाद आया नंबर परफेक्ट लवर का जिसके लिये हमने कहा “आवारा पागल दिवाना यानि परफेक्ट लवर“,

आवारा पागल दीवाना होना यह प्रेमी कहलाने या बनने से पहले की पूर्व आवश्‍यकतायें हैं, अगर यह गुण आप में नही तो बेहतर होगा कि कोई और कैरियर (पति/पत्‍नी) तलाश लें। अगर आप अपने काम में या कहीं किसी और बात में व्‍यस्‍त रहेंगे तो जनाब प्रेम या प्रेमी के लिये वक्त कहाँ से निकालेंगे इसलिये आवारा होना जरूरी है।…

आज से ठीक एक साल पहले यानि १५ फरवरी २००७ के दिन हमने अपनी बनायी पहली फिल्म रीलिज की जिसका नाम था “इंटरव्यू“। ऐसे ही धीरे धीरे अलग अलग प्रयोग करते करते वक्त आगे बढ़ता गया और आज ठीक ४ साल बाद जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो पाते हैं इस पूरे सफर में जहाँ हमने बहुत कुछ सीखा वहीं लोग मिलते-बिछड़ते रहे।

अब तक तो आपने नोट कर ही लिया होगा चिट्ठों से संबन्धित ज्यादातर महत्वपूर्ण तिथियाँ फरवरी में आकर रूक जाती है, इसलिये अब ये भी बता ही देते हैं कि २ साल पहले १८ फरवरी २००६ को हमारे ब्लोग उत्तरांचल की शुरूआत हुई और यही नही १ साल पहले यानि १८ फरवरी २००७ को ही तकनीकी ब्लोग कंट्रोल पैनल शुरू किया जिसे बीच में वक्त ना मिलने के कारण सस्पेंड कर दिया था और अब फिर से चालू कर दिया। बस ऐसे ही लगभग डेढ़ साल पहले ब्लोगर से अपने स्थायी निवास में शिफ्ट कर लिया। ये तो बताना रह ही गया कि इसी बीच एक फोटो ब्लोग भी शुरू किया था शायद ये इसलिये रह गया क्योंकि ये फरवरी में शुरू ना करके अगस्त में किया था।

ये सफर अभी भी चालू है और कब तक रहेगा ये तो आने वाला वक्त ही बतायेगा लेकिन आज के दिन मैं उन सभी लोगों का आभार व्यक्त करना चाहता हूँ जो मेरे इन चिट्ठों में आकर इन्हे पढ़ते हैं, टिप्पणियाँ करते हैं। ये पढ़ने वालों का अपनापन ही कुछ ना कुछ लिखते रहने की प्रेरणा देता है। एक बार फिर आप सभी लोगों को बहुत बहुत धन्यवाद।

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31 Responses to “…और ब्लोगिंग के 4 साल पूरे”

  1. संजय बेंगाणी Says:

    याद आ गया मुझको गुजरा जमाना…

    बधाई.

  2. ashish maharishi Says:

    Badhai ho

  3. हर्षवर्धन Says:

    बधाई हो आपको। ब्लॉगिंग के पुरातन विद्यार्थी।

  4. उन्मुक्त Says:

    चार साल पूरे करने की बधाई।

  5. Sanjeet Tripathi Says:

    एह लो आप भी फरवरी में ही पधारे हो इधर, मतबल जे कि सबै महान लोग इधर फरवरी में ही आए हैं ब्लॉगजगत में ;)

    बधाई हो चार साल पूरे होने की,
    सीख तो हम आप जैसे वरिष्ठों से रहे हैं साहब जी!!
    शुभकामनाएं

  6. poonam Says:

    आपका सफर रोचक भी है और निरन्तर प्रगतिशील भी. चार साल पूरे हुए इस उपलब्धि के लिये बधाई

  7. अनूप शुक्ल Says:

    चार साल पूरा करने पर बधाई। निठल्ले चिन्तन पर मैंने कई यादगार पोस्टे जिनमें कई चुलबुली हैं , कई बुलबुली , पढ़ी हैं। होली के अवसर पर कुमायूंनी होली के बारे में लिखी पोस्ट यादगार है। आगे धीरे-तेज कैसे भी नियमित लेखन के लिये शुभकामनायें।

  8. ghughutibasuti Says:

    शुभकामनाएँ ! फिर वही महीना है फरवरी का, कुछ नया कर डालिये ।
    घुघूती बासूती

  9. mahendra mishra Says:

    char sal safalata pooravak poore karne ke liye apko meri or se dhero shubhakamana

  10. kirtish Says:

    ओ… हो…..आप तो ब्लोगिंग की दुनिया के एंटीक पिस है. :)
    लगे रहिये…….आपको चार साल पूर्ण करने की बधाई और आगे के सफर के लिए ढेरों शुभकामनाएं.

  11. Debashish Says:

    Badhai! Aur likho, khoob likho :)

  12. mamta Says:

    चार साल पूरे करने की बधाई।

    आज इसी बहाने आपके पिछले चार साल के सफर के बारे मे भी पता चलगया।

  13. सृजन शिल्पी Says:

    बधाई, तरुण जी। चार साल तक निठल्ला चिंतन उसी अंदाज में जारी रख सके और अब भी वही जोश, उत्साह और सक्रियता बरकरार है। यह अंदाज बना रहे…..

  14. kakesh Says:

    बधाई.

  15. प्रियंकर Says:

    बहुत-बहुत बधाई ! चौथी सालगिरह मुबारक हो !

  16. yunus Says:

    मुबारक हो जी मुबारक हो

  17. Gyan Dutt Pandey Says:

    बहुत मुबारक। चार साल और हांफे नहीं। भैया काहे के बने हो और कौन चक्की का खाते हो!

  18. swapandarshi Says:

    badhaayee
    tike rahe

  19. surjeet Says:

    lakh-lakh badhaiyan

  20. सागर नाहर Says:

    पूरे चार चार साल के होने पर बहुत बहुत बधाई। :)

  21. sanjupahari Says:

    अब इससे बड़ा और क्या सबूत लेके मानोगे अल्लहढ॰ जवानी मैं…. अभी अब निठल्ला चिंतन आगे बढ रहा है इसका और क्या प्रूफ़ मंगूगे भैय्या देखो अभी भी लेख कम नही हुवे हैं ,,मुझं से पहले २० लोग आपको बधाई दे चुके हैं ………….अब तो भैय्या मिठाई बनती है मियाँ ….एक तो चार साल उपर से २० लाजवाब कमेंट्स …और आगे आगे देखो होता है क्या … तो आज का होमवर्क है घर जाके ४ candle जलाके आराम से ……. क्या सोचने लगे ,,अरे भाई डिनर की बात नही कर रहा…..आप अपनी मुंगेरी वाली स्टोरी खत्म करेंगे …बताई देते हैं हाआं आप हमका इतने बेवकूफ भी ना सम्ज्हीं .. बधाई हो ४ साल की….

  22. समीर लाल Says:

    बहुत बधाई….हमारा जिक्र तक नहीं….हूंंंंम………..चलो, फिर भी बधाई….खिलाओ मिठाई मियां.

  23. Says:

    धरोहर.

  24. अविनाश वाचस्पति Says:

    इतिहास.

  25. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह Says:

    आपको हार्दिक बधाई, अच्‍छा लगा पुरानी यादों को पढ़कर

  26. सुजाता Says:

    यह सब जानना मज़ेदार था ।
    लगे रहो मुन्ना भाई !

  27. Manish Says:

    वाह – अरे निठल्ले / चार साल से / कायम कर के / इतना सारा / माल जमाया / बात बड़ी है / संयम इतना / जोड़ जाड़ कर / भला लगाया/ नहीं पुराने / हुए ठिकाने / रूप रंग को / नया बनाया – अभी तो खेल शुरू हुआ है दोस्त – (बधाई) ^(n) – मनीष

  28. Tarun Says:

    आप सभी लोगों को बहुत बहुत धन्यवाद, आप जैसे पढ़ने वाले, उसे सराहने वाले और फिर टिप्पणी करने वाले हों तो फिर क्या कहने, ये सफर चलता रहेगा। बस आप लोग ऐसे ही आतें रहे और उत्साह बढ़ाते रहें। :)

  29. अजित वडनेरकर Says:

    बधाई खूब खूब । सचमुच ये सफर तो यादगार है। जानना अच्छा लगा।

  30. अतुल शर्मा Says:

    देर से ही सही, पर मेरी ओर से भी आपकी ब्लॉगिंग के चार साल पूरे होने की बधाइयाँ स्वीकार करें।

  31. Ritu Negi Says:

    बहुत-बहुत बधाई ! सच बड़ा ही आनंदमय रहा आपका ये सफर. आशा करते हैं आगे भी हम इसी तरह आपके आनेवाले सफर का आनंद उठाते रहे.
    रीतू

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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