18 Feb
Posted as मेरी नजर मेरे विचार
Tags:मेरी नजर मेरे विचार, Centre for the Study of Developing Societies, csds, delhi, India, saraiसराय के बारे में सबसे पहले मैने नीलिमा की किसी एक शुरूआती पोस्ट में पढ़ा था जो जिसमें बताया था सराय रिसर्च करवाती थी और कुछ पैसे भी देती थी। उसके बाद कुछ दिनों पहले अविनाश ने जब सराय में किसी ब्लोगरस भेंटवार्ता के संबन्ध में लिखा था तब शायद दूसरी बार सुना लेकिन तब हमने ये सोचा ये कोई बेर सराय या जिया सराय जैसी कोई जगह होगी जहाँ ये होने वाला है।
लेकिन बाद में उठे सवालों से पता चला कि अरे ये सराय तो वो ही रिसर्च करवाने वाली सराय है। सराय के लिये विदेशी धन पर रिसर्च करने को लेकर सवाल उठे थे। लेकिन मैं ये नही समझ पाया कि आखिर इस में समस्या क्या है। रिसर्च कोई ऐसे विषयों पर तो हो नही रही जिससे देश की सुरक्षा को खतरा हो, ना ही ऐसे विषयों पर हो रही है जो देश की जनता का कोई नुकसान करे। ऐसा भी नही हो रहा कि रिसर्च पूरी होते ही रिसर्च को सीधे विदेश भेज दिया जा रहा हो।
अगर विदेशी धन पर होती रिसर्च से इतनी ही समस्या है तो क्यों ना कोई इसी विषय पर रिसर्च कर डालता, सराय से ही पैसा लो और सराय के ही ऊपर रिसर्च कर डालो। और अगर विदेशी धन से प्रोब्लम है तो बाकि जगहों का क्या? भारत की ईकोनॉमी जो इतने बड़े बड़े कुलांचे भर रही है वो सब विदेशी घास का ही नतीजा है, आज देश के ज्यादातर प्रोजेक्ट में डायरेक्ट और इन-डायरेक्ट विदेशी पैसा लगा हुआ है जाहिर सी बात है वहाँ भी कुछ ना कुछ निर्णय में फर्क पढ़ता होगा। इस बात के लिये कोई हल्ला नही क्योंकि डायरेक्ट या इन-डायरेक्ट फायदा सभी को हो रहा है। लेकिन चंद ब्लोगरस के विदेशी धन पर रिसर्च या सराय से जुड़ने से प्रोब्लम है, क्योंकि ये ब्लोगर हैं वो भी हिंदी के जिन्हें सारी दुनिया अच्छी तरह जानती है
।
एक बात और, जब किसी प्राकृतिक आपदा के चलते लोगों को रूपये पैसे की मदद की जरूरत होती है तो बहुत लोगों की जेब से एक ढेला तक नही निकलता। उस वक्त जब फोर्ड फाउंडेशन जैसी विदेशी संस्थायें रूपये पैसे से मदद करती है तब कोई कुछ नही कहता विरोध स्वरूप। जाहिर सी बात है उस वक्त विरोध का मतलब है अपनी जेबें ढीली करना।
कम से कम विदेशी धन से कुछ तो हो रहा है बाकि देशी धन का तो पता ही है कहाँ जा रहा है। ये भी हो सकता है कि विकास के नाम पर लिये कुछ विदेशी धन को देशी धन में भी कन्वर्ट किया हो। ऐसा नही है कि इन देशी धन से कोई रिसर्च नही होती, होती है बकायदा ग्रुप में होती है जिनके “बिल्लो रानी, कहो तो अभी जान दे दूँ” टाईप के विषय होते हैं। और ऐसी रिसर्चों की रपट देकर अपनी रेटिंग बढ़ाने से समाचार चैनलों को भी कुछ देशी-विदेशी धन की आय में ईजाफा करने में मदद मिलती है।
हमें ना सराय के बाहर का कुछ पता है, ना अंदर का लेकिन फिर भी यही कहेंगे इसमें कुछ गलत तो नही दिखता। और अगर किसी को गलत दिखता है तो जरा रिसर्च करे और हमारे साथ साथ बाकि सभी के भी थोड़ा ज्ञानचक्षु खोलने में मदद करे।
[डिस्क्लेमरः इस पोस्ट को लिखने के लिये सराय से नकद या अन्य तरीके से कुछ नही लिया गया है, लेकिन हाँ इसे पढ़ने के बाद कोई सराय वाला हम से संपर्क करके मेहताना देना चाहता है तो वो हमें सहर्ष स्वीकार है। मेहताना नकद होना चाहिये और उसे हमारे द्वारा बतायी गयी किसी भी संस्था में दान के रूप में दिया जाना चाहिये।]
5 Responses
ashish maharishi
February 18th, 2008 at 11:55 am
1पूरा हिंदोस्तान ही विदेशी धन पर चल रहा है
हरिराम
February 18th, 2008 at 12:09 pm
2‘सराय’, दिल्ली द्वारा भारतीय भाषाओं की कम्प्यूटिंग सम्बन्धी अनेक प्रोजेक्ट, विशेषकर ओपेन सोर्स में, हाथ में लिए गए हैं, जो काफी उपयोगी हैं। लेकिन अभी तक ऐसी कोई सुविधा या टूल विकसित करके आम जनता के उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जा चुका हो, मेरी नजर में नहीं आया।
Sanjeet Tripathi
February 18th, 2008 at 12:14 pm
3ह्म्म, सहमत हूं बावजूद इसके कि सराय से न तो पूरे तौर पर परिचित हूं न ही उनसे पैसा मिला है॥
अब तक इंटरनेट पर हिंदीकरण के लिए या ऑपरेटिंग सिस्टम के हिंदीकरण या अन्य भाषाओं मे ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने मे देश की कितनी संस्थाओं ने फंडिंग की यह तो पता नही लेकिन अगर सराय इसके लिए फंड उपलब्ध करवा रहा है तो गलत क्या है?
अफ़लातून
February 18th, 2008 at 1:15 pm
4तरुण से यह उम्मीद है कि ‘मोहल्ले’ पर ‘बौद्धिक साम्राज्यवाद की शिनाख्त’ वाला मेरा लेख जरूर पढ़ेंगे।
Tarun
February 19th, 2008 at 12:20 am
5@अफलातूनजी, आपका ये लेख पढ़कर मुझे सीएनएन के न्यूज एंकर लू डॉब की याद आ गयी जैसे विचार आपके विदेशी फंड से होने वाले बौद्धिक विकास के लिये हैं कुछ कुछ वैसी ही टोन में लू डॉब इमीग्रेशन और आउटसोर्सिंग के बारे में चर्चा करते हैं। लेकिन उससे आउटसोर्सिंग और इमीग्रेशन दोनों ही नही रूका बल्कि ये जरूर बन गया।
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