07 Feb
Posted as खालीपीली, मेरी नजर मेरे विचार
Tags:मेरी नजर मेरे विचार, mumbai, north india clashएक बहुत पुराना फिल्मी गीत है, “चैन से हमको कभी, तुमने जीने ना दिया“, अगर भारत (माता) में जीवन होता तो वो यही गीत हरदम गुनगुना रही होती। चिट्ठाजगत हो या मुम्बई या कहीं ओर सब जगह यही लड़ना लड़ाना, मरना मारना, तू मेरी पीठ में मार, मैं तेरी पीठ में मारूँगा मचा हुआ है।
मुम्बई में नव निर्माण सेना मुम्बई के नये निर्माण के लिये जगह बनाने के लिये पुराने को तोड़ने फोड़ने में लगी है। कोई सोच रहा है गरीबों को कपड़ा खाना नही बाँट पाये तो क्या चलो लाठियाँ ही बाँट डालते हैं। देश-दुनिया भले ही चांद में पहुँच जाये लेकिन लोगों की और अपनी सोच को कबिलाई सोच से आगे बढ़ने ही नही देना है। मन की नही हुई तो क्या बसें है, रेल हैं उन्हें जलायेंगे। पहले से खस्ताहाल सड़कें हैं उन्हें और तोड़ेंगे, अच्छी बनी वस्तुएं फोड़ेंगे लेकिन चुप नही रहेंगे। वैसे तो कंट्रोल नही हो रही शायद इसी बहाने कुछ जनसंख्या नियंत्रण में आ जाये।
माहौल वहाँ भी गरम है, माहौल यहाँ भी गरम है
यहाँ बोले तो हिंदी चिट्ठाजगत, अभी मुश्किल से मु्टठी भर भी भीड़ इकट्ठी नही हो पायी है, शुरू हो गये हैं एक दूसरे को कोहनी मारने में। वहाँ हो या यहाँ चाहता शायद हर कोई सनसनी है, कुछ मिर्च मसाला टाईप। अपनी पोस्ट में हिट बढ़ाने हैं तो बस किसी एक चिट्ठे या चिट्ठाकार को पकड़ो और जुट जाओ उसकी ऐसी तेसी करने में। पढ़ने वाले चाहे समाचार में ढूँढे या ब्लोग में, लगता है ऐसे ही मसाला की खोज में रहते हैं। पिछले कुछ दिनों से देखता हूँ कि कई अच्छी पोस्टे उसी तरह से दम तोड़ देती हैं जैसे किसी जमाने में आर्ट फिल्मों का हाल हुआ करता था।
सरकार है कि चुप लगाये बैठी है क्या करे वो भी डेमोक्रेसी है किसी को बोलने से तो रोक नही सकते, कोई कुछ भी बयान करे। गांधी के 3 बंदरों को चुकंदर बनाके रख दिया यानि बुरा ही देखो, बुरा ही सुनो और बुरा ही करो। अगर कोई मुम्बई का नव निर्माण चाहने वाला कल ये बयान दे दे कि मुम्बई को साफ सुथरा रखना चाहिये, यहाँ सड़कों के किनारे पेड़ पौधे लगने चाहिये तो क्या वो तोड़ फोड़ मचाने वाले इस बयान पर भी कुछ प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे, आयेंगे क्या सड़कों पर कूड़ा उठाने, पेड़ लगाने। अरे ऐसे देशवासी और नेता जिस देश के पास हों उसे किसी दुश्मन की जरूरत ही क्या। कोई इन लोगों को क्यों नही समझाता कि अगर किसी को मारना ही है तो अपनी इस सोच को मारो, इसी सोच को आजादी से पहले अंग्रेजों ने भारतीयों के विरूद्ध इस्तेमाल किया था और अब आजादी के बाद भी कुछ लोग इसी सोच को भारत के बाकी लोगों के खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं।
क्या आपने ये नृत्य देखाहै
3 Responses
Neeraj
February 7th, 2008 at 10:22 am
1तरुण जी
बहुत अच्छा लिखा है आपने. अगर सबकी सोच आप जैसे हो जाए तो जीवन कितना मदिर कितना मधुर हो जाए…लेकिन ऐसा होता नहीं इसीलिए हम अभिशिप्त हैं ये सब देखने सुनने करने के लिए…
नीरज
ज्ञानदत पाण्डेय
February 7th, 2008 at 3:08 pm
2“अरे ऐसे देशवासी और नेता जिस देश के पास हों उसे किसी दुश्मन की जरूरत ही क्या” — बहुत खूब कहा!
ghughutibasuti
February 8th, 2008 at 2:45 am
3आपने शायद कभी मालिश नहीं करवाई ! नहीं वह अमरीकन नहीं , शुद्ध भारतीय । यदि करवाई होती तो पता चलता कि किस तरह पीठ पर मारना , मरवाना ,आहाहा, कितना मजेदार होता है ।
हमें न अपनी जान का मूल्य है ना किसी और की । हम भारतीय कितना ही आगे बढ़ जाएँ ये लड़ाई झगड़े हमें लगातार पीछे की ओर खींचते रहेंगे ।
नृत्य तो नहीं देखा परन्तु एक गीत सुना व बहुत सुन्दर पहाड़ी दृष्य देखे । धन्यवाद ।
घुघूती बासूती
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The greatest discovery of my generation is that a human being can alter his life by altering his attitudes of mind. - William JamesCategories
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