आजकल अचानक बड़े बड़े व्यापारियों के अंदर खेल प्रेम जा चुका है कोई मुम्बई की टीम खरीद रहा है, कोई कलकत्ता की। कभी कही देखा था लोग मुर्गे लड़वाते थे और उन पर दाँव लगाते थे, आज जमाना बदल चुका है। समस्या इस बात पर नही है कि व्यापारी पैसा लगा रहे हैं, दुख इस बात का है कि बंदूक खेल प्रेम के कंधे में रख कर चलायी जा रही है।

यहाँ देखिये स्पोर्टस का पेज है, फुटबाल दिखेगा, क्रिकेट दिखेगा, टेनिस दिखेगा और फिर अदर्स में क्रिकेट दिखेगा

ये देश के राष्ट्रीय खेल (चक दे भी चकमा दे गया, लिंक पर क्लिक करके देखिये आस्ट्रेलिया से लौट कर कितने आलीशान कमरों में महिला हाकी टीम रही) के लिये क्यों नही किसी का खेल प्रेम जागता। अब जागेगा भी कैसे जगाने वाला तो पैसा है और वहाँ फाके की नौबत है जगाने के लिये पैसा कहाँ से आयेगा। क्रिकेट में तो इंडिया अक्सर जीत जाया करता है, ये सब लीग हॉकी और सॉकर (फुटबाल) के खेलों के लिये बनानी चाहिये थी। वहाँ ज्यादा सुधार, मेहनत और अच्छी सुविधाओं की जरूरत है।

खैर जिनके पास पैसा है उनका खेल प्रेम तो जाग गया, रह गये हम जैसे। हम तो यही कह सकते हैं खेल प्रेम मॉय फुट यानि कि न्यूयार्क के भीमकाय विरूद्ध नये इंगलैंड के देशभक्त

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