कुछ दिनों गायब रहने के बाद आया तो देखा कि मेरी पिछली पोस्ट पर पारूल की टिप्पणी थी कि मैं इस बाबत क्यों कर हिन्दी चिट्ठाजगत में सवाल पूछ रहा हूँ वो भी भारतीय नारी से। वहीं घुघुती जी का कहना था कि किसी को कोई कष्ट ना हो तो कुछ भी पहने यानि दो अलग अलग सोच। इन सब से जुदा एक साहब पहली बार शायद मेरे ब्लोग में आये और सीधा सीधा हमें लम्पट ही करार दे दिया ;)

ये हिन्दी ब्लोग जगत की परिपक्वता के लिये भी जरूरी है

आज की दुनिया ग्लोबल दुनिया है, इसमें कोई भी बात किसी एक देश में सिमट के नही रहती। हम सिर्फ किसी देश या किसी जाति विशेष को ध्यान में रखकर अपने विचार रखें ये अगर आज नही तो शायद कल संभव नही होगा। जाहिर सी बात है चंद कुछ सालों में भारतीय नारियों की सोच ही नही वरन् भारतीय पुरूषों का भी इनके प्रति नजरिया बदला है। उस पोस्ट को लिखकर मेरा मकसद सिर्फ ये जानना था कि महिलाओं की आजादी को लेकर लोग क्या विचार रखते हैं, खासकर महिला लिखने का यही कारण था कि गीत और कविताओं की रोमांटिक दुनिया से बाहर निकल कर वो भी अलग अलग विषयों में अपने विचार रखें। ये हिन्दी ब्लोग जगत की परिपक्वता के लिये भी जरूरी है नही तो कल भी इस तरह के विषयों में कुछ लिखा जाना या पूछे जाने को हिन्दी जगत वाले किसी मसाले से कम ना समझेंगे जैसा कि आज कहा गया।

भारतीय नारी की आजादी को अगर पैमाना माना जाये तो यही लगेगा कि कहीं ये लगे आधा (मिडिल ईस्ट के देश) और कहीं ज्यादा (पश्चिम के देश)। जबकि सच ये है कि ये आजादी सीधे सीधे देश, समुदाय और वहाँ के रहने वालों की सोच के हिसाब से डिसाईड होती है, वहाँ रहने वालों के विचारों पर निर्भर करती है। मुझे यही लगता है कि आजादी की बात चाहे महिलाओं के संदर्भ में हो या पुरूषों के, आजादी विचारों की होनी चाहिये। हमारे विचार इतने संकुचित ना हो कि किसी भी तरह के खुलेपन की बात पर वो कुछ सोचने ना दें और ना इतने खुले ही हों की बाद में इन बेलगाम भागते विचारों को संभालना मुश्किल हो जाये।

रहा सवाल टॉपलैस होने का तो हमें यही लगता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, इस समाज के कुछ नियम हैं और हमें उन नियमों का पालन करना ही चाहिये। प्राइवेट करार दिये गये अंगों का पब्लिक डिसप्ले नही होना चाहिये और ये बातें सभी पर लागू होनी चाहिये।

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