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प्रचार, प्रसार और फिर समीक्षक की मार

पिछले कई हफ्तों से समाचारों की सुर्खियों में छायी रहने वाली दोनो फिल्में आखिरकार समाचार चैनलों से निकल बड़े पर्दे में आ ही गयी। इन दोनों फिल्मों के निर्माताओं ने इसके प्रचार और प्रसार में कोई कसर नही छोड़ी। बात आगे बढ़ाने से पहले मैं आपको प्रचार और प्रसार का अंतर समझा दूँ।

हमने दिवाली के दिन अपनी ‘जेनेरिक शेरो शायरी’ वाली पोस्ट लिखी जो फीड के द्वारा औरों तक पहुँची, वो था प्रचार। आज उसी जेनेरिक शेरो शायरी का लिंक एक बार फिर मैं यहाँ दे रहा हूँ तो ये हुआ प्रसार यानि कि आप बारंबार प्रचार भी कह सकते हैं। अब वो अलग बात है कि इस पोस्ट को उतने ना दर्शक मिले ना समीक्षक लेकिन एक बात तय है कि दिवाली के दिन रीलिज फिल्म भले ही हिट हो जाये लेकिन ब्लोग की पोस्ट के चांसेज कम ही होते हैं। फिलहाल वापस विषय की तरफ आते है।

हम बात कर रहे हैं, ओम शांति ओम और साँवरिया की, मुझे लगता है कि इन दोनों फिल्मों के प्रचार प्रसार में लगभग इतना खर्च तो हुआ होगा जिसमें बड़े आराम से एक बी ग्रेड की फिल्म बन जाये। दर्दे डिस्को देखते सुनते कसम से हमको अपनी ही कमर में दर्द महसूस होने लगा था। और साँवरिया सुनते सुनते हम बावरे होने लगे थे वो तो अच्छा हुआ कि हाथ से बात निकलने से पहले ये दोनों रीलिज हो गयी।

इन दोनों ने वैसे देखा जाय तो एक बहस को जन्म दे दिया, और वो ये है कि फिल्म अच्छी बनायी जाय या उसका प्रचार प्रसार दबा कर किया जाय। अगर दोनों फिल्मों से गानों को निकाल दिया जाय तो मुझे नही लगता कि इनमें ऐसा कुछ था जिसके लिये अच्छी बुरी अन्य खबरों को नजरअंदाज कर दिया जाय, जैसा कि पिछले कई दिनों में हुआ।

इतना सब कुछ होने के बाद रही सही कसर फिल्म समीक्षक पूरी कर देते हैं, कई बार तो इन समीक्षाओं को पढ़कर मुझे लगता है कि ये किसी समीक्षक ने नही बल्कि उस फिल्म या अदाकर के किसी फैन ने लिखी है। मैं अभी कुछ दिनों पहले आइ बी एन में इन दोनों फिल्मों की समीक्षा पढ़ रहा था, दोनों फिल्मों की समीक्षा एक ही व्यक्ति राजीव मसंद ने लिखी थी। ओम शांति ओम का रिव्यू पढ़कर ये ही लग रहा था कि राजीव, शाहरूख के बहुत बड़े फैन होंगे। फिल्म के बारे में अच्छा ही अच्छा लिखा था। यहाँ तक कि उन्हें इसे ज्यादा हंसाने वाली फिल्म याद ही नही आ रही थी। पूरा रिव्यू पढ़ने के बाद, मैं कम से कम ४ स्टार की उम्मीद तो कर ही रहा था लेकिन उन्होंने यहाँ ३ ही स्टार दिये। खैर ये उनकी अपनी पसंद है, फिर आती है साँवरिया की बारी जिसकी समीक्षा काफी नकारात्मक लिखी थी और इस फिल्म को उन्होंने रेटिंग दी १ स्टार। अब मैं सोच रहा हूँ कि क्या ये फिल्म वाकई में एक सी ग्रेड की फिल्म से भी कमतर है। क्योंकि खराब से खराब बी या सी ग्रेड की फिल्म को भी ये समीक्षक १ स्टार से ही नवाजते हैं। जितना भी सांवरिया को ट्रैलर में देखा उससे कम से कम १ स्टार जितनी बुरी फिल्म मुझे तो नही लगती। अगर आप में से किसी ने ये फिल्में देखी हों तो जरूर बतायें।

इतने प्रचार प्रसार के बाद फिल्म साँवरिया को जो पड़ी उसे कहते हैं समीक्षक की मार।

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3 Responses to “प्रचार, प्रसार और फिर समीक्षक की मार”

  1. Gyan Dutt Pandey Says:

    हमें तो यह जमा कि आपने प्रचार और प्रसार का महीन अंतर स्पष्ट कर दिया। जैसे हम ब्लॉग पोस्ट लिखें तो प्रचार और अपने और अपने ब्लॉग का नाम ले ले कर जगह जगह टिप्पणी करें तो वह हुआ प्रसार!

  2. Tarun Says:

    बिल्कुल सही फरमाया ज्ञानजी, आपने प्रचार और प्रसार के अंतर में तुरंत महारत हासिल कर ली।

  3. अभय तिवारी Says:

    इस पोस्ट को देख नहीं सका था.. सही लिखा आपने.. मैं तो ओएसओ को आधा भी न दूँ.. और सावरिया को तमाम शिकायतों के बाद भी दो-ढाई तो दे ही दूँगा.. फ़िल्म कई पैमानों पर तौली जाती है..

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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