25 Nov
Posted as समाज और समस्या, रहन-सहन, मेरी नजर मेरे विचार, देश दुनिया
Tags:देश दुनिया, मेरी नजर मेरे विचार, रहन सहन, समाज और समस्या, Bara Brost, Stockholm, Sweden, topless protests by womenइस बहस में महिला चिट्ठेकारों या रीडरस के क्या विचार हैं ये मैं जरूर जानना चाहूँगा क्योंकि ये कुछ लड़कियों या महिलाओं ने शुरू ही महिला और पुरूषों में समान अधिकार की बात पर किया है।
ये खबर है स्टॉकहोम (स्वीडन) की, जहाँ २ लड़कियाँ टॉपलैसे हो कर पब्लिक स्वीमिंग पूल में तैरने पहुँच गयी। उन से कहा गया कि या तो ऊपर कुछ पहन लें या पूल छोड़कर चली जायें। बस यहाँ से शुरूआत हुई उस ग्रुप की जो लडकियों (महिलाओं) को भी टॉपलैसे होकर पब्लिक पूल में तैरने देने का हिमायत कर रहा है। उनका कहना है कि जैसे पुरूष शरीर के ऊपरी भाग में बगैर कुछ पहने तैर सकते हैं तो हम महिलायें क्यों नही। इस ग्रुप की ४० महिलाओं ने स्वीडन में ऐसा ही कुछ किया और टॉपलैस होकर प्रदर्शन किये। गौरतलब है कि गर्मियों के दौरान स्वीडन के समुद्री तटों (beaches) पर इन को टॉपलैस होकर रिलेक्स करने की छूट है लेकिन पब्लिक स्थानों में इस बात की मनाही है।
हमें लगता है ये सही बात है कि दोनों को बराबर का हक और अधिकार मिलने चाहिये लेकिन क्या ये बात बराबरी के हक के लिये इतनी जरूरी है। पहले पब्लिक पूल में फिर अन्य तैराकी प्रतियोगिताओं में कैसा लगेगा ये सब? कोई कितना ही इंकार कर ले, कितनी ही आजादी या बराबरी के हक की बात कर ले, लेकिन कुदरत ने पुरूष और महिलाओं में कुछ अंतर तो रखा ही है। कई बातें है जिसमें पुरूष महिलाओं की बराबरी नही कर सकते अब आप लोग इस पूरे मामले में क्या सोचते हैं।
कुछ कहने से पहले अगर पूरी खबर पढ़ना चाहें तो यहाँ क्लिक करिये फिर अपने विचार व्यक्त कीजिये।
11 Responses
Sanjeet Tripathi
November 25th, 2007 at 1:17 pm
1उधर क्लिक करके खबर क्या पढ़ना जी, उधर अभी के अभी पहुंचने का कोई जुगाड़ हो तो बताओ
Pratik Pandey
November 25th, 2007 at 1:43 pm
2टॉपलेस होकर ही क्यों, पूरी तरह निर्वस्त्र होकर तैरने की आज़ादी सभी को होनी चाहिए। कपड़ों व शरीर के प्रति कुण्ठा आधुनिक समाज में ख़त्म होनी चाहिए।
parulk
November 25th, 2007 at 1:58 pm
3tarun ji ye maslaa hai sweedan kaa.aur aap rai maang rahey hain hindi chiithajagat pe vo bhi bhaartiya naariyon se…i am confused
अनूप शुक्ल
November 25th, 2007 at 2:00 pm
4निठल्ले तरुण कैसे-कैसे अटपटे सवाल पूछता है! वो तो खैर कर कि ये मेरे लिये ‘आउट आफ कोर्स ‘ठहरा वर्ना मैं तो टिपिया भी न पाता।
जीतू
November 25th, 2007 at 2:41 pm
5भई बिना फोटो बात कुछ जम नही रही। या तो फोटो लगाओ या फिर ऐसे सवाल मत पूछो। बिना उदाहरण के गणित के सवाल पूछ रहे हो। अब चूंकि हम इन्सान दोगले टाइप के होते है इसलिए इसके दो जवाब हो सकते है,
१. बहुत गलत है, टॉपलैस, शर्म लिहाज कुछ है कि नही? नही कतई अलाउ नही करना चाहिए। हम तो कहेंगे कि लड़किया सर भी ढक कर नहाएं।
२. टॉपलेस क्या, बॉटम लेस भी करिए ना, हमे क्या, जिसने देखना होगा देख लेगा, जिसे ना देखना होगा स्वीमिंग पूल बदल लेगा।
बकिया डेनमार्क मे कौनो टॉपलेस के बारे मे सोचता है भी का?
हमको तो नही लगता, पूरे यूरोप मे हम टहल आए, पार्को मे क्या क्या करम होते है, किसी को कोई परवाह नही होती, जैसे हमारे हिन्दुस्तान मे कुत्ता-कुत्तिया लगे रहते है और हम बेपरवाह निकल जाते है वैसे ही उधर भी होता है। हम जिधर बैठ कर काफ़ी पिए थे, बगल वाली सीट पर सारे कर्म हो गए, हम देखे का? नही ना, तो फिर टॉपलेस से का क्या उखड़ जाएगा।
Gyan Dutt Pandey
November 25th, 2007 at 4:49 pm
6अनूप वाला कमेण्ट जैसा ही हमारा मान लें।
Sanjeeva Tiwari
November 25th, 2007 at 7:20 pm
7तरूण भाई हम भी आज सन डे को निठल्ले बैठे थे जब से आपने पोस्ट किया है तब से कई बार आपके ब्लाग पर आ गये कि कोई महिला टिपिया रही है क्या पर यहां तो कउनो छोकरिया नहीं आई रे भाई । अब हमहू टिपिया देत हैं -
जब भारत में ऐसी मांग आयेगी तो ड्राफ्ट मुझसे लिखवाईयेगा मुझे विवादित मसलों की लीगल ड्राफ्टिंग में मजा आता है, हा हा हा । धन्यवाद भाई ।
divyabh
November 25th, 2007 at 8:31 pm
8एक हद बना दी है समाज ने और ठोक-2 कर शर्म लाद दी गई जो लज्जा भी बन गई बाद में पर सच तो यही है कि कोई फर्क नहीं पड़ेगा अगर टॉपलेस हो जाएं महिलाएं…।
यह तो मात्र पुरुष भ्रम है जो कईबार टूटता आया है कमहोते कपड़ों के द्वारा जो एकबार और टूटेगा…।
neeraj rajput
November 26th, 2007 at 3:22 am
9are u really in favour of feminism or u just wanted to have masala on ur blog by aksing comments from female chhithikars.
dono mei so jo bhi ho kuch ko pahli baat achi lage ki kya admi hai yar, Indian women k liye bhi aise feeling rakhta hai–ekdam samaj mei mahilao ko barabari k hak wali.
aur dusri tarah k log khud samajh sakte…
but about females, diffciult to say anything. enjoy reading.
ghughutibasuti
November 26th, 2007 at 11:44 am
10यदि किसी अन्य को कोई विशेष कष्ट ना हो तो जो जो चाहे सो पहने । वैसे शायद आपने कल या हाल के ही टाइम्स औफ इन्डिया में मेल क्लीवेज और उसे कैसे व कितना दिखाया जाए पर शायद लेख नहीं पढ़ा ! पढ़ते तो शायद पुरुषों को भी अपने को ढकने को कहते ।
घुघूती बासूती
Tarun
December 4th, 2007 at 8:48 am
11@संजीत, उधर पहुँचने का जुगाड़ तो सिर्फ एक ही है, अगर तैरना है तो पहले उड़ना सिखो
@प्रतीक, थोड़ी आजादी तो है ही क्योंकि तभी अपने अपने हमाम में सभी नंगे होते हैं।
@पारूल, विचारों का दायरा बढ़ाने के लिये शायद भारतीय नारी वाली इस सोच से आज नही तो कल एक दिन सभी को बाहर निकलना होगा।
@अनुपजी, आप तो शरमा ही गये
@जीतू भाई अंतिम बात पर तो आप कुछ कुछ बसंती की जबान बोल गये, जरा चलते चलते हमें भी बता दीजिये जीतू भाई कि आपका नाम क्या है?
@ज्ञानजी, ये क्या आप कम से कम अपने हिस्से का तो अलग से शरमाईये
@संजीवा, अपने देश में विवादित मसले कम हैं जो आप यहाँ भी बैटिंग करने की सोच रहे हैं।
@दिव्याभ, कम होते कपड़े और बढ़ते अपराध ये भी इस देश का ही सच है।
@नीरज, स्वागत है आपका, अपनी रसोई में हम परोसेंगे तो अपनी ही पसंद का अब अगर किसी को मसाला लगे तो हम कुछ नही कर सकते वैसे और भी हैं ठिकाने कहाँ सिर्फ सलाद ही सर्व होता है
@घुघुती जी, वो आलेख का पता आप से ही चला, अगर लिंक दे देती तो शायद पढ़ लेता। प्राइवेट अंग के पब्लिक डिसप्ले की बात दोनों पर समान रूप से लागू होती है।
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