फिल्म समीक्षाः मनोरमा और जॉनी गद्दार

मनोरमा, सिक्स फीट अंडर और जॉनी गद्दार ये दोनों फिल्में अगर हालीवुड में बनी होती तो काफी अच्छा व्यवसाय करती और तारीफें भी बटोरती। इन दोनों फिल्मों का पिटना (जी हाँ मैं यही कहूँगा) इस बात का परिचायक है कि भारतीय दर्शक अभी बौद्धिक रूप से ज्यादा विकसित नही हुए हैं। अभी भी इन्हें उलूल-जूलूल हरकतों से भरी फिल्में ज्यादा पसंद आती हैं या शायद मुझे कहना चाहिये कि यहाँ फिल्में हीरो की वजह से ज्यादा और विषय से कम चलती हैं।

ओम शांति ओम का हिट होना और इन दोनों का फ्लॉप होना मेरी इस बात को सिद्ध करता है, अब चाहे आप कितनी ही दलीलें क्यों ना दे लें।

मनोरमा देखकर यही एहसास होता है कि अरे ये तो अपना ही शहर है, आप बैकग्राउंड में किसी कल्पना लोक में नही विचरण कर रहे होते। जब फिल्म में अभय देओल (धर्मेन्द्र का भतीजा) का पड़ोसी पानी डालते हुए मोटर बाईक के बारे में पूछता है तो अपना पड़ोस याद आ जाता है। फिल्म के सभी पात्र उसी तरह के कपड़े पहने होते हैं जो हमारे आसपास के लोग।

इस फिल्म का हीरो अपने जैसा ही आम आदमी है कोई अच्छाई का पुतला नही, वो २ आदमियों को भी अकेले नही पिट सकता। ये एक सस्पेंस से भरी फिल्म है, जो धीमी शुरूआत के बावजूद पकड़ बनायी रखती है, पति पत्नी के बीच की नोंकझोंक मजा देती है। बाद में सस्पेंस काफी गहराता जाता है और अंत, वो तो कमाल का है शायद आप भी ना सोच पायें। ये फिल्म राजस्थान के एक कस्बे में फिल्मायी गयी है, अभय ने अच्छा अभिनय किया है। ना जाने क्यों अभय देओल अभिनीत अभी तक सारी फिल्में मुझे काफी पसंद आयी है और सभी फिल्में अलग अलग विषय में एक दूसरे से काफी जुदा थीं मसलन सोचा ना था, एक चालीस की लास्ट लोकल और आहिस्ता आहिस्ता अगर आपने इनमें से कोई नही देखी तो जरूर देखियेगा। लेकिन अगर आप शाहरूख खान टाईप मूवी के पंखे हैं तब हमारी इस गारंटी आपके किसी काम की नही, फिर भी ट्राई मार सकते हैं।

दूसरी फिल्म जॉनी गद्दार भी एकदम अलग जुदा सी स्टोरी पर बनी है, इस फिल्म की सबसे बड़ी बात है कि इसमें कोई हीरो नही है। बड़ा कोई चेहरा बोले तो धर्मेन्द्र, इस फिल्म के अंत का अनुमान लगाना भी थोड़ा कठिन है। इस फिल्म में आपको तो पता होता है कि कातिल कौन है लेकिन बाकी किसी को पता नही चलता जब तक कि…। शुरू में फिल्म थोडा धीमी है लेकिन धीरे धीरे रोचक होने लगती है।

इन दोनों फिल्मों में अगर तुलना करूँ तो मनोरमा बाजी मार ले जाती है, दोनों फिल्में संस्पेंस थ्रिलर वाली हैं इसलिये मैने इन दोनों की कहानी का खुलासा नही किया। अगर आप कुछ अलग सी फिल्में देखने की तमन्ना रखते हैं तो शायद ये दोनों ही फिल्में आपको पसंद आये।

सागर भाईसा को विंडो में झलकी दिखवाने का तरीका बताने के लिये धन्यवाद :)

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Tarun
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5 Responses to “ फिल्म समीक्षाः मनोरमा और जॉनी गद्दार ”

  1. भैया आपकी पोस्ट तो अपने लिये आउट ऑफ कोर्स की बात है। हम तो यही देख रहे हैं कि पुलकोट से सागर चन्द जी हीरो बन गये हैं! :-)

  2. अपन को भी अलग सी ही फ़िल्में पसंद आती है!!
    अब यह देखते है कि आपकी सुझाई यह दोनो फ़िलम कब देख पाते हैं क्योंकि फ़िलमें देखने के मामले में एक नंबर के आलसी हैं अपन!!

  3. मनोरमा तो हमने भी देखी और अच्छी भी लगी और हमने भी चंद रोज पहले मनोरमा पर लिखा था।

  4. देखेंगे!

  5. एकदम मेरे दिल की बात लिखी है आपने। शब्दशः एसे ही विचार हैं मेरे भी।

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