16 Nov
Posted as खालीपीली, मस्ती-मजा, व्यंग्य
Tags: व्यंग्य, मस्ती मजा, मस्ती मजा, व्यंग्य, hindi blogsक्या आप जानना चाहते हैं कि आप हिन्दी चिट्ठाकारों के किस गुट या समुदाय या ग्रुप में फिट बैठेंगे, जानने या पता लगाने के लिये आपको इनके वर्गीकरण के बारे में पढ़ना पढ़ेगा। अगर आप को लगे कि नही इनमें से किसी भी खांचे में आपका फ्रेम फिट नही बैठता तो कोई बात नही जैसा हमारे असंतुष्ट नेतागण करते हैं, आप भी कीजियेगा यानि नये गुट का गठन
।
सबसे पहले बात करते हैं उन गुणीजनों की जो आज से एक डेढ़ साल पहले तक दूर दूर तक नजर नही आते थे लेकिन आजकल इनकी संख्या भारत की आबादी की गति से बड़ रही है। अगर अभी भी नही पहचाने तो मैं बात कर रहा हूँ, मीडिया, लेखन और अध्यापन से जुड़े लोगों की। चिट्ठाजगत में इनका रूतबा वैसा ही है जैसा असली जिंदगी में नेताओं का। यानि कि स्वंयभू वाला जिनको अपने अलावा बाकि तुच्छ नजर आते हैं। ये अपने समुदाय के चिट्ठों के अलावा शायद ही इधर-ऊधर जाते हैं। आप इनके दरबार में कितनी ही हाजरी मार लें मजाल हैं ये आपके चिट्ठों की तरफ रूख करे, अगर कोई आया भी तो इतने चोरी चुपके आयेगा कि आपको पता भी नही चलेगा। लेकिन इस समुदाय में इक्के-दुक्के कुछ चिट्ठाकार अपवाद के रूप में गिने जा सकते हैं।
दूसरा समुदाय है कोमल भावनाओं वालों का, कोमल भावनायें इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि ये गीत, कविता या गजल के माध्यम से ही अपने उदगार व्यक्त करते हैं। इस समुदाय के ज्यादातर चिट्ठाकार भी अपने ही समुदाय में सिमटे रहते हैं, आपस में ही ये अपने दुख-सुख बाँटते रहते हैं। इनकी कोमल भावनाओं के वशीभूत कई बार दूसरे समुदायों के लोग भी इनके यहाँ हाजरी बजाते नजर आ ही जाते हैं। इनके चिट्ठों में अगर आप हाजरी बजाकर आयें तो इनमें से ज्यादातर शायद कोमल भावनायें आहत होने की डर से आपके चिट्ठों में आने से डरते हैं।
तीसरा समुदाय है ब्लू लाईन समुदाय, इस समुदाय के चिट्ठाकारों की प्रकृति भी दिल्ली की ब्लू लाईन बसों की तरह खतरनाक पायी जाती है। जैसे ब्लू लाईन निरीह जनता को रौंदती भागती रहती हैं वैसे ही इस समुदाय के चिट्ठाकार धड़ाधड़ इतनी पोस्ट छापते रहते हैं कि कई बार दूसरे समुदायों के चिट्ठाकारों की पोस्ट इनकी स्पीड के आगे दम तोड़ देती हैं।
चौथा समुदाय है उच्च वर्ग का, इनकी प्रकृति रईस बिजनेसमैन की तरह होती है, ये सबसे बनाकर रखते हैं शायद ये सोचकर क्या पता कब कौन काम आ जाये। ये हमेशा विवादों से और विवादस्पद विषयों से दूर रहने की कोशिश करते हैं और ये अपनी इस कोशिश में सफल भी रहते हैं। अपनी मौज में (अनुप, समीर) या अपनी पसंद (रवि, श्रीश) के विषय में लिखते हैं। इनकी ये ही खूबी दूसरे समुदाय के चिट्ठाकारों को इनके दरबार में आकर हाजरी बजाने को विवश करती है। उच्च वर्ग के होने के कारण दूसरे समुदायों को इनकी मदद की जरूरत पड़ती रहती है।
पांचवा समुदाय है मध्य वर्ग का, जो अभी तक बताये किसी भी समुदाय में नही आते और अपने उग्र स्वभाव और लेखन की वजह से उच्च वर्ग की पात्रता पाने से वंचित रहते हैं। फिर भी इन्हें दूसरे समुदायों के ज्यादातर चिट्ठाकारों का स्नेह मिलता है, इस स्नेह का कारण अभी पता नही चल पाया है। वैसे एक स्टडी के अनुसार ऐसा शायद इनके विचारों की मानसिक हलचल के कारण होता हो ऐसा पाया गया है।
छटा और सबसे छोटा समुदाय माना जा सकता है गलतफहमी पाले कुछ चिट्ठाकारों का जिन्हें लगता है कि इनके बगैर हिन्दी और चिट्ठा जगत का विकास नही हो पायेगा। इस समुदाय के चिट्ठाकारों की पहचान अभी तक ठीक से नही हो पायी है लेकिन कभी कभी कुछ चिट्ठाकारों में इस तरह के लक्षण दिखायी दिये जाते हैं। वर्गीकरण से ठीक पहले इन लक्षणों का विलुप्त हो जाना इस समुदाय के चिट्ठाकारों की पहचान करने में बाधा बना हुआ है।
हमारे जैसे कई चिट्ठाकारों को अभी तक बताये गये किसी भी समुदाय की पात्रता के लायक नही पाया गया। इस वजह से इस तरह के सभी बाकि बचे चिट्ठाकारों को निर्गुट समुदाय में रखा गया है। इस समुदाय का नामकरण शीत युद्ध या उस दौरान भारत के गुटनिरपेक्ष बने रहने को देखकर रखा गया है। अब ये अलग चर्चा का विषय है कि गुटनिरपेक्षता के नाम पर उस समय भारत ने सबसे बड़ा गुट बना दिया था जिसके सदस्यों की संख्या अन्य गुटों से कई गुना अधिक थी। गुटनिरपेक्ष देशों के कई सदस्य देशों की तरह इस निर्गुट समुदाय के कई चिट्ठाकार भी कमजोर, पिछड़े और अपनी पहचान बनाने की लड़ाई में जूझते रहते हैं। इस समुदाय के ज्यादातर चिट्ठाकारों को दूसरे समुदायों के चिट्ठाकारों का समर्थन ना के बराबर मिलता है। इस समुदाय के लगभग सभी चिट्ठाकार दूसरे अन्य समुदायों के लगभग सभी चिट्ठाकारों के दरबार में यदा कदा, अक्सर हाजरी बजाते रहते हैं। इनमें से ज्यादातर चिट्ठाकार सुदामा बने भगवन के आने की बाँट जोहते ही रहते हैं। आज की स्थिति के परिप्रेक्ष्य में इस निर्गुट समुदाय को नंदीग्राम समुदाय का नाम भी दिया जा सकता है। क्योंकि इस समुदाय और सबसे पहले बताये गये समुदाय के बीच लगभग उसी तरह का रिश्ता है जैसे असल जिंदगी में बंगाल के किसान और राजनेताओं का।
अगर आपको लगता है कि आप ऊपर बताये किसी भी गुट या समुदाय में शामिल होने की पात्रता नही रखते या उन गुटों में शामिल होने की आपकी अर्जी खारिज कर दी जा सकती है तो भारत की डेमोक्रेसी की तरह आप एक अलग गुट या समुदाय का निर्माण करने को स्वतंत्र हैं।
नोटः एक अलग स्टडी में ये बात भी सामने आयी है कि तेजी से बढ़ती इन चिट्ठों की आबादी कहीं इनके लिये मुसीबत ना बन जाये। ये अनुमान इस बात को ध्यान में रखकर लगाया गया है कि कम क्षेत्रफल के कारण जिस तरह बढती आबादी को भारत में रहने की जगह मिलनी मुश्किल होती जा रही है कहीं उसी तरह चिट्ठों की बढ़ती आबादी के कारण इन चिट्ठों को पाठक मिलने मुश्किल ना होते जायें।
ब्लोगिंग फोटोः spcoot at flicker
25 Responses
balkishan
November 16th, 2007 at 3:07 pm
1जबरदस्त वर्गीकरण किया है आपने. समअझे मे नही आ रहा है की हम कंहा है. पुरा का पुरा कनफुजिया दिए है जी आपतो. पर जो भी हो एकदम झक्कास - रखकर दिए है. मज़ा आगया.
सृजन शिल्पी
November 16th, 2007 at 3:15 pm
2भई, वर्गीकरण तो बड़ा सटीक किया है आपने।
इसके हिसाब से अपन निर्गुट समुदाय के खांचे में फिट बैठते हैं। बाकी आप बताओ, हमें किस पंगत में पाते हैं?
ज्ञानदत पाण्डेय
November 16th, 2007 at 3:31 pm
3इतना शोध पूर्ण वर्गीकरण किया है तो उठ्ठलू गुट (निर्गुट समुदाय) में तो हो नहीं सकते मित्र। बाकी किसी वर्ग का चयन कर लो अपने लिये।
Sanjeet Tripathi
November 16th, 2007 at 4:11 pm
4वाह!! क्या वर्गीकरण किया है!!
सोच रहा हूं कि मै किस वर्ग के खांचे मे फ़िट होता हूं!
प्रियंकर
November 16th, 2007 at 4:19 pm
5आनंदम ! आनंदम !
बहुत धांसू वर्गीकरण है . शोध की दशा और दिशा एकदम चकाचक है .
kakesh
November 16th, 2007 at 4:30 pm
6हम साम्यवादी हैं इसलिये किसी गुट में विश्वास नहीं करते लेकिन निर्गुट भी नहीं है.
वैसे एक गुट ऎसा भी होना चाहिये जिसको लिखना ही नहीं आता लेकिन बस लिखे जा रहे हैं बीबी भी नाखुस है और ब्लॉगर भी. निठल्ले बैठे है तो कुछ भी अंट शंट लिख दो बस लिखना है ( हम अपनी बात ही नहीं कर रहे हैं)
प्रशान्त प्रियदर्शी
November 16th, 2007 at 4:41 pm
7कुछ भी समझ में नहीं आया कि हम कहां हैं.. शायद निर्गुट में निर्गुटिया रहें हों..कभी-कभी कवि बनने का शौक भी जाग जाता है.. कभी-कभार रईसी भी दिखा ही देते हैं.. अभी तक कभी उग्र लेखन हम किये नहीं हैं पर स्कोप पूरा खुला छोड़े हुये हैं.. शायद हमें भी उच्च वर्ग में उचक कर उछलने का मौका मिल जाये.. और रही बात गुणीजनों के साथ उठने-बैठने की तो ये इच्छा तो बचपन से ही है पर माता-पिता ने तो उसी समय से ही उल्लू, गधा और ना जाने क्या-क्या उपाधि दे रखे हैं.. हां इतना तो पता है कि हम गलफहमी पाल ही नहीं सकते, हम तो खुशफहमी में जीने वाले प्राणी हैं.. अब तो आप ही हमारे समस्या का समाधान करें..
सागर नाहर
November 16th, 2007 at 4:56 pm
8लगे हाथों एकाद उदाहरण भी दे देते कि कौन कौन किस गुट में फिट बैठता है…
वैसे मैं इन भी सभी गुटों में घूमता रहता हूँ, वैसे आपका क्या मानना है मैं किस खांचे में सही फिट होता हूँ?
और आप…??
Sanjeeva Tiwari
November 16th, 2007 at 5:05 pm
9चलिये भाई साहब आपने अच्छा किया, बहुत दिनों से हम सोंच रहे थे कि आपने हमारे संबंध में क्यों नहीं लिखा, आपका पोस्ट देखा तो पाया कि हम तो छठा और सबसे छोटा समुदाय में हैं, आपने बिलकुल सहीं वर्गीकरण किया है भाई, धन्यवाद । मेरे समुदाय में और कोई हो तो बतावें भाई एक से तो समुदाय की परिभाषा ठीक नहीं बैठेगी ना ।
संजय बेंगाणी
November 16th, 2007 at 5:35 pm
10हम छठे वर्ग में फीट रहेंगे, वहीं डाल देना भाई.
मीनाक्षी
November 16th, 2007 at 5:48 pm
11बहुत स्पष्ट रेखाचित्र … चिट्ठाजगत में ब्लॉग की राजनीति को आपने कितने प्रभावशाली ढ़्ग से समझा दिया. यहाँ भी राजनीति होगी… यकीन नही था…..
… जाएँ तो जाएँ कहाँ …. !
देबाशीष
November 16th, 2007 at 5:49 pm
12यार हम सोचे कोनो नई तकनीक वकनीक खोज लाये हो आटो क्लासिफिकेसन का पर ई तो बड़ा दार्सनिक लेखन हो गया
अपने तो लागे कि कई वर्गों में घुसते निकलते रहे हैं और फिलहाल किसी में फिटिया नहीं पा रहे। और लोगों का नाम न लेने के कारण तरुण तुमने खुदही को शामिल कर लिया है रवि भैया वाली श्रेणी में, नाम लेकर उदाहरण देते तो अउर मजा आता। और ये पाँचवीं श्रेणी का विवरण कुछ बूझा नहीं, पर नाम तुम लोगे नहीं
रविरतलामी
November 16th, 2007 at 6:33 pm
13निठल्ला जब चिंतन करेगा तो ऐसे ही तो करेगा…
कुछ दिन और ठंड राखो जी. जब हिन्दी चिट्ठे पचास हजार - लाख की संख्या में हो जाएंगे संख्या में तो क्या गुट और क्या निर्गुट!
फेर गिनती करते बैठे रहोगे!
Beji
November 16th, 2007 at 7:39 pm
14आप आहत मत होना…हम आ कर टिपिया कर जा रहे हैं।
masijeevi
November 16th, 2007 at 9:45 pm
15यह तो तय हुआ नहीं कि कि समुदाय वर्गीकरण जैसा महत कार्य करने वाले आप किस समुदाय में ठहरेंगे, या वही अलग गुट वाली बात।
अच्छा है, अनुवर्ती शोध जारी रखें
Amit
November 16th, 2007 at 10:22 pm
16अब यह तो वाकई सोच में डालने वाला वर्गीकरण किए हो तरूण भाई, समझ नहीं आ रहा कि हम कहाँ जाएँ। अपन भी निर्दलीय ही दिखे हैं!! चलो गठबंधन कर नई पार्टी बनाएँ!!
अभय तिवारी
November 17th, 2007 at 11:16 am
17हमें पता है हमें आप ने कहाँ रखा है.. आप हमें बहुत पसन्द करते हैं इसीलिए सबसे पहले हमारा ही ज़िक्र कर डाला.. है न?
शास्त्री जे सी फिलिप्
November 18th, 2007 at 6:29 pm
18वाह भई वाह, क्या गजब का लेखन है. इसमें हास्य भी है चिंतन भी है. जिसको जो अधिक पसंद हो वह ले ले.मुझे तो दोनों पहलू पसंद आये अत: जमकर लेख का आस्वादन किया — शास्त्री
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
हर महीने कम से कम एक हिन्दी पुस्तक खरीदें !
मैं और आप नहीं तो क्या विदेशी लोग हिन्दी
लेखकों को प्रोत्साहन देंगे ??
Tarun
November 19th, 2007 at 6:58 pm
19टिपियाने का सभी को शुक्रिया, हमने विस्तार में शुक्रिया यहाँ अदा किया है ईस्मायली लगाकर
सारथी चिट्ठा अवलोकन 10 | सारथी
November 21st, 2007 at 6:18 am
20[…] अनुभव अपनी नीयत साफ रखना….. अवलोकन लुच्ची नजर, चुनिंदा नजारे- चश्मा आलोक पुराणिक का अनुभव अपनी नीयत साफ रखना….. काव्य ओस की एक बूँद खबर आज़ादी एक्स्प्रेस ओह! तो अब ताजमहल नहीं रहेगा….. खोजी लेख बढ रहा देह व्यापार कैसे चलता है देह व्यापार का धंधा? गजल जब कभी बोलना वक्त पर बोलना, मुद्दतों बोलना मुख्तसर… चिट्ठाकारी ब्लोग लेखक और लेखक ब्लोगर (२) ब्लागर प्रयाण् गीत (काव्य विधा में) जाल-संगणक अपने लेख को अखबारी लेख की शक्ल दें देशज औषधि शास्त्र डायबीटीज : सही औषधीय गुणो से युक्त कोहा वृक्ष पत्रकार/पत्रकारिता पत्रकार या बेकार पर्यावरण मोटापे से ग्लोबल वार्मिंग का क्या संबंध? भाषा यह पक्षपात क्यों? वर्णन कोहरा या अम्बर की आहें ! विश्लेषण फतवा और मुस्लीम औरत दुनिया के 200 अच्छे विश्वविद्यालयों में एक भी भारत का नहीं है विज्ञान जूँ (जी हां, शीर्षक में एक ही अक्षर है) औषधि गुण मुलेठी के जारी है संजीवनी बुटी ,सोम की खोज ……! (श्रंखला) सफल जीवन साधारण सी पीठ पर न लादें जॉब स्ट्रेस का शैतान साहित्य-परिचय छायावाद की सबसे बड़ी देन हास्य हिन्दी चिट्ठाकारों का वर्गीकरण (हास्य+गंभीर लेख) हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी क्यों नहीं है?? […]
अनूप शुक्ल
November 21st, 2007 at 9:14 pm
21धांसू है जी। हम चुल्लू भर पानी खोज रहे हैं शरम से कि इत्ती देर् से ये पोस्ट देख पाये और आनन्द वंचित रहे।वैसे हम इत्ते रईस नहीं हैं । हां मौज वाली बात सही है। अब जल्दी ही निठल्ली मौज ली जायेगी।
फुरसतिया » ब्लाग नौटंकी उर्फ़ चिठेरा-चिठेरा संवाद
November 22nd, 2007 at 8:13 am
22[…] इसी नट-नटी की तर्ज पर हमने सोचा कि एकाध बार ब्लाग-नौटंकी लिखी जाये तो कैसा रहे! नट-नटी की तर्ज पर ब्लागर-ब्लागराइन तो जमेगा नहीं। ज्ञानजी ने चिठेरा बताया था एक दिन ब्लागर को। सो चिठेरा-चिठेरी सम्वाद लिखे जायें। सम्वाद का मसौदा पेशे-खिदमत है:- चिठेरा: अरी चिठेरी, बड़ी कम उमर लग रही है आज तो! क्या ज्ञानजी के यहां से हर्र की गोली खा के आ रही है! चिठेरी: तू भी तो नये नारद की टिपटाप लग रहा है। स्लिम-ट्रिम। धड़ाधड़ महाराज की तरह स्मार्टनेस बिखराये जा रही है। चिठेरा: तू कौनब्लागवाणी से कम इतरा रही है। न जाने कित्ते तेरे पे फ़िदा है। किसी नये-नवेले ब्लाग की तरह खूबसूरत लग रही है। चिठेरी: मैं खूबसूरत लग रही हूं! सच! चिठेरा:मुच! चिठेरी: हाय चिठेरे, तू कित्ता रईस दिल है। मेरे लिये इत्ता बड़ा झूठ बोल गया। मैं तो तुझे एकदम निठल्ला समझती थी। लेकिन तू तो दिल का समीरलाल निकला। चिठेरा: तू भी मेरी तारीफ़ कर न! कौन रोकता है! कौन टोकता है! कर न! चिठेरी: नई यार, मुझसे झूठ नई बोला जाता। चिठेरा: चल छोड़ अच्छा ला थोड़ा पुराणिक मसाला खिला। चिठेरी:अरे पुराणिक मसाला वाला भग गया हरिद्वार। दुकान बन्द करके। तीन दिन बाद आयेगा। चिठेरा: क्यों भला उसकी अभी तीर्थ करने की उमर है? अभी तो जवान है! चिठेरी:अरे वो बड़ा लुच्चा है। स्मार्ट लुच्चा। जो अगड़म-बगड़म हरकतें करता है उनको टाइम-टाइम पे हरिद्वार में धो आता है। ताकी नयी हरकते कर सके। चिठेरा: और वो समीर पुड़िया किधर गयी? चिठेरी: वो जबलपुर में भेड़ाघाट के किनारे गयी है। रेलवे के फ़ाटक पर किसी गोरी-छोरी को कनखियों से निहार रहा होगा। चिठेरा: तुझको नहीं निहारेगा। चिठेरी:अरे टिप्पणीझौंसे! तेरी तो ऐसी-तैसी। न जाने कैसी-कैसी ! मैं तुझे क्या ऐसी-वैसी, जैसी-तैसी लगती हूं। चिठेरा: अरे, स्माइली लगा तो दी फ़िर काहे अकड़ रही है। ज्यादा करेगी तो तेरा बहिष्कार कर दूंगा। चिठेरी:तू मेरा बहिष्कार करेगा! करके तो देख। बड़ा प्रमेन्द भैया की तरह टीन-टप्पर बन रहा है। करके तो देख। इतने समझौता करवाने वाले आ जायेंगे कि ब्लाग-सड़क जाम हो जायेगी। पोस्ट वर्षा होने लगेगी। सब तरफ़ यू एन ऒ छाप टिप्पणियां दिखेंगी। चिठेरा: अरे, तू तो सच में बुरा मान गयी। ये ले एक स्माइली और ले ले। खुश रह। नाराज मत हो खून जलता है। शकल ऐसे ही माशाअल्लाह है। और भी बेनजीर भुट्टो नुमा हो जायेगी। मान जा! चिठेरी: चल मान गई। तू भी क्या याद करेगा किसी रईस चिठेरी से पाला पड़ा है। लेकिन तो एक बात गांठ बांध ले अकल के दुश्मन कि मुझे अपनी तारीफ़ के सिवाय और कोई मजाक नहीं पसन्द। अबकी मजाक किया तो कोसने लगूंगी कि कोई लड़की तुम्हें अचानक देखने आ जाये और तुझसे चाय बनवा के पी जाये। जैसा घुघुती दीदी ने किया था अपने टाइम में। चिठेरा: अरे, तू तो बड़ी जहीन है, महीन है, ये सब लोग कहिन है। सुबह-सुबह टाइम मत खोटी कर अनाम टिप्पणीकार की तरह। अच्छा-अच्छा बोल साधुवादी अन्दाज में। चिठेरी: ठीक है लेकिन तू अपना दिमाग कसवा के आया कर हफ़्ते में एक दिन ज्ञानजी के साइकिल वाले से। तेरे दिमाग में मसिजीवी की तरह शरातत के कीड़े कुलबुलाते रहते हैं। हमेशा पंगेबाज बनने की कोशिश करता है। जबकि तू जानता है तू कब्भी उत्ता पंगा नहीं ले सकता। अब तो वो भी बेचारे नहीं लेते। हाऊ सैड! हाऊ बैड। चिठेरा: तुम भी एकदम्मै सेन्सेक्स की तरह अनसर्टेन हो। कहीं का कहीं बतरस-पतंग उड़ाने लगती हो। कित्ती मनभावन अदा है। चिठेरी: तुझे तो ठीक से तारीफ़ भी नहीं करनी आते निगोड़े। एक हफ़्ते का क्रैश कोर्स कर डाल जबलपुर जाके समीरलाल के यहां। कुछ सीख। जिन्दगी सुधर जायेगी। वर्ना बना फ़ुरसतिया बरबाद होता रहेगा। चिठेरा:अब इस उमर क्या सीखेंगे? चिठेरी:अरे अभी तेरी उमर ही क्या हुयी है। जब ज्ञानजी जैसे अनुभवी लोग अपने अनुभव-कोठार में नयी चीजे समा ।रहे हैं । पुलकोट के साथ फोटो लगा रहे हैं। तो तू क्यों नईं कर सकता जी! चल जा कर। टाइम मत खोटी कर। चिठेरा: तुम कित्ती अच्छी हो। मेरा कित्ता भला सोचती हो। भगवान करे तेरे ब्लाग पर पाठकों की भीड़ ऐसे ही जमी रहे जैसे राहत-योजना का पैसा बांटने वाले केन्द्र में लगी रहती है। तेरे ब्लाग पर टिप्पणियों की ऐसे बौछार हो जैसे अमेरिका इराक में बम बरसाता है। तेरे दुश्मन सद्दाम की तरह मारे जायें। चिठेरी: चल, चल। बहुत हो गयी मस्केबाजी। चिठेरी खुश हुई। जा आफिस भाग। दफ़्तर तेरा इंतजार कर रहा है। चिठेरा: चला -चला लेकिन ऐसे हड़बड़ाते हुये मिलना भी कोई मिलना हुआ भला। [ब्लाग नक्कारा आशीष की शादी पर बजने वाले पूर्वाभ्यास की तरह बजता है] […]
फुरसतिया » ब्लाग नौटंकी उर्फ़ चिठेरी-चिठेरा संवाद
November 23rd, 2007 at 12:19 am
23[…] चिठेरा: अरी चिठेरी, बड़ी कम उमर लग रही है आज तो! क्या ज्ञानजी के यहां से हर्र की गोली खा के आ रही है! चिठेरी: तू भी तो नये नारद की टिपटाप लग रहा है। स्लिम-ट्रिम। धड़ाधड़ महाराज की तरह स्मार्टनेस बिखराये जा रही है। चिठेरा: तू कौन ब्लागवाणी से कम इतरा रही है। न जाने कित्ते तेरे पे फ़िदा है। किसी नये-नवेले ब्लाग की तरह खूबसूरत लग रही है। चिठेरी: मैं खूबसूरत लग रही हूं! सच! चिठेरा:मुच! चिठेरी: हाय चिठेरे, तू कित्ता रईस दिल है। मेरे लिये इत्ता बड़ा झूठ बोल गया। मैं तो तुझे एकदम निठल्ला समझती थी। लेकिन तू तो दिल का समीरलाल निकला। किसी को निराश नहीं करता! चिठेरा: तू भी मेरी तारीफ़ कर न! कौन रोकता है! कौन टोकता है! कर न! चिठेरी: नई यार, मुझसे झूठ नई बोला जाता। चिठेरा: चल छोड़ अच्छा ला थोड़ा पुराणिक मसाला खिला। चिठेरी:अरे पुराणिक मसाला वाला भग गया हरिद्वार। दुकान बन्द करके। तीन दिन बाद आयेगा। चिठेरा: क्यों भला उसकी अभी तीर्थ करने की उमर है? अभी तो जवान है! चिठेरी:अरे वो बड़ा लुच्चा है। स्मार्ट लुच्चा। जो अगड़म-बगड़म हरकतें करता है उनको टाइम-टाइम पे हरिद्वार में धो आता है। ताकी नयी हरकते कर सके। चिठेरा: और वो समीर पुड़ियाधर गयी? चिठेरी: वो जबलपुर में भेड़ाघाट के किनारे गयी है। रेलवे के फ़ाटक पर किसी गोरी-छोरी को कनखियों से निहार रहा होगा। चिठेरा: तुझको नहीं निहारेगा। चिठेरी:अरे टिप्पणीझौंसे! तेरी तो ऐसी-तैसी। न जाने कैसी-कैसी ! मैं तुझे क्या ऐसी-वैसी, जैसी-तैसी लगती हूं। चिठेरा: अरे, स्माइली लगा तो दी फ़िर काहे अकड़ रही है। ज्यादा करेगी तो तेरा बहिष्कार कर दूंगा। चिठेरी:तू मेरा बहिष्कार करेगा! करके तो देख। बड़ा प्रमेन्द भैया की तरह टीन-टप्पर बन रहा है। करके तो देख। इतने समझौता करवाने वाले आ जायेंगे कि ब्लाग-सड़क जाम हो जायेगी। पोस्ट वर्षा होने लगेगी। सब तरफ़ यू एन ऒ छाप टिप्पणियां दिखेंगी। चिठेरा: अरे, तू तो सच में बुरा मान गयी। ये ले एक स्माइली और ले ले। खुश रह। नाराज मत हो खून जलता है। शकल ऐसे ही माशाअल्लाह है। और भी बेनजीर भुट्टो नुमा हो जायेगी। मान जा! चिठेरी: चल मान गई। तू भी क्या याद करेगा किसी रईस चिठेरी से पाला पड़ा है। लेकिन तो एक बात गांठ बांध ले अकल के दुश्मन कि मुझे अपनी तारीफ़ के सिवाय और कोई मजाक नहीं पसन्द। अबकी मजाक किया तो कोसने लगूंगी कि कोई लड़की तुम्हें अचानक देखने आ जाये और तुझसे चाय बनवा के पी जाये। जैसा घुघुती दीदी ने किया था अपने टाइम में। चिठेरा: अरे, तू तो बड़ी जहीन है, महीन है, ये सब लोग कहिन है। सुबह-सुबह टाइम मत खोटी कर अनाम टिप्पणीकार की तरह। अच्छा-अच्छा बोल साधुवादी अन्दाज में। चिठेरी: ठीक है लेकिन तू अपना दिमाग कसवा के आया कर हफ़्ते में एक दिन ज्ञानजी के साइकिल वाले से। तेरे दिमाग में मसिजीवी की तरह शरातत के कीड़े कुलबुलाते रहते हैं। हमेशा पंगेबाज बनने की कोशिश करता है। जबकि तू जानता है तू कब्भी उत्ता पंगा नहीं ले सकता। अब तो वो भी बेचारे नहीं लेते। हाऊ सैड! हाऊ बैड। चिठेरा: तुम भी एकदम्मै सेन्सेक्स की तरह अनसर्टेन हो। कहीं का कहीं बतरस-पतंग उड़ाने लगती हो। कित्ती मनभावन अदा है। चिठेरी: तुझे तो ठीक से तारीफ़ भी नहीं करनी आते निगोड़े। एक हफ़्ते का क्रैश कोर्स कर डाल जबलपुर जाके समीरलाल के यहां। कुछ सीख। जिन्दगी सुधर जायेगी। वर्ना बना फ़ुरसतिया बरबाद होता रहेगा। चिठेरा:अब इस उमर क्या सीखेंगे? चिठेरी:अरे अभी तेरी उमर ही क्या हुयी है। जब ज्ञानजी जैसे अनुभवी लोग अपने अनुभव-कोठार में नयी चीजे समा ।रहे हैं । पुलकोट के साथ फोटो लगा रहे हैं। तो तू क्यों नईं कर सकता जी! चल जा कर। टाइम मत खोटी कर। चिठेरा: तुम कित्ती अच्छी हो। मेरा कित्ता भला सोचती हो। भगवान करे तेरे ब्लाग पर पाठकों की भीड़ ऐसे ही जमी रहे जैसे राहत-योजना का पैसा बांटने वाले केन्द्र में लगी रहती है। तेरे ब्लाग पर टिप्पणियों की ऐसे बौछार हो जैसे अमेरिका इराक में बम बरसाता है। तेरे दुश्मन सद्दाम की तरह मारे जायें। चिठेरी: चल, चल। बहुत हो गयी मस्केबाजी। चिठेरी खुश हुई। जा आफिस भाग। दफ़्तर तेरा इंतजार कर रहा है। चिठेरा: चला -चला लेकिन ऐसे हड़बड़ाते हुये मिलना भी कोई मिलना हुआ भला। [ब्लाग नक्कारा आशीष की शादी पर बजने वाले पूर्वाभ्यास की तरह बजता है] […]
ghughutibasuti
February 8th, 2008 at 2:53 am
24हम जन्मजात विद्रोही हैं, खाँचे तोड़ देंगे मगर फिट नहीं होंगे ।
घुघूती बासूती
kaushal
April 8th, 2008 at 12:14 pm
25hello
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