हल्ला मचा रखा है नंदीग्राम बंदीग्राम
इधर कुछ दिनों से देख रहा हूँ कि हर तीसरी या चौथी पोस्ट नंदीग्राम पर ही होती है, हिन्दी चिट्ठाजगत में नंदीग्राम का ही शोर है। अरे इतना शोर मचाने की क्या जरूरत है ये तो गरीब हैं, किसान हैं ये तो शायद पैदा ही कुचले जाने के लिये हैं। इनका ये ही हस्र होना था, पश्चिम बंगाल में कुछ ज्यादा हो रहा है इसमें इतना हल्ला मचाने की क्या जरूरत है।
ये उदगार मेरे नही उन नेताओं के होते जो समाचारों की जगह पर ब्लोग पढ़ रहे होते, क्योंकि नंदीग्राम पर जितना चिट्ठों पर लिखा जा रहा है क्या हिन्दी और क्या दूसरी भाषा उतना ही शायद समाचारों में भी कवर किया जा रहा है। कम से कम सात समंदर पार बैठे अधिकांश भारतीयों (चिट्ठाकारों को छोड़कर) को जो सिर्फ टीवी की न्यूज के भरोसे बैठे रहते हों उनको शायद ही इसकी भयानकता का ऐहसास हो।
जब सबसे पहले नंदीग्राम में लाठियाँ बरसायी गयी थी, शायद गोलियाँ भी, उसके बाद से आजतक मैने कम से कम ये खबर यहाँ देसी न्यूज चैनल जी पर दोबारा नही देखी। यहाँ अमेरिका में केबल के द्वारा (सैटेलाइट छोड़कर) सिर्फ जी टीवी आता है, और ये ३० मिनट की न्यूज में २४-३६ घंटे के दौरान एक ही माल बारबार दिखाता है। इनको फिल्म और क्रिकेट के अलावा कोई खबर ही नही मिलती, अगर वक्त मिले तो न्यूज में किसी गाने वाने को २-३ मिनट तक सुना देते हैं, या गली मोहल्ले की कोई खबर। कभी ये भी नही मिलती तो न्यूज १० मिनट पहले ही खराब हो जाती है।
मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस चिट्ठाजगत में जितने भी टीवी न्यूज पत्रकारिता या मीडिया से जुड़े लोग है अगर वो अमेरिका में इस जी टीवी के न्यूज बूलेटिन को २-३ बार देख लें तो अपने प्रोफेशन से शर्मसार हो उठेंगे। और ये दावा मैं उनके चिट्ठों के द्वारा व्यक्त होने वाले उदगारों के बिना पर कर रहा हूँ।
वहाँ नंदीग्राम में जीने के लाले पड़े हैं यहाँ हम झेले जा रहे थे ओम शांति ओम और सांवरिया में कौन जीतेगा, अब जब कि ये रिजल्ट आ चुका है तो कुछ दिनों की शांति है लेकिन अभी भी ये लोग नंदीग्राम तक नही पहुँचे। वो तो ना जाने कब पहुँचे लेकिन हम तो वहाँ पहुँचते रहेंगे चिट्ठों के माध्यम से आज भी और शायद कल भी। इक्का दुक्का नेताओं की प्रतिक्रिया कभी किसी न्यूज पेपर (इंटरनेट वाला) पर नजर आती है तो लगता है वो ये ही कहना चाह रहे हैं - क्या हल्ला मचा रखा है नंदीग्राम बंदीग्राम। इस दिशा में उठाये जाने वाले इन नेताओं के कदमों और बयानबाजी से कम से कम मैं तो यही मतलब निकाल पाया।




वाह साहब बढ़िया लिखा है एह्दम मेरे मन की बात. अच्छी और सार्थक पोस्ट.
यहाँ भारत में भी बहुत हल्ला नहीं है। मार-काट लगी रहती है। मानव जीवन का अवमूल्यन बहुत तरह से बहुत स्तरों पर है।
बढिया लिखा है।
बढि़या है। सुन्दर,शानदार!
मामला सिर्फ जी न्यूज का ही नहीं है। सारे हिंदी चैनलों का यही हाल है एक मिनट में नंदीग्राम। आधे-एक घंटे का नाच मेरी बिल्लो का विशेष शो
बढिया जागरूक करता लेख…बधाई…
तुम पुकारो..मैँ ना आऊँ…
ऐसा हरजाई नहीं…
राजीव तनेजा