दो नावों पर सवार, हर पल पड़ती मार
क्या मुझे बताना चाहिये कि यहाँ बात किस के संदर्भ में की जा रही है? शायद ये ही बेहतर रहेगा, मैं पाकिस्तान की बात कर रहा हूँ। अब आप ही देखिये ६० साल के इतिहास में २७ साल डेमोक्रेसी की सरकार चली और ३३ साल मिलेटरी का शासन, हुई ना दो नावों में सवारी।
वैसे अगर जिन्ना साहेब ऊपर से झांक रहे होंगे तो शायद यही कह रहे होंगे कि ‘दो कदम गलत पड़े थे राहे शौक में, डेमोक्रेसी तमाम उम्र पाकिस्तान ढूँढती रही‘। वो कौन से दो कदम थे ये जानने के लिये आपको उस लिंक पर जाकर पढ़ना पड़ेगा जो मैं इस पोस्ट के आखिर में दूँगा। उसे पढ़ने के बाद आपको भी शायद समझ आ जाये हमने क्यों ‘हर पल पड़ती मार’ का जिक्र किया। खैर आप समझे ना समझे लेकिन उसे पढ़कर हमें तो यही समझ आया कि उस देश का सबसे बड़ा हमदर्द ही सबसे बड़ा दर्द देने वालों में से है।
बीबीसी में इलियास खान के इस आलेख के संदर्भ में ही हमने ये निष्कर्ष निकाला, आप भी जरूर पढ़ियेगा।
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This post has 6 comments
November 8th, 2007
समझे तो हम हैं ही..मगर फिर भी अब लिंक पर जाकर गहराई नापते हैं. आभार लिंक देने का.
November 8th, 2007
गलत बुनियाद पर बने राष्ट्र का हश्र यही होना है। आतंकवाद को प्रश्रय देना अपने ऊपर ही भारी पड़ता है। जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा। अपने यहां भी इंदिरा गांधी के साथ ऐसा हो चुका है। भिंडरांवाले को पैदा किया तो उसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
November 8th, 2007
अनिल रघुराज की बात सही है। गलत बुनियाद पर बना है यह। पहले पूर्वी बंगाल गया। अब हमारी जिन्दगी में ही शायद इसका खण्ड-ख्ण्ड होना देखें हम!
November 8th, 2007
अनिल रघुराज की बात सही है। गलत बुनियाद पर बना है यह। पहले पूर्वी बंगाल गया। अब हमारी जिन्दगी में ही शायद इसका खण्ड-खण्ड होना देखें हम!
November 8th, 2007
आप की बात तो सकझ गए…लेकिन आप का दिया गया लिकं पर भी जा के देखते हैं।
November 8th, 2007
बढ़िया विश्लेषण..
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