21 Jul
Posted as मेरी नजर मेरे विचार
Tags:मेरी नजर मेरे विचार, chitthajagat, hindiआजकल हिन्दी चिट्ठा संसार में 3-4 एग्रीगेटर हो गये हैं, अगर ये आपको अभी भी कम लग रहे हैं तो मेरी अगली पोस्ट देखना मत भूलियेगा जिसमें मैं आपको बताऊँगा कि आप अपना खुद का एग्रीगेटर कैसे बना सकते हैं। हाँ तो मैं बात कर रहा था हिंदी एग्रीगेटर की। इनमें से एक है चिट्ठाजगत, जिसमें बाकियों के मुकाबले थोड़ा अधिक फीचर हैं। हमारी इस पोस्ट को चिट्ठाजगत की टीम शिकायत या सुझाव भी समझ सकती है जाहिर सी बात है मानने ना मानने का चिट्ठाजगत की टीम को पूरा हक है।
चिट्ठाजगत में, मैं ये नही समझ पाया कि धड़ाधड़ छपते चिट्ठों की अलग से लिस्ट दिखाकर क्या हासिल करने की कोशिश की जा रही है। क्योंकि अगर भाषा के अर्थ में जायें तो सक्रिय वो ही कहा जायेगा जो धड़ाधड़ पोस्ट छाप रहा हो। लेकिन अगर आप इन दोनों बॉक्स में नजर दौड़ायें तो जो धड़ाधड़ चिट्ठे छाप रहे हैं वो सक्रिय लिस्ट में उस जगह नही हैं जहाँ होना चाहिये। और जो सक्रिय हैं वो धडाधड़ चिट्ठे नही लिख रहे हैं यानि कि उन्हें कोई और सक्रिय बना रहा है, शायद उनकी पोस्ट का लिंक।
हिन्दी चिट्ठाजगत में अमूमन अभी ऐसी स्थिती नही है कि ब्लोगर एक दूसरे के पोस्ट को लेकर कुछ लिखें। ये सिर्फ तभी होता दिखा है अभी तक जब कोई किसी विवादास्पद विषय पर कुछ लिखता है। अगर कुछ एक अपवादों को छोड़ दिया जाय तो लगभग 80-90 प्रतिशत चिट्ठों की पोस्टों का जिक्र (या लिंक) किसी दूसरे के ब्लोग में शायद ही होता हो। खैर इस सक्रिय लिस्ट से उतना खतरा नही है जितना धड़ाधड़ छपते चिट्ठों की लिस्ट से है।
धड़ाधड़ चिट्ठों के अगर टॉप के 3-4 लिंक पर क्लिक कीजिये तो ऐसा कुछ नही मिलता जो आपको वहाँ दोबारा लेकर जाये। किसी में शेयर मार्केट की किसी न्यूज की 4-5 लाईन हैं तो दूसरे में पहले से ही सताये सास-बहू के सीरियलों के अलग अलग एपिसोड को डाउनलोड करने के लिये दिया गया लिंक। कहीं ऐसा ना हो कि धड़ाधड़ के बॉक्स में बने रहने के चक्कर में क्वालिटी के लेखों की हिन्दी में कमी होने लगे। ध्यान रहे क्वालिटी लेख का किसी भी भाषा के उत्थान में बहुत बड़ा हाथ होता है। १ घंटे के अंतर में 2-3 लाईन की एक साथ 4-5 पोस्ट (वो भी प्रतिदिन) में पढ़ने लायक क्या हो सकता है ये समझने की समझ अपनी खोपड़ी में तो नही है। टीआरपी के चक्कर में न्यूज चैनल की खबरों का जो हाल हुआ है कहीं ऐसा ना हो कि वो सब हिंदी ब्लागिंग में भी दिखाये देने लगे।
हिंदी को इंटरनेट और दुनिया में फैलाना एक मेराथन रेस है जिसमें धीरे धीरे दौड़ा जाता है, इतने तेज अगर भागने लगे तो कहीं फीनिश लाईन तक पहुँचते पहुँचते हांफने ना लगे। बरहाल ये मेरा अपना नजरिया है, हो सकता है आप इससे इत्तेफाक नही रखते हो, अगर ऐसा है तो आप भी अपने विचार रख सकते हैं, शायद इस बहाने हिंदी ब्लागिंग का कुछ भला ही हो जाय।
21 Responses
अनूप शुक्ल
July 21st, 2007 at 7:32 am
1अब यह जबाब तो चिट्ठाजगत वाले साथी देंगे लेकिन हिंदी को इंटरनेट और दुनिया में फैलाना एक मेराथन रेस है जिसमें धीरे धीरे दौड़ा जाता है, इतने तेज अगर भागने लगे तो कहीं फीनिश लाईन तक पहुँचते पहुँचते हांफने ना लगे। सबके मनन की है।
विपुल
July 21st, 2007 at 7:50 am
2@ तरूण
इस विषय के चिन्तन पर शुक्रिया
आपने यह तो साफ कर दिया, धड़ाधड़ वाली लिस्ट में पहले चार छोड़ कर बाकी सब क्वालिटी के लेख लिख रहे हैं।
बस यहाँ यह कहूँगा, आज एक लाईन लिखने वाला कल कितनी लाईन लिखेगा, कौन कह सकता है।
और उत्तर आनें दें फिर अपने विचार विस्तार से रखुँगा।
@ अनुपजी
फिनिश लाईन अगर इतनी पास है, तो हमें अभी सब छोड़ देना चाहिए। मेरे हिसाब से अभी तो गाड़ी पहली दूसरी गेयर में चल रही है। स्पीड़ पकड़ने दें, सब रास्ते निकल जाएँगे।
विपुल
July 21st, 2007 at 8:08 am
3@तरूण
हिन्दी चिट्ठाजगत में अमूमन अभी ऐसी स्थिती नही है कि ब्लोगर एक दूसरे के पोस्ट को लेकर कुछ लिखें।
शायद यह गलत है
सक्रियता क्रं० में किसी भी चिट्ठाकार के चिट्ठे पर चट्काएँ
Raviratlami ४३ चिट्ठों की ८५ प्रविष्टियों में उपस्थिति
फ़ुरसतिया ५६ चिट्ठों की ११७ प्रविष्टियों में उपस्थिति
Udan Tashtari ४३ चिट्ठों की ८४ प्रविष्टियों में उपस्थिति
अभय तिवारी
July 21st, 2007 at 8:39 am
4अब ये तो लिस्ट बनाने वाले पर निर्भर है कि वह कैसी लिस्ट बनाये.. लेकिन इतना ज़रूर है.. लिस्ट बनते ही आदमी एक होड़ में शामिल हो जाता है.. चाहे अनचाहे…मेरा नम्बर कहाँ है? क्या यह भाव भी आप की गुणवत्ता पर प्रभाव डालेगा..?
Anunad Singh
July 21st, 2007 at 9:54 am
5मेरा विचार है कि अब हिन्दी चिट्ठों के संकलकों को आंख मूदकर सारे चिट्ठे जोड़ने की नीति त्यागनी चाहिये। इस सोच के पीछे तर्क यह है कि अब हिन्दी चिट्ठों की संख्या इतनी हो गयी है कि किसी के पास भी इतना समय नहीं है कि सभी चिट्ठों को पढ़ सके। आप कह सकते हैं कि पाठक के सामने सभी चिट्ठे प्रस्तुत किये जांय और वही निर्धारित करे कि क्या पढ़ना है और क्या नहीं। पर दूसरी तरफ यदि एग्रीगेटर द्वारा प्रदर्शित बहुसंख्यक प्रविष्टियां उसे ‘कचरा’ लगने लगें तो उस एग्रीगेतर का क्या काम!
इसलिये मेरा भी सुझाव है कि कुछ चिट्ठों को निकालते रहने की नीति बने। पहले यह थोड़ी उदार रखी जाय और जैसे-जैसे चिट्ठे बढ़ें वैसे-वैसे इसको कठोर कर दिया जाय। इससे हिन्दी चिट्ठों में ‘क्वालिटी’ आयेगी।
yunus
July 21st, 2007 at 10:01 am
6मुझे नहीं लगता कि हमें ‘क्वान्टिटी’ की तरफ भागना चाहिये, हम ‘क्वालिटी’ को निभा लें इतना काफी है । आपने देखा की टी.वी. रेटिंग किस तरह छोटे परदे को ऊल जलूल चीज़ों से भर रही है ।
ई-स्वामी
July 21st, 2007 at 10:22 am
7मैं उस लिस्ट में १ से बीस पर आ गया हूं जरा सी कोशिश और .. थोडे दिन आराम करूंगा
… हू केअर्स!
kakesh
July 21st, 2007 at 11:24 am
8मैं भी किसी भी रेटिंग के खिलाफ हूँ. जो अच्छा है उसे लोग आज नहीं तो कल जरूर ही पढ़ेंगे.
संजय बेंगाणी
July 21st, 2007 at 11:44 am
9मुझे अनुनादजी की बात में दम लग रहा है. वैसे अपने पास परिवारीक एग्रीगेटर भी है ही, नारद.
उसमें काफी कुछ छन कर ही आता है.
sanjay tiwari
July 21st, 2007 at 12:19 pm
10साधन अपनेआप में कोई परिणाम नहीं देता. यह हमारे ऊपर है कि हम उसका कैसा उपयोग करते हैं. हम जैसा उपयोग करते हैं परिणाम वैसा ही आता है.
विषय अच्छा उठाया है आपने. देखते हैं रामजी क्या रास्ता दिखाते हैं. वैसे इस बात का खतरा तो है ही कि अगर यह माध्यम शसक्त बनता है तो बाजारू लोग इसका फायदा उठाने की कोशिश करेंगे.
जगदीश भाटिया
July 21st, 2007 at 1:36 pm
11धड़ाधड़ छपते चिट्ठों में से क्वालिटी लेखन को अलग कर उसको पहचान दिया जाना बहुत जरूरी है।
rachna
July 21st, 2007 at 2:14 pm
12हिन्दी टेलिभिजन सग्रह
all the posting that are made here are illegal downloads if i am not mistaken
i think this blog should be removed from chitthajagat
paramjitbali
July 21st, 2007 at 6:48 pm
13अनुनाद जी की बात विचार करने योग्य है।
सागर चन्द नाहर
July 21st, 2007 at 9:58 pm
14मेरा भी यही मानना है कि हमें क्वालिटी कि तरफ ध्यान देना चाहिये ना कि क्वांटिटी की तरफ।
divyabh
July 21st, 2007 at 10:50 pm
15तरूर,
बदलाव तो अभी काफी होना है मगर यह कौन करे यह भी प्रश्न है…कौन पहचान सकता है कि कौन सी पोस्ट अच्छी है कौन बुरी देखिए मैं भी तो काफी दिनों से हूँ यहाँ मगर क्या फर्क पड़ता है…अपने अंदर तो पता चलता ही है कि कौन क्या लिख रह है और हम क्या जल्बे दिखा रहे हैं।
तीन गैरज़रूरी बातें :: नुक्ताचीनी
July 22nd, 2007 at 2:54 am
16[…] दूसरी, थोड़ी कम महत्वपूर्ण बात, यह कि रवि भैया और श्रीश के परिश्रम से हिन्दी चिट्ठों की निर्देशिका का जालस्थल अब हिन्दी में भी उपलब्ध है। यदि आप पंजीकृत हैं तो अंग्रेज़ी और हिन्दी में से कोई भी भाषा चुन सकते हैं अपने प्रोफाईल पृष्ठ पर। वैसे मुझे हैरत होती है कि इस जालस्थल पर रोज कई लोग पंजीकृत हो रहे हैं पर ज्यादातर अपने ब्लॉग नहीं जोड़ते। जो ब्लॉग जोड़ देते हैं, वो उसे क्लेम नहीं करते जिससे कि ब्लॉग के प्रोफाईल पृष्ठ पर रचयिता के रूप में उनका नाम नहीं दिखता। और जो क्लेम कर लेते हैं वो दुबारा रुख नहीं करते इस ओर। इस निर्देशिका पर आप अन्य चिट्ठों की समीक्षा लिख कर उनको रेटिंग प्रदान कर सकते हैं। ऐसे समय में जब सक्रियता और धड़ाधड़ शब्दों के बीच का फासला समझ न आता हो चिट्ठों की श्रेष्ठता का ये सामूहिक पैमाना हो सकता था। और कल क्या जाने इंडीब्लॉगीज़ के लिये केवल इसी निर्देशिका के क्लेम्ड चिट्ठों को ही शामिल किया जाय […]
masijeevi
July 22nd, 2007 at 1:16 pm
17मामला जाहिर है काफी जटिल है, गुनातमकता के सवाल पर जरा संभल कर चला जाएं क्योंकि किसे गुणात्मक मानें इस निर्णय की गुणात्मकता से भी फर्क पड़ेगा। वैसे भ्रम धड़ाधड़ शब्द की वजह से है- गोपनाय सुत्र में केवल पोस्टों का संख्या ही एकमात्र मापदंड नहीं है ऐसा विपुल ने बताया था। शेयर, टीवी हम नहीं पढ़ते पर हम कौन फन्ने खां हो गए जो तय करेंगे की वह कूड़ा है- हम तो नामवर सिंह को भी नहीं पढ़ते पर उन्हें कोन् कूड़ेदान में फेंकता है इसलिए सबको आने दें- एग्रीगेटर राशन कोटे का काम न करे लिखा जाना चाहिए खूब..बाकी छलनी तो लोगों के दिमाग में लगी ही है वे खुद तय कर लेंगे।क्या पढ़ना है क्या नहीं..
Tarun
July 22nd, 2007 at 8:48 pm
18@विपुलजी, चिट्ठों के लिंक के लिये मैने पहले ही कहा था कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो ८०-९० प्रतिशत चिट्ठों का लिंक अभी भी नही हो पाता। इसलिये लिंक को पैमाना अगर माना भी जाय तो इसका वजन थोड़ा कम रहना चाहिये जिससे सक्रिय चिट्ठों की लिस्ट थोड़ा सही से रहे।
@अभयजी, “लिस्ट बनते ही आदमी एक होड़ में शामिल हो जाता है” बहुत सही बात कही है आपने।
@अनुनाद, युनुस, आपका कहना उचित है मनन करने की जरूरत है।
@ई-स्वामी, चिंता तो हमें भी नही है लेकिन बाकि लोग वक्त रहते चेत जायें तो अच्छा
@मसीजिवी, हमने कूड़ा किसी को नही कहा, बात उनकी हो रही है जो इधर उधर की खबर को ३-४ लाईन का जामा पहना एक ही दिन में धड़ाधड़ छापे जाते हैं।
बाकि सभी लोगों को अपने विचार व्यक्त करने के लिये शुक्रिया
vipul
July 22nd, 2007 at 10:01 pm
19इसलिये लिंक को पैमाना अगर माना भी जाय तो इसका वजन थोड़ा कम रहना चाहिये जिससे सक्रिय चिट्ठों की लिस्ट थोड़ा सही से रहे।
@तरूण
शायद आपने सारे बिन्दू देखे नहीं, और लम्बे समय में चौथा बिन्दू निर्णय करेगा कौन कितने पानी में है। सूत्र समय के हिसाब से बदला भी जायेगा।
http://www.chitthajagat.in/?sakriyeta=dekho
१ आपके चिट्ठा लिखने की आवृति क्या है।
२ आपने आखरी लेख कब लिखा।
३ आपके लेख का उदाहरण कितने चिट्ठों की कितनी प्रविष्टियों में दिया गया। ध्यान रहे “उदाहरण” लेख feed में अवतरित होता हो।
४ “पसंदीदा चिट्ठे”, “पसंदीदा लेख”, “चिट्ठे सूचक”, “सांकेतिकशब्द सूचक” सूची में आपको कितने प्रयोक्ताओं ने सूचीबद्ध किया है।
५ इस के लिए प्रयोग होने वाला सूत्र गोपनीय रहेगा, एवं समय के हिसाब से बदला भी जायेगा।
वैसे सक्रिय और धड़ाधड़ चिट्ठों में विरोधाभास न होता तो अलग-अलग करने की जरूरत न होती।
एक स्वाल है आप सब से, अगर क्वालेटी जाँचने के लिए अगर कोई सूत्र बनाया जाए और वो आप सब की किसी पोस्ट को न दिखाए तो आप को कैसा लगेगा।
और उत्तर आनें दें फिर अपने विचार विस्तार से रखुँगा।
अनुराग श्रीवास्तव
July 23rd, 2007 at 7:12 am
20तरुण,
मुझको तो आपकी अगली पेस्ट की प्रतीक्षा रहेगी - उसके बाद मैं भी अपना “कस्टमाइज़्ड एग्रीगेटर” बनाऊंगा जो कि सिर्फ़ मेरी ही पोस्ट दिखायेगा.
निठल्ला चिन्तन » आप भी बनायें अपना खुद का एग्रीगेटर
July 26th, 2007 at 7:17 am
21[…] « सक्रिय और धड़ाधड़ चिट्ठों का विरोधाभास […]
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