समय बड़ा बलवान
आज ही पता चला कि कुछ दिनों पहले दिल्ली में धकापेल मची थी, जो जनता चिट्ठों के मार्फत जूतमजूत पर उतरी रहती थी, लस्सी के साथ गुफ्तगू के मजे ले रही थी। अच्छा है हिंदी ब्लोगवार्तायें भी होने लगी हैं :)। अभी कुछ लोगों की पोस्ट इस वार्ता के संदर्भ में पढ़ी हैं, कुछ की पढ़नी बाकि हैं (ढूँढनी पड़ेंगी पहले, आजकल धड़ाधड़ छापने का चलन जो चल निकला है ;))। अच्छा लगा सुंदर सुंदर चेहरे मोहरों को बतियाते हुए देखना, शायद इसी लिये कहा है समय बड़ा बलवान कब क्या करवा दे कह नही सकते।
समय से याद आया कि हम आज यहाँ आये किसी ओर वजह से थे, वजह नीचे देखी जा सकती है।
पुराने समय में फटे कपड़े पहनने का मतलब गरीब होना होता था, और आज की २१वीं सदी में फटी जींस पहनने का मतलब है फैशन की समझ और फैशनेबल होना यानि कि अब अमीर पहनते हैं फटे कपड़े वो भी शान से।
(अभी अभी पढ़कर ये एहसास हुआ कि थोड़ी सी गर्मी उधर भी थी जिसकी कुछ उमस इधर भी थी)





मस्त है।
हा हा हा… सही है गुरू
खाने की टेबल पर सब मामले सुलझ जाते है। क्योंकि किसी का ध्यान खाने पर और किसी का कैलोरी-काउन्ट पर होता है बातचीत तो टाइम पास के लिए की जाती है।
कार्टून बढ़िया बना रहे हैं पर हिन्दी में बनायें तो ज्यादा अच्छा लगेगा।
बढिया है!
कृपया हिन्दी मे बनाएं।
कुछ बेवकूफ़ लोगों का शगल है तरूण भाई, फटे कपड़े पहन फैशनेबल कहलाना!!
भईया गर्मी १४ तारीख वाली मीट में हुई थी, हमारी १८ तारीख वाली में तो ठंडक ही रही।
कार्टून बेहतरीन है. हा हा!!
सही है भाई…कार्टून तो मुझे हमेशा से एक सत्य की तस्वीर दिखाई देती है…बहुत सुंदर