आज ही पता चला कि कुछ दिनों पहले दिल्ली में धकापेल मची थी, जो जनता चिट्ठों के मार्फत जूतमजूत पर उतरी रहती थी, लस्सी के साथ गुफ्तगू के मजे ले रही थी। अच्छा है हिंदी ब्लोगवार्तायें भी होने लगी हैं
। अभी कुछ लोगों की पोस्ट इस वार्ता के संदर्भ में पढ़ी हैं, कुछ की पढ़नी बाकि हैं (ढूँढनी पड़ेंगी पहले, आजकल धड़ाधड़ छापने का चलन जो चल निकला है
)। अच्छा लगा सुंदर सुंदर चेहरे मोहरों को बतियाते हुए देखना, शायद इसी लिये कहा है समय बड़ा बलवान कब क्या करवा दे कह नही सकते।
समय से याद आया कि हम आज यहाँ आये किसी ओर वजह से थे, वजह नीचे देखी जा सकती है।
(अभी अभी पढ़कर ये एहसास हुआ कि थोड़ी सी गर्मी उधर भी थी जिसकी कुछ उमस इधर भी थी)
10 Responses
mamta
July 19th, 2007 at 9:39 am
1मस्त है।
Pratik Pandey
July 19th, 2007 at 11:29 am
2हा हा हा… सही है गुरू
ratna
July 19th, 2007 at 11:57 am
3खाने की टेबल पर सब मामले सुलझ जाते है। क्योंकि किसी का ध्यान खाने पर और किसी का कैलोरी-काउन्ट पर होता है बातचीत तो टाइम पास के लिए की जाती है।
सागर चन्द नाहर
July 19th, 2007 at 12:14 pm
4कार्टून बढ़िया बना रहे हैं पर हिन्दी में बनायें तो ज्यादा अच्छा लगेगा।
paramjitbali
July 19th, 2007 at 2:24 pm
5बढिया है!
paramjitbali
July 19th, 2007 at 2:27 pm
6कृपया हिन्दी मे बनाएं।
Amit
July 19th, 2007 at 3:23 pm
7कुछ बेवकूफ़ लोगों का शगल है तरूण भाई, फटे कपड़े पहन फैशनेबल कहलाना!!
श्रीश शर्मा
July 19th, 2007 at 3:50 pm
8भईया गर्मी १४ तारीख वाली मीट में हुई थी, हमारी १८ तारीख वाली में तो ठंडक ही रही।
समीर लाल
July 19th, 2007 at 5:06 pm
9कार्टून बेहतरीन है. हा हा!!
divyabh
July 19th, 2007 at 10:09 pm
10सही है भाई…कार्टून तो मुझे हमेशा से एक सत्य की तस्वीर दिखाई देती है…बहुत सुंदर
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