टिप्पणी करके फंस गया यार

आपने शादी करके फंस गया यार जरूर सुना होगा लेकिन ये टिप्पणी वाली बात हो सकता हो नयी हो। ये भी हो सकता है कि ये आप के साथ भी हो चुका हो लेकिन कभी कह नही पाये। इस बात पर लिखना तो बहुत पहले चाहता था लेकिन वक्त मौका ही नही दे रहा था। कुछ दिनों पहले जब बहुत दिनों बाद हमने अपना मेल बॉक्स चैक किया तो ऐसी बहुत सी मेल नजर आयी जो अपनी नयी पोस्ट छपने की खबर दे रही थीं।

एक-आध जवाबी मेल भी थी लेकिन ऐसा लगा उन जवाबी मेल का कुछ खास असर जनता में हुआ नही, क्योंकि ऐसा लगता था ये अपने पोस्ट के बारे में बताने वाली मेल हमारे इन-बॉक्स से चिपकने का प्रण लेकर आयी थीं। इन मेलों को देख, सबसे पहले हमने जा कर चैक किया नारद को, कि देंखे नब्ज वगैरह चल रही है ना। वहाँ जाकर पाया कि नारद तो और भी हट्टा कट्टा हो गया है, खा-खा कर मोटया गया था, मजे से चल रहा था, ऐसे कोई संकेत भी नही थे कि कभी नब्ज बंद हो गयी हो।

बहरहाल जब ऐसी मेल का आना बदस्तूर जारी रहा तो हमने थक हार कर स्पैम वाले बटन में चटका लगा दिया, उसके बाद थोड़ा शांति है (वैसे आज थोड़ा खलल जरूर पड़ा था ;)) लेकिन स्पैम फोल्डर मोटा हुआ जा रहा है। वैसे ये बताना हम अपना फर्ज समझते हैं कि फुरसतिया के “ऐसा कोई सगा नही जिसको हमने ठगा नही” के तर्ज पर ही “ऐसी किसी भी मेल को हमने बिल्कुल पढ़ा नही”

लेकिन कोस रहे हैं उस घड़ी को जब हमने टिप्पणी करी थी, नये नये ब्लोग में बिना जाने समझे पहुँच गये कहने, बहुत अच्छे, लगे रहो, साथ ही असली वाला ई-मेल पता छोड़ आये सोचा अरे अपना ही हिंदी भाई है, तब क्या पता था कि अपनी ही चिंदी हो जायेगी।

ऐसा पता होता तो “आलतू-फालतू आयी बला को टाल तू” टाईप ई-मेल छोड़ते। अब तो कुछ नही हो सकता फिलहाल वो चिपकू ई-मेलें स्पैम फोल्डर के साथ पंगे में उलझी हैं। नानक दुखिया सब संसार की ही तरह अगर आप भी ऐसे ही भुगतभोगी हैं तो टिप्पणी का चटका जरूर लगायें (इस बात की गारंटी है कि हम आपके दिये ई-मेल पते की तरफ देखेंगे भी नही ;) )।

और अगर आप उनमें से हैं जो नासमझी में इस तरह की ई-मेले भेजते हैं तो भाई, कृप्या करके हमरा पता हटाये देवें, कसम से अगली बार से आपके ब्लोग की तरफ भूलकर भी नही देखेंगे और गलती से ऐसा कर दिया तो “आलतू-फालतू आयी बला को टाल तू” टाईप ई-मेल डालकर ही टिप्पणी करेंगे।

शुभस्य शीघ्रम्

फोटो क्रेडिटः spamdefy

About the Author

Tarun
निठल्ला चिन्तन एक आक्रौश है विचारों की आंधी का, एक द्वंद है सच और झूठ का, एक भावना है प्यार की, एक तमन्ना है आकाश छूने की, कुछ कहने की और कुछ अनकही छोड़ देने की; संक्षेप में कहूँ तो ये है थोड़ी मस्ती थोड़ा चिंतन।

[आपकी हर तरह की टिप्पणी का स्वागत है, ये प्रोत्साहन तो देती ही है साथ में ये भी पता चलता है कि आप लोग किस तरह के आलेखों की अपेक्षा करते हैं। और अगर आप चाहें तो निठल्ला चिंतन को सीधे ईमेल के द्वारा सब्सक्राईब कर सकते हैं और या फिर फीड रीडर में सब्सक्राइब करके भी पढ़ सकते हैं]

12 Responses to “ टिप्पणी करके फंस गया यार ”

  1. हम तो खुद ही बुक्त भोगी बना बैठा हूँ. एक पूरी कथा भी लिख चुका हूँ:

    http://udantashtari.blogspot.com/2007/07/blog-post.html

    अब क्या कहें सिवाय सहानभुति जताने के. जब मिलेंगे तो दो बूँद रो लेना. हमारे कंधे पर सर धर के. :)

  2. तरुन जी आपने आज कई दिनों बाद टिपपणी की तो साफ हो गया कि भाई हम तो आपके मुजरिम नहीं हैं. वैसे कल वायरस के कारण एक मेल (हमारी जानकारी में) हमारे पास से भी गयी कुछ लोगों के पास जिसके लिये हम बाकायदा खेद भी ज्ञापित कर चुके हैं. ..और भुक्त भोगी ..जी हम तो इसे प्रेम का प्रसाद समझ रहे हैं ..ये प्रसाद खायें या ना खायें ..वो बाद की बात है.

  3. हमें इस बारे में कतई पता नहीं था, हम भी यदा कदा चिट्ठों पर टिपियाते रहते हैं लेकिन किसी ने हमें इस लायक नहीं समझा कि हमें ईमेल करके अपनी नयी पोस्ट के बारे में बताये ।

    खैर हमने अपने ब्लाग पर ब्लाग/ईमेल की आचारसंहिता के बारे में एक बार लिखा था कि ऐसी बहुत सारी गलतियाँ लोग नादानी में कर जाते हैं । हम लिंक इसलिये नहीं दे रहे हैं वरना आप समझेंगे कि हम टिपियाकर कटिया फ़ंसाकर आपको पढने के लिये बाध्य कर रहे हैं ।

    आप इसी में खुश हो लें कि आप उन कुछ खास लोगों में से हैं जो अगर चिट्ठा बाँच लें तो लिखने वाला धन्य हो जाये :-)

    साभार,
    नीरज

  4. हम इसीलिये मेल नहीं करते निठल्लों को। :)

  5. तरुण,

    भाई तुम बड़े किस्मत वाले हो कि तुमको इतनी ई-मेल आती हैं. हम तो ऑखें बाये हुये अपना इन-बाक्स घूरते रहते हैं और कोई हमें ई-मेल ही नहीं भेजता.

    इसी चक्कर में यहाँ टिपिया रहे हैं कि शायद कोई हमको भी चिट्ठी विट्ठी भेजे.

  6. @अनुराग, उसके लिये यहाँ नही कही और टिपियाना पड़ेगा ;)

    @नीरज लायक होने का सवाल नही है, जब वक्त होता है तब एग्रीगेटर के द्वारा पढ़ना हो जाता है इसलिये ई-मेल का कोई मतलब नही होता।

    @काकेश, हमारा तो वैसे कोई भी मुजरिम नही, बस अपना वक्त बचाने की मुहिम है

    @समीरजी, जरूर रोयेंगे दो बूँद

    @अनुपजी, हाँ आपको सबके लिये फुरसत है निठल्लों के लिये नही ;)

  7. आपके यहाँ टिप्पणी करने के लिए ई-मेल देना अनिवार्य क्यों है? :)

  8. पीडि़तों में हमें भी शुमार किया जाए।

    एक तो पोस्‍टों के पैंफलेट देखें उस पर कभी कभी इन पैंफलेट बाजों को डांटती पोस्‍ट भी आ जाती है- खुद मेल बाक्‍स में। अब बताओं दोनों ओर से मारे गए।

  9. अरे भई, जिनकी ऐसी ईमेल आती है उनको सीधे ही ईमेल करो(यदि एक साथ कई लोगों को ईमेल भेजी गई है तो रिप्लाई टू आल करो ताकी सबके पास आपकी दरख्वास्त का प्रमाण रहे) और महानुभाव से बोलो कि आइन्दा से ऐसी ईमेल न करें। अधिकतर मामलों में बात बन जाती है, लोग शरीफ़ होते हैं। और जिन मामलों में ऐसे बात नहीं बनती तो स्पैम वाला बटन तो है ही, बस आराम से बैठो और उन ईमेलों को स्पैम में जाने दो। या अन्य उपाय यह कर सकते हो कि उन ईमेलों के लिए एक फिल्टर बनाओ, उनसे ईमेल आते ही डिलीट हो जाए! ;)

  10. तरूण,
    या तो आप काफी दिनों बाद नजर आये या मैं…
    आजकल तो मेरे जैसा नाचीज़ भी इस समस्या से परेशान है…तो आप लोगों का हाल क्या होगा समझा जा सकता है…।

  11. @संजय, टिप्पणी देना इसलिये अनिवार्य है कि ताकि सनद रहे, मोडरेशन की लाईन छोटी रहे और हमको आराम रहे ;)

    @मसीजिवी, दोनो और से मारे जाने का मतलब सैंडविच ;)

    @अमित, वो सब सब लोगां किये हमरे पास १-२ मेल और आ गयी, स्पैम, फिल्टर सब करने के बाद ही पोस्ट सार्वजनिक किये रहे ताकि बाकि सबको भी सनद रहे ;)

    @दिव्याभ, अपना तो पक्का है कि हम काफी दिनो बाद आये। आजकल हमारा आना जाना थोड़ा कम है अंतर्जाल पर।

  12. भईया हम भी दुखी हैं ऐसे दोस्तों से, अब क्या कहें कई बार इशारा कर दिए लेकिन मानते ही नहीं। एक-दो बार तो हद हो गै जब ऐसे-ऐसे लोग हमें लिंक भेजने लगे जिन्हें कि हम जानते तक नहीं। किसी दिन हमें भी पोस्ट लिख कर अपना दुखड़ा रोना पड़ेगा। :(

    वैसे खुशी की बात है कि जो कहने पर भी न माने, उसके लिए Spam वाला बटन है ही। ऑर्कुट से मेल कर तंग करने वाले एक बंदे के लिए हमने यही किया। :)

Leave a Reply

You can use these XHTML tags: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <blockquote cite=""> <code> <em> <strong>