जादू है ना जोर है कैसी माया है

१५० साल पहले भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई का बिगुल उत्तर प्रदेश में ही बजा था और ऐसा ही एक बिगुल आज फिर बजा जब मायावती की माया कब लोगों के सर चढ़ वोटों के रूप में बदल गयी किसी को पता ही नही चला। जाहिर सी बात है मायावती जो कि बहुजन समाजवादी पार्टी की मुखिया है उन्हें इस बार ब्राहमणों के भी दबा कर वोट मिले। इसकी शायद एक वजह ये भी हो कि चुनाव के पहले ही उन्होंके साफ साफ कह दिया था कि हम चुनाव से पहले भी अकेले हैं (लड़ेंगे) और उसके बाद भी अकेले रहेंगे (यानि कि किसी के साथ साझा सरकार नही बनायेंगे)।

सालों से साझा सरकारों को झेलते झलते कब उत्तर प्रदेश की ऐसी की तेसी हो गयी वो खुद शायद अभी तक प्रदेश की जनता को पता नही चला या शायद दिखाना नही चाहती कि उसे ये सब पता है। देश का सबसे बड़ा प्रदेश हर लिहाज से पिछड़ा हुआ है जहाँ दूसरे राज्यों में उधोग धंधे फलफूल रहे हैं वहीं इस प्रदेश में सिर्फ राजनीतिक पार्टियां या उससे जुड़े लोग फल फूल रहे हैं। जरा इन आंकड़ों पर एक नजर डालिये-(स्रोत)

जनसंख्याः १९७१ में प्रदेश की जनसंख्या ८.८ करोड़ थी जो १९९१ तक आते आते १३.९ करोड़ हो गयी।
अर्थव्यवस्थाः १९९३-९४ की गणना के अनुसार प्रदेश की पर-कैपिटा-इनकम सिर्फ ४७८७ रूपये है जो कि निम्नतम है इससे नीचे सिर्फ उड़ीसा (रू ४७२६) और बिहार (रू ३६२०) आते हैं। सबसे ज्यादा ताजुब्ब की बात है कि इसी प्रदेश की १९५०-५१ में पर-कैपिटा-इनकम रू २५९ देश की पर-कैपिटा-इनकम के लगभग बराबर थी यानि रू २६७ (सिर्फ ८ रूपये कम)

बिहार, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में गाँवों में गरीबी भी बढ़ी है, १९९३-९४ में ये जहाँ ५४% थी वो अब १९९९-२०० में ६१% हो गयी है। जहाँ पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रगति कर रहे हैं वही बिहार और उत्तर प्रदेश पतन की तरफ बढ़ रहे हैं। (स्रोत)

ऊपर दिये गये आंकड़ों से इतना तो पता चलता ही है कि सरकार किसी की भी रहे प्रदेश के और उसमें रहने वाली जनता के हाल नही सुधरने वाले। उत्तर प्रदेश की जनता के कुछ कुछ हाल रामायण की सूर्पनखा जैसे हाल दिखते हैं कभी समाजवादी (प्लस कांग्रेस) के पाले में कभी बहुजन समाजवादी (प्लस बीजेपी) के लेकिन बेचारी जनता क्या ये जानती है बाद में नाक सूर्पनकखा की ही कटती है।

खैर हम विषय से बहुत ही ज्यादा भटक गये हैं, हम बात कर रहे थे माया की। जहाँ बाकि सारी पार्टियां भारी भरकम सैलिब्रेटीज को ला लाकर अपना चुनावी अभियान कर रही थी वही बहुजन समाजवादी पार्टी का कहीं ना कोई जादू दिखायी दे रहा था ना जोर लेकिन चुनाव के बाद और फिर रिजल्ट के बाद कहानी ही कुछ और है। इसीलिये हमें कहना पढ़ रहा है - जादू है ना जोर है कैसी माया है। अब मायावती ऐसी ही माया अगर प्रदेश के विकास करने में दिखा दे और उल्टा प्रदेश को थोड़ा सुल्टा करके दिखा दे तो कुछ बात बने।

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Tarun
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3 Responses to “ जादू है ना जोर है कैसी माया है ”

  1. भाइ जी ये ज्यादा आशाये वाशाये मत बांधो,सापनाथ हो या नागनाथ,दोनो ने ही दूध पीना है दोनो ने ही डसना है मायावती कॊ भी लूट एक्सपर्ट समझो ज्यादा कुछ नही बदलना उत्तर प्रदेश मे हर प्रदेश को अपनए अपने अभिशाप इनही लोगो के रूप मे ढोने है

  2. अरुण जी ने सही कहा है, हो सकता है कि कुछ ही दिनों बाद ताज कारीडोर घोटाले में उन्हें कुर्सी से उतरना पडे. मकसद सबका लूटना ही है, कोई राम का नाम लेकर लूट गया कोई अम्बेडकर पार्क बनाकर लूट जायेगा, हम जैसे लोग ब्लॉग ही लिखते रह जायेंगे…

  3. क्या उम्मीद की जाये. आगे आगे देखिये, होता है क्या.

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