< Browse > Home / खालीपीली / Blog article: प्रेम कविता – एक बार फिर

| Mobile | RSS

प्रेम कविता – एक बार फिर

April 8th, 2007 | 4 Comments | Posted in खालीपीली

प्रेम कविता लिखने की, एक दिन हमने भी ठानी
लिखने से पहले मन बोला, कहाँ है दिल की रानी।

कहाँ है दिल की रानी, जो प्रेम रस को घोले
अपना भी दिल कभी, कुछ इलु इलु बोले।

आये कोई, हमें भी, जो थोड़ा दर्द दे जाय
कवि ना बन पाये ये दिल तो शायर बन जाय।

तभी अचानक सामने, आयी अति सुंदर बाला
चंदा सा मुखड़ा था, और थी हाथों में माला।

आकर बोली, अब तक तुम, छुपे कहाँ थे नाथ
चाहे कितनी प्रलय आये, रहे तुम्‍हारा साथ।

साथ हसीना का पाकर, हम भी लगे इतराने
यार दोस्‍त बढ़ने लगे, कुछ लोग लगे खिसयाने।

कुछ लोग लगे खिसयाने, तभी एक धक्‍का खाया
आखँ खुली, अपने को, खटिया से नीचे पाया।

टूटा सपना, सपने की तस्‍वीर चकनाचूर हुई
प्रेम कवि बनने की हमसे, ‘तरूण’ भारी भूल हुई।

ये प्रेम कविता सितम्बर 15, 2005 के दिन पहली बार पोस्ट की, आज पुनः प्रकाशित। नारद में कुछ परेशनी के चलते अगर आपने अभी तक बच्चों की समस्या को लेकर ये पोस्ट नही पढी तो यहाँ जाकर पढ़ लीजिये।

Leave a Reply 1,130 views |
Follow Discussion

4 Responses to “प्रेम कविता – एक बार फिर”

  1. समीर लाल Says:

    वाह वाह, फुरसतिया जी का आलेख पढ़कर पुराना कवि जागा है. बेहतरीन रचना..अब कविता ही किया करो. :)

  2. रीतेश गुप्ता Says:

    बहुत सुंदर प्रेम कविता है ….बधाई !!!

  3. श्रीश शर्मा 'ई-पंडित' Says:

    कितना सुंदर सपना था, सपने टूट क्यों जाते हैं। :(

Trackbacks

  1. निठल्ला चिन्तन »  

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

टिप्पणियों का शटर नयी पोस्ट पब्लिश करने के बाद कुछ दिनों ही खुला रहता है। पुरानी पोस्टस में आने वाले स्पॉम टिप्पणियों के मद्देनजर यह निर्णय लेना पड़ा, असुविधा के लिये खेद है। आप को अगर ये ब्लोग और इसमें लिखी पोस्ट पसंद आती हैं तो आप इसे सब्सक्राइब करके भी पढ़ सकते हैं, धन्यवाद।