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निशब्दः बच्चे कितने मन के सच्चे?

मैं निशब्द मूवी की बात नही कर रहा, आज ये खबर पढी (देखी) और पढ कर कुछ कहते जैसा नही बना। क्या दोष बच्चों का है (क्या मुझे बच्चे कहना चाहिये?) या अभिवावकों का और या अध्यापकों का और या स्कूल के वातावरण या सिस्टम का? जिस तरह से इस तरह की घटनायें अमेरिकी स्कूलों में बढ रही है उससे तो यही लगता है कि आने वाले वक्त में बच्चों की मासूमियत या तो शब्दकोष में मिलेगी या इतिहास के पन्नों पर।

कक्षा 5 में पढने वाले 13 और 12 साल के दो लडके और 11-11 साल की दो लडकियां और इन्होंने ये सब किया क्लास में कुछ बच्चों के सामने। क्या कहा मैंने बताया नही क्या किया? वो आप यहाँ पढ सकते हैं और ज्यादा जानकारी के लिये यहाँ भी देख सकते हैं।

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6 Responses to “निशब्दः बच्चे कितने मन के सच्चे?”

  1. SHUAIB Says:

    है तो शर्म की बात। अब इस पर क्या अच्छा बुरा लिखूं या लिखूं कि भाड मे जाएं आजके बच्चे? किसको ज़िम्मेदार टहराएं स्कूल वालों को, बच्चों के माता पिता को या सिस्टम को? मुझे तो शर्म आई ऐसी खबर पढकर, मगर आजके दौर मे तो आम सी बात हुई, उस उम्र मे हमें ऐसा सोचने को भी शर्म मेहसूस करते थे और अब के बच्चों ने करके भी दिखाया – और आज इसको तरक्की कहते हैं पता नहीं कौनसी राह पर जारहे हैं।

  2. समीर लाल Says:

    कल ही देखी यह न्यूज टी वी पर-अब क्या कहा जाये. विषय बहुत गंभीर है और गहरे चिंतन की माँग करता है.

  3. उन्मुक्त Says:

    तरुन जी मेरी पिछली टिप्पणी किसी दूसरी चिट्ठी के लिये थी इसके लिये नहीं कृपया उसे मिटा दें। यह गम्भीर विषय है।

  4. अनुराग मिश्र Says:

    मेरी एक मित्र जिसने बचपन में एसी ही जगह से पढ़ाई की है, उसने बताया कि वहाँ कुछ लड़के इस कक्षा तक (उम्र इस कक्षा के हिसाब से ज्यादा ही होती है) हद से ज्यादा बदमाश हो जाते हैं। स्कूल बस के अंदर हस्त मैथुन तक कर डालते हैं और साथ वालों का जीना मुश्किल हो जाता है। एसी जगहों की सामाजिक आर्थिक स्थिति भी अन्य जगहों से अलहदा होती है।

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बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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