26 Apr
Posted as मस्ती-मजा, व्यंग्य, मेरी नजर मेरे विचार
Tags: व्यंग्य, abhishek, aishwarya, मस्ती मजा, मस्ती मजा, व्यंग्य, मेरी नजर मेरे विचार, India, media, prince, star news, zee newsबहुत पहले ये गीत सुना था तब समझ नही पाये थे कि ये ईर बीर फत्ते हैं कौन? लेकिन लगता है अब समझ आ रहा है कि अरे ये तो अपने मीडिया वाले हैं।
पहले थोड़ा इस गाने के बारे में बता दूँ, अमिताभ बच्चन का गाया हुआ ये शायद उनका पहला नान-फिल्मी एलबम गीत हो। ये गीत कुछ इस तरह से था -
एक रहन ईर,
एक रहन बीर,
एक रहन फत्ते
और एक रहन हम।ईर कहे चलो लकड़ी काट आयें,
बीर कहे चलो लकड़ी काट आये,
फत्ते कहे चलो लकड़ी काट आये,
हम कहें चलो हमऊ लकड़ी काट आयें।ईर काटा तीन लकड़ी,
बीर काटा तीन लकड़ी,
फत्ते काटा तीन लकड़ी
और हम काटा…
तब छुटपन में ये गीत और इसका विडियो अच्छा लगा था बगैर समझे कि चल क्या रहा है लेकिन आज समझ आ रहा है कि ये ईर, बीर और फत्ते वास्तव में आजकल के अलग-अलग मीडिया चैनल का प्रतिनिधित्व करते हैं। ईर यानि कि पहला (न्यूज या) मीडिया चैनल सनसनी खबर ढूँढने या बनाने निकलता है तो बीर यानि कि दूसरा (न्यूज या) मीडिया चैनल भी सनसनी खबर ढूँढने या बनाने निकल पड़ता है, इनकी देखा देखी फत्ते यानि कि बाकि (न्यूज या) मीडिया चैनल भी सनसनी खबर ढूँढने या बनाने निकल पड़ते हैं।
अभी कुछ दिनों पहले ऐसे ही एक मीडिया चैनल (स्टार) ने सनसनी परोसने के लिये तिल का ताड़ बनाने की कोशिश करी और नतीजा? उनके दफ्तर की तोड़फोड़ यानि कि खबर कहानी बनाकर परोस रहे थे और उसका अंजाम भी उन्हें एक नयी खबर बनाकर दे गया। यानि कि तोड़फोड़ को भी उछाल उछाल के दिखाया। ऐसी शादियाँ भारत में पहले भी बहुत हुईं हैं, आगे भी होंगी। इस बात में ऐसा कुछ नही था कि उसे इस तरह की फुटेज दी जाती। अब तक ताजा खबर ये थी कि वो लड़की अब पलट गयी है और लड़के पर सम्मोहित करने का आरोप लगाया है। ये हर गली मोहल्ले के किस्से हैं किस किस को दिखायेंगे।
इससे पहले भी एक दूसरे मीडिया चैनल (जी न्यूज, शायद औरों ने भी दिखाया होगा) ने किसी कालेज के प्रोफेसर और उसकी किसी शिष्या के बीच के संबंध को ऐसे ही उछाला था। हद तो तब हो गयी जब खबर के बीच में उन्हें सुनील दत्त और नूतन अभिनीत ‘सावन का महीना पवन करे शोर’ वाले गीत पर अभिनय करते हुए दिखाया गया। यानि की शिष्या मोहतरमा गा रही थीं ‘सावन का महीना, पवन करे सोर’ और प्रोफेसर महोदय गलती सुधार रहे थे ये कह के ‘सोर’ नही ‘शोर’, वो भी फिल्म की तरह नाव पर बैठकर।
इस से पहले कभी एक बच्चा यानि कि प्रिंस किसी गड्डे में गिर गया था तो पूरा मीडिया घंटों तक वहाँ जमा उसी खबर को घंटों तक दिखाता रहा हर किसी को डर था कि अगर हम पहले गड्डा छोड़ के गये तो कहीं टी आर पी में पीछे ना रह जायें यानि कि वही ईर बीर फत्ते वाला मुकाबला। अगर ऐसा ही धरना इस बात पर लगाते कि सारे गड्डे बंद करो तो शायद उसके बाद गड्डों में गिरने वाले बच्चे गिरने से बच जाते।
सबसे बड़ा तमाशा तो मीडिया ने दिखाया हाल में भारत में हुई दो फिल्मी हस्तियों की शादी के लिये।
लगा कि इस से पहले तो भारत में कभी कोई शादी हुई नही, लगा कि पहली भारत में कोई शादी हो रही है। बिन बुलाय घर के बाहर ऐसे जमे रहे कि अगर कोई खबर है तो यही है, इसे लेकर नही गये तो चैनल बंद होने की नौबत ना आ जाये। फिलहाल तो मीडिया खुद इस तमाशे के ऊपर बहस कर रहा है कि आखिर गलती कहाँ हो गयी कि घंटों बाहर दर्जनों कैमरे लेकर खड़े रहे लेकिन उस हिसाब से कुछ खबर ही हासिल नही हुई यानि कि कुल जमा फुटेज नही के बराबर। महीनों से हम इस शादी से जुड़ीं खबरें देख सुनकर हलकान होते रहे और मीडिया फिर भी इन्हीं के चारों ओर बंसी बजाता रहा। 
अब मीडिया से जुड़े काफी लोग चिट्ठाकारी भी करने लगे हैं, यानि कि पहले ईर बोला चलो चिट्ठाकारी कर आयें, ये सुन बीर बोला चलो हम भी चिट्ठाकारी कर आयें और तब फत्ते बोला चलो हम भी क्यों ना चिट्ठाकारी कर आयें। (ये लो जी, यहाँ पर पहुँचते ही फिर से उसी शादी की खबर यानि कि अब मीडिया बैठ गया नुक्ताचिनी करने)। हमारे ये पत्रकार-ब्लोगर भाई लोग भी क्या करें जो पत्र या मीडिया के माध्यम से नही कह सकते वो अपने ब्लाग में कहकर हल्के हो लेते हैं, अपने चिट्ठे में तो ये भी सर्वेसर्वा है। आशा है आप लोग भी अब समझ गये होंगे ईर बीर फत्ते के पिछे छुपे सच को।
चित्र सौजन्यः BBC, IBNLive
10 Responses
समीर लाल
April 26th, 2007 at 9:02 am
1समझ गये, गुरु ,,,सारा मजरा ही क्लियर कर दिये, बहुत खुब!!!
सही मौज ली गई है……….बधाई!!
pratyaksha
April 26th, 2007 at 9:35 am
2सही है , सही ।
मज़े की बात कि हफ्ते दस दिन से मैं भी ईर बीर फत्ते याद कर रही थी ,सोचा था कुछ लिखूँगी । आपने लिखा और खूब मज़े की लिखा ।
ratna
April 26th, 2007 at 10:16 am
3बहुत सही लिखा है। तभी तो आजकल य़ह मज़ाक आम है कि अभिषेक और ऐश्वर्य की शादी से वर-वधू और उनके परिवार-वालों से ज्यादा मीडिया खुश है चलो काफी देर तक दर्शकों के सामने परोसने को कुछ तो मिला।
अभय तिवारी
April 26th, 2007 at 12:36 pm
4भई अच्छे तार बिठाए आपने..
अतुल शर्मा
April 26th, 2007 at 12:38 pm
5बचपन तो नहीं, लड़कपन या किशोरपन में सुना था। पागल थे इन ईर,बीर और फत्ते के पीछे। सबसे ज्यादा उस चौथे के दीवाने थे जो कहता है, ‘हम कहें चले हमऊ लकड़ी काट आयें’।
पर इनके पीछे जो गूढ़ रहस्य है आज आपने बता दिया कि आखिर ये ईर, बीर, फत्ते और ये हमऊ कौन हैं। वास्तव में होता भी यही है जो सबसे पहले दौड़ जाए वे ही ईर, बीर, फत्ते हैं। शुरु वाले तो तीन-तीन लकड़ी काट भी लेंगे, बाद वाले सिर्फ करैल…
राजीव
April 26th, 2007 at 3:35 pm
6ईर,बीर और फत्ते पहले कभी बचपन में तो नहीं सुना था, पर अब सुना, अच्छा ही हुआ जो अब उदाहरण के साथ सुना
वास्तव में क्या समानता दिखायी है ! बिल्कुल समझ में आ गया ईर,बीर और फत्ते!
neelima
April 26th, 2007 at 4:43 pm
7अच्छा व्यंग्य किए हो आप मौज ले ले के
PRAMENDRA PRATAP SIN
April 26th, 2007 at 6:30 pm
8वाह मजा आ गया।
Divyabh
April 26th, 2007 at 10:25 pm
9:) यह चिंतन भी पसंद आया…सच भी है और दुर्भाग्य भी देखते ही समझ में आ जाता है कि महत्वपूर्णता समाप्त हो गई है…बस आपकी यह आदा जो है निराली मन को बहुत भाती है…बधाई स्वीकारे!!!
अतुल अरोरा
April 27th, 2007 at 2:42 am
10Kya yeh gana mp3 mein mil sakta hai?
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The difference between 'involvement' and 'commitment' is like an eggs-and-ham breakfast: the chicken was 'involved' - the pig was 'committed' - unknownCategories
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