प्रेम कविता - एक बार फिर
प्रेम कविता लिखने की, एक दिन हमने भी ठानी
लिखने से पहले मन बोला, कहाँ है दिल की रानी।
कहाँ है दिल की रानी, जो प्रेम रस को घोले
अपना भी दिल कभी, कुछ इलु इलु बोले।
आये कोई, हमें भी, जो थोड़ा दर्द दे जाय
कवि ना बन पाये ये दिल तो शायर बन जाय।
तभी अचानक सामने, आयी अति सुंदर बाला
चंदा सा मुखड़ा था, और थी हाथों में माला।
आकर बोली, अब तक तुम, छुपे कहाँ थे नाथ
चाहे कितनी प्रलय आये, रहे तुम्हारा साथ।
साथ हसीना का पाकर, हम भी लगे इतराने
यार दोस्त बढ़ने लगे, कुछ लोग लगे खिसयाने।
कुछ लोग लगे खिसयाने, तभी एक धक्का खाया
आखँ खुली, अपने को, खटिया से नीचे पाया।
टूटा सपना, सपने की तस्वीर चकनाचूर हुई
प्रेम कवि बनने की हमसे, ‘तरूण’ भारी भूल हुई।
ये प्रेम कविता सितम्बर 15, 2005 के दिन पहली बार पोस्ट की, आज पुनः प्रकाशित। नारद में कुछ परेशनी के चलते अगर आपने अभी तक बच्चों की समस्या को लेकर ये पोस्ट नही पढी तो यहाँ जाकर पढ़ लीजिये।
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This post has 3 comments
April 8th, 2007
वाह वाह, फुरसतिया जी का आलेख पढ़कर पुराना कवि जागा है. बेहतरीन रचना..अब कविता ही किया करो.
April 8th, 2007
बहुत सुंदर प्रेम कविता है ….बधाई !!!
April 15th, 2007
कितना सुंदर सपना था, सपने टूट क्यों जाते हैं।
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