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	<title>Comments on: निशब्दः बच्चे कितने मन के सच्चे?</title>
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	<description>निठल्ला चिन्तन एक आक्रौश है विचारौं की आंधी का, एक द्वंद है सच और झूठ का, एक भावना है प्यार की, एक तमन्ना है आकाश छूने की, कुछ कहने की और कुछ अनकही छोड़ देने की॥</description>
	<pubDate>Sun, 07 Sep 2008 16:07:40 +0000</pubDate>
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		<title>By: अनुराग मिश्र</title>
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		<dc:creator>अनुराग मिश्र</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Apr 2007 03:48:08 +0000</pubDate>
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		<description>मेरी एक मित्र जिसने बचपन में एसी ही जगह से पढ़ाई की है, उसने बताया कि वहाँ कुछ लड़के इस कक्षा तक (उम्र इस कक्षा के हिसाब से ज्यादा ही होती है) हद से ज्यादा बदमाश हो जाते हैं। स्कूल बस के अंदर हस्त मैथुन तक कर डालते हैं और साथ वालों का जीना मुश्किल हो जाता है। एसी जगहों की सामाजिक आर्थिक स्थिति भी अन्य जगहों से अलहदा होती है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मेरी एक मित्र जिसने बचपन में एसी ही जगह से पढ़ाई की है, उसने बताया कि वहाँ कुछ लड़के इस कक्षा तक (उम्र इस कक्षा के हिसाब से ज्यादा ही होती है) हद से ज्यादा बदमाश हो जाते हैं। स्कूल बस के अंदर हस्त मैथुन तक कर डालते हैं और साथ वालों का जीना मुश्किल हो जाता है। एसी जगहों की सामाजिक आर्थिक स्थिति भी अन्य जगहों से अलहदा होती है।</p>
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		<title>By: निठल्ला चिन्तन &#187;</title>
		<link>http://www.readers-cafe.net/nc/2007/04/06/fifth-grade/#comment-2169</link>
		<dc:creator>निठल्ला चिन्तन &#187;</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Apr 2007 01:44:27 +0000</pubDate>
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		<description>[...] उन्मुक्त: तरुन जी मेरी पिछली टिप्पणी किसी दूसरी... [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] उन्मुक्त: तरुन जी मेरी पिछली टिप्पणी किसी दूसरी&#8230; [...]</p>
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		<title>By: निठल्ला चिन्तन &#187; प्रेम कविता - एक बार फिर</title>
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		<dc:creator>निठल्ला चिन्तन &#187; प्रेम कविता - एक बार फिर</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 08 Apr 2007 22:13:32 +0000</pubDate>
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		<description>[...] &#171; निशब्दः बच्चे कितने मन के सच्चे? [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] &laquo; निशब्दः बच्चे कितने मन के सच्चे? [...]</p>
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		<title>By: उन्मुक्त</title>
		<link>http://www.readers-cafe.net/nc/2007/04/06/fifth-grade/#comment-2121</link>
		<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 08 Apr 2007 02:47:45 +0000</pubDate>
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		<description>तरुन जी मेरी पिछली टिप्पणी किसी दूसरी चिट्ठी के लिये थी इसके लिये नहीं कृपया उसे मिटा दें। यह गम्भीर विषय है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>तरुन जी मेरी पिछली टिप्पणी किसी दूसरी चिट्ठी के लिये थी इसके लिये नहीं कृपया उसे मिटा दें। यह गम्भीर विषय है।</p>
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		<title>By: समीर लाल</title>
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		<dc:creator>समीर लाल</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 07 Apr 2007 20:30:41 +0000</pubDate>
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		<description>कल ही देखी यह न्यूज टी वी पर-अब क्या कहा जाये. विषय बहुत गंभीर है और गहरे चिंतन की माँग करता है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कल ही देखी यह न्यूज टी वी पर-अब क्या कहा जाये. विषय बहुत गंभीर है और गहरे चिंतन की माँग करता है.</p>
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		<title>By: SHUAIB</title>
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		<dc:creator>SHUAIB</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 07 Apr 2007 08:47:38 +0000</pubDate>
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		<description>है तो शर्म की बात। अब इस पर क्या अच्छा बुरा लिखूं या लिखूं कि भाड मे जाएं आजके बच्चे? किसको ज़िम्मेदार टहराएं स्कूल वालों को, बच्चों के माता पिता को या सिस्टम को? मुझे तो शर्म आई ऐसी खबर पढकर, मगर आजके दौर मे तो आम सी बात हुई, उस उम्र मे हमें ऐसा सोचने को भी शर्म मेहसूस करते थे और अब के बच्चों ने करके भी दिखाया - और आज इसको तरक्की कहते हैं पता नहीं कौनसी राह पर जारहे हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>है तो शर्म की बात। अब इस पर क्या अच्छा बुरा लिखूं या लिखूं कि भाड मे जाएं आजके बच्चे? किसको ज़िम्मेदार टहराएं स्कूल वालों को, बच्चों के माता पिता को या सिस्टम को? मुझे तो शर्म आई ऐसी खबर पढकर, मगर आजके दौर मे तो आम सी बात हुई, उस उम्र मे हमें ऐसा सोचने को भी शर्म मेहसूस करते थे और अब के बच्चों ने करके भी दिखाया - और आज इसको तरक्की कहते हैं पता नहीं कौनसी राह पर जारहे हैं।</p>
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