क्रिकेट 2007: जो हारा वही चुकन्दर
पाकिस्तान को मात देकर भारत बना वो चुकन्दर, भई जब जो जीता वही सिकन्दर कह सकते हैं तो जो हारा वही चुकन्दर क्यों नही। खैर चुकन्दर का गणित अभी बताता हूँ लेकिन उससे पहले एक बात, वो ये कि पाकिस्तान और पाकिस्तानियों को ये समझ लेना चाहिये कि भारत से बडा उनका कोई मित्र नही है। पाकिस्तानी बाहर हुए तो एक वफादार दोस्त की तरह भारत भी खुद मैच फेंक टूर्नामेंट से बाहर की राह हो लिया।
इस विश्व कप का जो होगा सो होगा लेकिन ऐसा लगता है ये खेल बहुत जल्द ही अपना “सभ्य आदमियों के खेल” का तमगा खोने वाला है।
वैसे हमने एक बात नोट की है और वो ये कि हर कोई यही कहता है कि भारत की टीम कागज में बहुत मजबूत नजर आती है यानि की सब मानते हैं ये टीम वाकई में कोई मजबूत टीम नही है। कागज की नाव कितनी ही मजबूत क्यों ना हो पानी में उतरते ही डूब जाती है वो ही भारतीय क्रिकेट टीम का हाल है।
आप ऐसे खिलाडियों का क्या कीजियेगा जिनके नाम तो हजारों रिकार्ड हों लेकिन सब मिलकर भी एक विश्व कप तक ना दिला सकें। बेहतर तो यही होगा कि मुनाफ को छोड पूरी टीम ही बदल दी जाये और नये लडकों को मौका दिया जाय, अगर भारत वाकई में क्रिकेट मुकाबलों में कुछ करना चाहता है तो उसे ये करना ही होगा, चयन की प्रक्रिया में आक्रामक होना ही होगा लेकिन राजनीति के चलते ऐसा संभव नही लगता।
भारत की हार में बाजर का भी बहुत बडा हाथ है जिन्होंने विज्ञापन के जरिये इन खिलाडियों को इतना पैसा दे दिया कि खिलाडियों को पैसा कमाने के लिये मेहनत की जरूरत ही नही रह जाती। वैसे तो ये बहुत मुश्किल सा लगता है लेकिन कल का मैच अगर इंग्लैंड को हरा केन्या जीत जाता है तो तीन बडी बडी मछलियां बाहर तडपती नजर आ सकती हैं।
अब आते चुकन्दरी गणित की तरफ, भारत को चुकन्दर का खिताब इसलिये जाता है क्योंकि वो अन्धों में काना राजा है यानि कि बाहर होने वाली टीमों में भारत का रन रेट सबसे ज्यादा है।
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बाहर होने वाली टीमो
हमारी तो टिप्पणी भी इनकी हालत देख शरमा कर कट गई…वाह रे यह चुकंदर!!
सच है। अब तो हारने की इतनी आदत हो गयी है कि जीतने की खबर से झटका लगता है!
बहुत खूब धन्य हैं हमारे कागजी शेर !
“आपने विषय/समस्या तो बहुत ही गम्भीर उठायी है, किन्तु इसके उपचार के लिये कोई ठोस उपाय बताने से बच निकले, और शायद इसी लिये ऐसी बातों को लिख दिया जो शायद अप्रासंगिक हैं।”
आपने बहुत सही विचारा है। समस्या के ‘जड़’ पर ही प्रहार करना कारगर होता है, केवल पत्ती तो.दने से कुछ नही होता।
मेरे पोस्ट मे लिखे अपनी टिप्पड़ी मे इस पोस्ट का लिंक देने के लिए धन्यवाद। बात और स्पष्ट हो जाती है।
हम उम्मीद करते है कि भारतिय टीम अगले २-३ वर्षो तक ऐसे ही हारते रहेगी और इस खेल का धीरे बोरीया बिस्तर बंद हो जाये।
खेल जगत के लिये बी सी सी आई का दिवालिया होने का दिन एक स्वर्णीम दिन होगा, मुझे उस दिन का इंतजार् है !
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