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आज ही अमित की ये वाली पोस्ट पढी और कुछ दिनों पहले स्वामी जी की ये वाली, और आज ही ब्रैक के दौरान आफिस में हमारे एक दोस्त ने पत्रकारों को लेकर ये बात बतायी तो सोचा लगे हाथ हम भी गंगा नहा लेते हैं।

एक पत्रकार (रिपोर्टर) महोदय थे बहुत ही खरा खरा लिखने और बोलने वाले, एक बार उनके अखबार (या न्यूज चैनल) की तरफ से उन्हें किसी विशेष कार्यक्रम को कवर करने भेजा गया। उस कार्यक्रम को कवर करने के लिये पहुँचे वो अकेले व्यक्ति थे। बदकिस्मती से किसी कारण की वजह से वो प्रोग्राम रद्द हो गया तो इन पत्रकार महोदय ने अपने आफिस को इसकी खबर देते हुए एक लाईन की न्यूज भेज दी कि अमुक अमुक वजह ये ये कार्यक्रम नही हो पाया। लेकिन बाकी के अखबारों और न्यूज चैनल में विस्तार के साथ उस आयोजन के सफल होने के बारे में बहुत कुछ लिखा और कहा गया। अगले दिन आफिस पहुँचते ही हमारे उन खरे खरे लिखने और कहने वाले पत्रकार महोदय को उनके बॉस ने अपने कैबिन में बुलाकर खूब लताड लगायी और उन पर ये इल्जाम लगाते हुए कि वो उस शहर में उस कार्यक्रम को कवर करने गये ही नही, जॉब से निकाल दिया।

अब हमारे पत्रकार अभी घर भी नही पहुँच पाये थे कि सब जगह ब्रैकिंग न्यूज थी कि अमुक पत्रकार ने अपनी नौकरी को लात मार खूद का न्यूज चैनल शुरू करने का बिगुल बजाया। बेचारे का दिन ही खराब था घर पहुँचते ही पत्नी अलग से पिल पडी, क्यों जी तुम खुद का न्यूज चैनल शुरू करने जा रहे हो और मैं कितने दिन से कह रही हूँ कि मेरे को दो-चार अच्छी से ड्रैस दिला दो तुम हर बार टाल जाते हो।

ऊपर वाला अंतिम पैराग्राफ हमने अपने मन से जोडा है, आखिर खुद का भी तो कोई टच होना चाहिये ना ;)

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