महिला दिवस का झुनझुना
महिला दिवस पर कुछ कहने से पहले एक सवाल क्योंकि मुझे ये नही पता इसलिये पूछ रहा हूँ, क्या कोई पुरूष दिवस भी मनाया जाता है। शायद नही क्योंकि महिला दिवस मुझे महिलाओं को दिया एक झुनझुना प्रतित होता है। मैने ज्यादा कुछ नही टटोला लेकिन ये महिला दिवस का हल्ला भारत में ज्यादा दिखायी दिया जाहिर सी बात है वहाँ पुरूष वर्ग महिलाओं को अभी भी अपने समान नही समझता शायद इसीलिये ये सब किया जाता है। कई बार ऐसा होता है कि आप कहना कुछ चाहते हैं लेकिन जब कहने बैठते हैं तो शब्द साथ नही देते, अभी तक जो लिखा उसे देख के लगता है आज मेरे साथ भी यही हो रहा है। इसलिये मैं तीन खबरें जो मैंने महिला दिवस से एक दिन पहले, महिला दिवस के दिन और उसके बाद देखी या पढीं बता देता हूँ (लिंक नही हैं क्योंकि पेपर में देखा था), शायद आप समझ जायें मैं कहना क्या चाहता हूँ। अगर तब भी नही समझे तो बस चुपचाप आगे बढ लीजिये।
महिला दिवस से एक दिन पहले की खबरः पंजाब में कहीं कोई डॉक्टर पकडा गया जो कि गर्भवती महिलाओं का अल्ट्रासाउंड करके अजन्में बच्चे के लिंग के बारे में बता था और लडकी होने पर कोई (शायद ज्यादातर) गर्भपात कराना चाहे तो वो भी सहर्ष करता था। भारत में बच्चे के लिंग का पता करना वैध नही है।
महिला दिवस के दिनः महिलाओं के लिये किसी महिला विधेयक पर चर्चा या पारित या कुछ कुछ इसी तरह की कोई खबर, महिला दिवस धूमधाम से मनाया गया टाईप की खबर। लेकिन अमेरिका में यहाँ महिला दिवस पर कुछ (खास) सुनने पढने को नही मिला। न्यूयार्क के एक लोकल चलताऊ अखबार में महिला दिवस पर भारत का ही (गांव की दो औरतों का सिर पर रख के पानी ले कर आता हुआ चित्र) एक चित्र छपा देखा।
महिला दिवस के अगले दिनः बिहार के किसी शहर (शायद दरभंगा) में कोई व्यक्ति अपनी साली के साथ भाग गया (शादी करने के लिये भागा होगा) तो सुसराल वालों ने उस व्यक्ति की पत्नी और बच्चे (शायद ४ साल के लगभग होगा) को घर से बाहर निकाल दिया। यानि कि जब पति ने नही पूछा तो हम क्यों रखें टाईप।
अगर हम ये समझते हैं कि महिला दिवस पर ही महिलाओं को सम्मान, इज्जत और बराबरी का दर्जा देना चाहिये तो क्यों नही हम भारत में साल भर महिला दिवस मनाना शुरू कर देते। मैं नही चाहता कि महिला दिवस मने, अगर आप भी ऐसा नही चाहते तो अपनी बेटियों को आत्मनिर्भर बनाईये उन्हें भी उसी नजर से देखिये जिस नजर से अपने बेटों को देखते हैं। उनको आत्मसम्मान करना सिखाईये और अपने बच्चों को बताईये कि लडका हो या लडकी दोनों को समाज में अपने अधिकारों के लिये समान हक है। आत्मनिर्भरता का मतलब यहाँ जॉब करने से नही है बल्कि इस बात से है कि वो अपने निर्णय खुद ले सकें और मुसीबत के समय बजाय कोई दरवाजा खटखटाने के खुद अपना ख्याल रख सके। यही बात बहिनों और अगर शादीशुदा हैं तो पत्नियों के लिये भी लागू होती है।
उपर दी गयी खबर पढके खुद ही निर्णय लीजिये, क्या सिर्फ कन्या जानकर भ्रूण हत्या उचित है या पति के किये गयी की सजा उसकी पत्नि को देना उचित। अगर इन बातों को अनुचित कहने में आपको लगता है कि आपकी मूँछ नीची हो जायेगी तो उस मूँछ को ही कटवा दीजिये क्योंकि पूरानी कहावत है “ना रहेगा बाँस ना बजेगी बाँसुरी” ;)।




विचार उत्तम हैं. और भी अनेकों ऐसी ही खबरें रोज नजरों के सामने आती है, बस आवश्यकता है सही दिशा में विचार करने की!!
अगर फिरंगियों ने ‘पीटॉ हिन्दुस्तानी डे’ ईजाद कर दिया तो वो भी ‘इंडिया’ में जोर शोर से मनाया जाने लगेगा.
सही कह रिये हो भाया, सब पाखंड है!
भारत में महिला भ्रूण हत्या की दर चिंताजनक के स्तरों को पार कर गई है. लग रहा है एकल पुरुषों का देश बनाने का प्लान है इस समाज का.
सब ढकोसला है महिलाओं को समानता दिलाने का एक ही तरीका है उनका सुशिक्षित होना, इसमें अभी समय लगेगा। बाकी कोई आरक्षण, कोई कानून उन्हें समानता नहीं दिला सकता।
देश में महिलाओं की दशा सच मे अभी भी विचारणीय है। श्रीष मास्साब की बात से सहमत हूं मै।