दिल की भडास निकालो आओ हिन्दू मुस्लिम खेलो

आज दिन में नारद चैक किया तो देखा कि “आईना मोहल्ले के साथ बंद होने की इजाजत मांगे” गोया कह रहा हो कि “हम तुम एक कमरे में बंद हों और चाभी खो जाय”। हमें जगदीश भाई कम से कम अपने से तो ज्यादा समझदार लगते थे इसलिये सोचा हो सकता है कि होली की भंग का नशा अभी तक उतरा नही होगा क्योंकि आंकडों के साथ बात करने वाला, एक लाईन में किसी बात का विरोध या अनुमोदन तो कर नही सकता। खैर हमने सोचा कि “इलाही ये माजरा क्या है” और इसका पता लगाने के लिये नारद (हिन्दी चिट्ठेवाले ;)) के दोनों पैरों को अपने दोनों हाथों से पकड उलटा लटका दिया और उइला ये क्या उनकी जेब से धडाधड पर्चियों पे पर्चियां जैसे किसी ने परीक्षा में नकल के इरादे से जमा कर रखी हो। एक पर्ची उठा के देखा तो पाया कि उसमें मुस्लिमों की शान में कसीदे लिख रखे हैं, दूसरी उठायी तो देखा हिन्दुओं की महिमा का गुणगान लिखा है। तीसरी उठाने की इच्छा ही नही हुई क्योंकि हमें लगा हो सकता है उसमें ईसाईयों की महत्ता बताई हो। अच्छा हुआ कि हम इस परीक्षा में नही बैठे क्योंकि हम तो पढके आये थे “तू हिन्दू बनेगा, ना मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा” इसलिये बैठते तो पक्का फेल होते।

पिछले कुछ वक्त से नोट किया है कि हिन्दी चिट्ठाजगत में तथाकथित पत्रकार बंधुओं की बिरादरी बडती जा रही है, तथाकथित इसलिये कहा क्योंकि वो कहते हैं, हमें नही पता कहाँ, किस पेपर में हैं। खैर इस बात से फर्क नही पडता कहाँ है। लेकिन एक बात अभी तक नही समझे कि जो कुछ वो बंधु लोग अपने चिट्ठों में लिखते हैं वो अपने न्यूज पेपर में क्यों नही लिखते क्योंकि अखबार की पहुँच अभी भी इंटरनेट में फैले चिट्ठों से कहीं अधिक है, इसलिये ज्यादा लोगों तक वो बात पंहुचेगी। ताजुब्ब होता है कि ऐसे पत्रकारों के होते हुए भी काहे को हमें आधी से ज्यादा खबरों या लेखों में अमिताभ, शाहरूख, शिल्पा, अमर सिंह, लालू जैसों को ही पडने को मिलता है। निठारी में १४ कंकाल मिले तो सारे पत्रकार पिल पडे वो सब बताने को, वो सब दिखाने को, कहाँ थे ये लोग ये सब लिखने को जब बार बार बच्चों के गायब होने की शिकायत करने पर भी पुलिस वाले उनकी शिकायत लिखने को तैयार नही थे। अब एक ही बात लगती है कि इन लोगों के आका सिर्फ उसी में विश्वास करते हैं जिनसे पेपर या पत्रिका बिके, जिनसे इनके विचारों को इन्हीं के अखबारों या पत्रिकाओं में जगह नही मिल पाती। फिर उसी बैचेन मन की बैचेनी को ये यहाँ चिट्ठों के रूप में निकाल देते हैं।

विज्ञान का नियम है कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, आर एस एस और मुस्लिम लीग इसी क्रिया प्रतिक्रिया का नतीजा है, अब इनमें से कौन क्रिया है कौन प्रतिक्रिया इससे कोई फर्क नही पडता। जब तक नेता लोग हिन्दू और मुस्लिम को वोट की राजनीति के नाम पर अलग अलग नजेरिये से देखते हुए बांटते रहेंगे मुझे नही लगता कि चिट्ठों मे किसी के भी पक्ष में लिखने से कोई फर्क पढने वाला है।

गोधरा के बारे में, उसके विरोध में जितना पढने को मिलता है उतना ही अगर कोई काश्मीर के बारे मे भी लिखता तो कितना अच्छा होता जहाँ हर रोज लोग मरते हैं। क्यों नही कोई आवाज उठाता कि काश्मीर में भी वैसे ही कोई भी जमीन खरीद सके जैसे कि देश के अन्य राज्यों में। जिस देश में रहने वालों के लिये धर्म उस देश से बढा हो जाय उस देश में प्रगति भले ही हो जाये शांति कभी नही रह सकती। धर्म के बारे में सोचने से किसी को फुरसत मिले तो शायद देश की सडकों की दुर्दशा के बारे में, शहरों में ईद का चांद होती जा रही बिजली के बारे में, पीने के पानी के बारे में, बेरोजगारी के बारे में, रहने की समस्या के बारे में यानि कि बुनियादी आवश्यकताओं के बारे में सोचने का, लिखने का नंबर आये।

पता नही ईराक में कौन किस को मार रहा है, ना मालुम अफगानिस्तान में किन के बीच रस्सा कस्सी चल रही है, अब तो शायद यू एन ने भी दार्फूर, सूडान में भूख से मरने वालों की गिनती करनी छोड दी होगी। क्या सिर्फ भारत ही एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है? क्या अमेरिका में सब धर्मों के लोग नही रहते? फिर क्यों नही यहाँ कोई धर्मों के बारे में लेख या पोस्ट नही लिखता, क्यों नही यहाँ एक दूसरे के धर्मों का इतना विरोध नही होता जितना कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष देश भारत में। क्यों नही यहाँ कोई धर्म के नाम पर वोट मांगता है जैसे तथाकथित धर्मनिरपेक्ष देश भारत में, क्यों नही यहाँ किसी राजनीतिक पार्टी को किसी धर्म विशेष से जोडके नही देखते। मुझे नही पता मैं जानना भी नही चाहता क्योंकि मैं जानता हूँ उसके बाद भी यहाँ अमेरिका में कुछ नही बदलने वाला क्योंकि यहाँ नियम और कानून किसी भी धर्म से बढकर हैं, क्योंकि यहाँ हर धर्म के लोगों के लिये अलग नियम नही है, क्योंकि यहाँ लोग जागरूक हो चुके हैं और उन्हें पता है कि धार्मिक कट्टरता के क्या नुकसान है, उन्हें पता है इससे किसी का कोई फायदा नही होने वाला। वहीं भारत में शायद अब धीरे धीरे लोगों की समझ में आ रहा है कौन अपना है कौन पराया, कौन सही है कौन गलत। लेकिन अभी भी वहाँ लोगों को इतनी समझ नही कि डेमोक्रेसी का मतलब सडक पर चलते हुए कहीं भी थूकना नही होता।

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Tarun

25 Responses to “ दिल की भडास निकालो आओ हिन्दू मुस्लिम खेलो ”

  1. मुझे उम्मीद है कि एक दिन सभी की सोच आपके जैसी होगी।

  2. एकदम सही बात कही तरुण ने। ना इधर ना उधर, एकदम बैलेन्स

    डेमोक्रेसी का मतलब सडक पर चलते हुए कहीं भी थूकना नही होता।

    बहुत अच्छी बात कही तरुण।

    पुराने जख्मों को कुरेदने से दर्द का ही एहसास होगा, सुखद अनुभूति तो नही ही होगी।

    उम्मीद है सभी ब्लॉगर सब कुछ समझते है, ऐसे भी कई और मुद्दे है, मंहगाई, बेरोजगारी, अशिक्षा, उन पर बहस करो ना। सिर्फ़ धार्मिक कट्टरता ही मिली थी। ये अभी प्राथमिकता मे नही है, जो प्राथमिकता है उस पर करो, नही तो शायद सारा ब्लॉग इसी की क्रिया प्रतिक्रिया से भर जाएगा, और हमेशा भर के लिए लेबल लग जाएगा।

    बाकी निर्णय लेना ब्लॉगर को है वे स्वतन्त्र है, लेकिन पाठकों को भी स्वतंत्रता है वे चाहे तो पढे और चाहे ना पढे।

  3. आज पता नहीं क्यों पहली बार अमरीका से भारत की तुलना बुरी नही लगी। बेहद सधा हुआ लेख।

  4. क्योंकि यहाँ लोग जागरूक हो चुके हैं और उन्हें पता है कि धार्मिक कट्टरता के क्या नुकसान है, उन्हें पता है इससे किसी का कोई फायदा नही होने वाला।

    ठीक कहते हैं आप। लोग भी यहाँ कुछ-कुछ समझते हैं। तथाकथित बुद्धिजीवी भी खूब जानते हैं, पर क्या करें बेचारे, अपने हित कहाँ से साधेँ सो आम-जनता में कभी इतना इल्म आने ही नहीँ देते कि जन सामान्य नीर-क्षीर विवेक कर पाये और ज्ञानी-जन पुन: अपने वाद-विवादों में व्यस्त हो कर अपने बुद्धिजीवी होने का आनन्द प्राप्त करते हैं।

  5. काश सभी ऐसा “निठल्ला चिंतन” कर पाते.

  6. आप ने ठीक लिखा ।सड़्क पर कही भी थूक्ना डेमोक्रेसी नही है ।पर आज यही सब कुछ हो रहा है ।काश ! सभी आपकी तरहा सोच पाते ।

  7. “आईना मोहल्ले के साथ बंद होने की इजाजत मांगे गोया कह रहा हो हम तुम एक कमरे में बंद हों और चाभी खो जाये।” इसे सबेरे पढ़ा था। अब भी इसे पढ़ते हुये मुस्कराहट आ रही है। मजा आ गया। बकिया बातें सब चौकस कहीं हैं। शाबास टाइप!

  8. “यहाँ अमेरिका में कुछ नही बदलने वाला क्योंकि यहाँ नियम और कानून किसी भी धर्म से बढकर हैं, क्योंकि यहाँ हर धर्म के लोगों के लिये अलग नियम नही है, क्योंकि यहाँ लोग जागरूक हो चुके है”

    अच्छा लगा। सबको सन्मति निठ्ल्ला चिंतन दे भगवान

  9. आपने बड़ी भोली बात की है मित्र..आप जिस भी संस्थान में काम करते हैं क्या उसकी नीतियां आप तय करते हैं..? लगता है आप बाज़ार और उसके निष्ठुर चरित्र के विषय में कुछ नहीं जानते..बाज़ार में व्यक्ति की कोई स्वायत्तता नहीं होती, वह सिर्फ़ एक मज़दूर होता है..पत्रकार ये क़तई तय नहीं करता कि वह किन मसलों को प्रकाशित करना चाहेगा..ये सारे फ़ैसले प्रबंधन और मार्केटिंग टीम लेती है..
    दूसरी भोली बात आपने अमेरिका के बारे मे की है..अमेरिका मे धार्मिक अन्तर्विरोध नहीं हैं..मगर ब्लैक्स और हिस्पैनिक्स समाज की उस देश में जो दशा है..उसे आप किन लोक्तान्त्रिक मापदण्डों से तौलेंगे..? क्या आप कैटरीना को भूल गये.. उस से जन्मे विनाश के प्रति वाशिंगटन हफ़्ते भर तक उदासीन बना रहा.. सिर्फ़ इसलिये कि कि न्यू ऑरलीन्स की बहुतायत आबादी ब्लैक है.. अगर दुनिया में कोई सच्चा धर्म निरपेक्ष देश है तो वह भारत है..अमेरिका को भारत के तुलना में आने के लिये सैकड़ों साल भी कम पड़ेंगे..
    रही बात हिन्दू मुसलमान के आपसी सम्बंधो और उसकी चर्चा से होने वाली खटास की..इस देश में हिन्दू और मुसलमानों के बीच संघर्ष और एकता का हज़ार साल का इतिहास है.. इस सम्बंध के कष्ट देने वाले पहलुओं की ओर से आँखे मूंद लेने से उनका अस्तित्त्व समाप्त नहीं हो जायेगा.. बात करने और एक दूसरे के बारे में एक समझ पैदा करने से ही माहौल बेहतर हो सकता है.. सहअस्तित्त्व की अवधारणा भारत के लिये कोई अजूबा नहीं है..हज़ारों सालों से इस धरती पर तरह तरह की जाति और आस्थाओं वाले लोग एक ही समाज का हिसा बन के रहते आयें हैं.. और वही हमारा रास्ता है.. आँख के बदले आँख की नीति से सम्पूर्ण संसार अंधा हो जायेगा..

  10. अभयजी की भारत के लिए कही बाते सही है, क्योंकि यहाँ बहूसंख्यक हिन्दू है.

  11. महाराज, सूझ नहीं रहा आपके निठल्‍ले चिंतन का क्‍या जवाब दें. मुंह पर पट्टी चढ गई है जैसे..

  12. बढ़िया लगा पढ़ना ऐसा निठल्ला चिंतन. बहुत बहाव से लिखा है, बधाई.
    ऐसे ही जागरुकता लाई जा सकती है.

  13. सही कहा तरुन जी, और यहां दिल्ली में बैठ कर भी बहुत हद तक धर्म के नाम पर राजनीतीबाजों की चालें समझ में आ जाती हैं।
    मेरे जैसे नास्तिकों को इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता और न ही धर्म मुझे भावुक कर पाता है।
    हर चीज हमेशा ढोल पीट पीट कर नहीं बोली जाती इसी लिये कभी कभी एक लाईन की बात की जाती है, वैसे बात चली है तो बता दूं कि जब भारत सरकार ने ब्लागस्पॉट पर बैन लगाया था तो इसी मोहल्ले के साथी जगदीश भाटिया का घर खोजते खोजते आये थे ब्लागरों की आवाज को अपने चैनल के माध्यम से सरकार तक पहुंचाने के लिये। तो अब जब इनकी आवाज को दबाया जायेगा तो आईना मोहाल्ले के साथ बंद होने की इजाजत मांगेगा ही। :)
    और भी बहुत कुछ है पर कोई समझने को तैयार हो तो समझाया जाये।

  14. :)

  15. आपका निठल्‍ला चिंतन मुझे पसंद आया। हमारे समाज में जाति, धर्म, विकास और राजनीति के अलावा कोई और मुद्दा बहस के लिए हो, तो बताएं। हम सब मिल कर निठल्‍ला चिंतन करेंगे।

  16. आपने बड़ी भोली बात की है मित्र
    क्या करें अभय जी हम हैं ही इतने भोले ;)

    आप जिस भी संस्थान में काम करते हैं क्या उसकी नीतियां आप तय करते हैं..?
    हमने ऐसा ना अपने लिये कहा ना आपके लिये, हमने कहा था कि “इन लोगों के आका सिर्फ उसी में विश्वास करते हैं जिनसे पेपर या पत्रिका बिके”। हर संस्थान की नीतियां उनके आका ही बनाते हैं और उनका हक भी है, किसी किसी संस्थान में कोई गलत नीति बहस के बाद बदली भी जाती है। कई बार एक समान नीति के लिये दो संस्थानों की तुलना नही की जा सकती।

    पत्रकार ये क़तई तय नहीं करता कि वह किन मसलों को प्रकाशित करना चाहेगा..ये सारे फ़ैसले प्रबंधन और मार्केटिंग टीम लेती है.
    अजी ये हमें अच्छी तरह से मालूम है, अगर पत्रकार जो उन मसलों को तय करता तो फिर काहे ब्लोगजगत में अपनी बात कहने के लिये आता :)

    अमेरिका मे धार्मिक अन्तर्विरोध नहीं हैं..मगर ब्लैक्स और हिस्पैनिक्स समाज की उस देश में जो दशा है
    पहली बात मैं कोई अमेरिकी समर्थक नही हूँ, हर समाज की अपनी अच्छाई होती है और अपनी बुराई। यहाँ ब्लैक्स और हिस्पैनिक्स समाज की जो दशा (है) थी अपने यहाँ दलित और पिछडे वर्ग की क्या उससे बढिया दशा है। खैर ये अलग ही बहस है।

    क्या आप कैटरीना को भूल गये.. उस से जन्मे विनाश के प्रति वाशिंगटन हफ़्ते भर तक उदासीन बना रहा.. सिर्फ़ इसलिये कि कि न्यू ऑरलीन्स की बहुतायत आबादी ब्लैक है
    मै कैटरीना को नही भूला, यहाँ खुद अमेरिकियों को भी पता है कौन सही था कौन गलत, मैने इसकी बहस को पूरे आंकडों और तस्वीरों के साथ देखा है, अगर सरकार की गलती थी तो बहुत सारे लोग अपनी गलतियों की वजह से भी मरे थे, जो न्यू ओरलीन छोडने को तैयार नही हुए। उस विनाश के लिये न्यू ओरलीन की स्थित भी कुछ हद तक उत्तरदायी थी। मैंने खुद कैटरीना जैसे और उससे थोडा कम कैटेगेरी के तूफान अपनी आंखों से देखे हैं और अमेरिकी सरकार के इंतजाम भी। मुझे अगर ऐसे उदाहरण ही देने होते तो भारत के भी बहुत मिल जाते (जायेंगे)। लेकिन मैं यहाँ किसी के सही गलत का फैसला करने को कुछ नही लिख रहा।

    अमेरिका को भारत के तुलना में आने के लिये सैकड़ों साल भी कम पड़ेंगे.
    ये बात दोनों देशों के संदर्भ में कही जा सकती है लेकिन हो सकता है अलग अलग विषयों के लिये

    इस सम्बंध के कष्ट देने वाले पहलुओं की ओर से आँखे मूंद लेने से उनका अस्तित्त्व समाप्त नहीं हो जायेगा..
    तभी शायद किसी ने परजानिया थियेटर में दिखायी जाने देने के लिये हैल्प नही करी, तभी शायद ब्लैक फ्रायडे के निर्माता को फिल्म रिलीज कराने के लिये अकेले ही (साथ में दो बंधु और थे) संघर्ष करना पडा, तभी शायद प्राचीन भारत में विधवाओं की दशा पर बनी वॉटर अभी तक सिनेमाघरों में नही लगी। धर्मनिरपेक्ष का मतलब होता है बगैर किसी का पक्ष लिये लेकिन यहाँ कोई हिन्दूओं के पक्ष में बात करता है कोई मु्स्लिमों के। कट्टर दोनों ही धर्मों में हैं विरोध करना ही तो कट्टरता का करो, दूध का धूला यहाँ कोई नही है। :)

    आँख के बदले आँख की नीति से सम्पूर्ण संसार अंधा हो जायेगा..
    सही बात कही आपने लेकिन ये बात सबस पहले आंख निकाले वालो को भी सोचनी होगी और यही मैं समझाना चाहता था, आप पूरे नंबर लेकर पास हुए :)

  17. हर चीज हमेशा ढोल पीट पीट कर नहीं बोली जाती इसी लिये कभी कभी एक लाईन की बात की जाती है
    जगदीश जी, अगर आप संदर्भ दे देते तो हमें जल्दी पता चल जाता कि उस ढोल का पोल कहाँ गडा है ;) ना ही मोहल्ले से और ना ही उसका विरोध करने वालों से हमारी कोई दुश्मनी नही है, लेकिन जैसे कि होता है हर एक क्रिया की समान या उससे अधिक रूप से प्रतिक्रिया होती है और वही इन सारी बहसों का कारण है। अब देख लीजिये आपकी एक लाईन की पोस्ट की कितनी बडी प्रतिक्रिया हुई ;)

  18. हमारे समाज में जाति, धर्म, विकास और राजनीति के अलावा कोई और मुद्दा बहस के लिए हो, तो बताए
    हम तो समझे थे कि अब काफी सारे पत्रकार बंधु आ गये हैं कुछ नया नया उछालेंगे, लेकिन आप तो हमी (जनता) से पूछ रहे हैं ;) लगता है कंट्रोवर्शियल टॉपिक के अलावा नारद में सब कुछ नजर अंदाज कर देते हैं। फिलहाल आप किसी और बात पर बहस करना ही चाहते हैं तो इस पर अपने विचार रखिये, चाहें तो अब तक अन्य विषयों पर चली बहस को यहाँ देख सकते हैं।
    वैसे आप चाहें तो ऐसा ही किसी विषय में खोज करके लिख सकते हैं जैसा आपकी ही तरह एक बंधु यानि सृजन शिल्पी जी कर रहे हैं। बाकि मुद्दों का क्या है “जिन खोजा तिन पाया”, सही लिखा है ना ये :)

    आप सभी बंधुओं का लिखा पसंद करने और अपनी अपनी बात शालीन तरीके से कहने का शुक्रिया :)

  19. तरुण भाई,
    एक सधी लेख को उम्दा तरीके से व्यंग का पहनावा देकर लिखा है वह काबिले-तारिफ है… हमें “धर्म नही धार्मिकता” की आवश्यकता है। यही मर्म है लेकिन क्या करे भारत अभी विकास कर रहा है और साथ-साथ पीढ़ियों से लड़ता कई सम्स्याओं को एक साथ झेलता…और अलग-अलग रागों को भी सुनता मानववाद-पुँजीवाद-साम्यवाद-समाजवाद-जातिवाद-नारीसम्मान आदि। अभी बहुत समय लगेगा लेकिन उठेगें हम…और सबसे बड़ा उदाहरण था “गुजरात दंगा” जिसका भारत के किसी भी क्षेत्र में प्रत्यक्ष असर नहीं हुआ था… हम जरुर Grow कर रहे हैं…जरा तमाशा धैर्य से देखना होगा!!

  20. तरुण! आपसे सहमति है .

  21. [...] बहरहाल , इस मामले में मुझे निठल्ले तरुण की पोस्ट बहुत मजेदार लगी। इसमें तरुण ने जगदीश भाटिया की अपना आईना नारद से हटाने की बात पर मौज लेते हुये लिखा- आईना मोहल्ले के साथ बंद होने की इजाजत मांगे गोया वह कहना चाह रहा हो हम तुम एक कमरे में बंद हो और चाभी खो जाये। [...]

  22. Bahut acche vichaar hain aapke. Kaash sab aap jaisa soch sakte.

  23. ये हुयी ना बात ! तरुण भाई बहुत दिनो बाद अपने पूरे रंग मे दिखे !

    डेमोक्रेसी का मतलब सडक पर चलते हुए कहीं भी थूकना नही होता।

    पता नही कब लोगो को यह समझ मे आयेगा !

  24. [...] इस बार के अनुगूँज की प्रविष्टियां देख कर हमें यही कहना पड़ेगा कि बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले। कुल जमा तीन प्रविष्टियां, वो तो भला हो आशीष और जीतू का जिन्होंने क्रिकेट की अंतिम जोडी की तरह कुछ तो खाता आगे बढाया वरना अपने कागज के शेर (धूरंधर पूराने शातिर हिन्दी चिट्ठाकार) भारतीय क्रिकेट टीम के शेरों की ही कहानी एक बार फिर दोहरा गये। इनकी तुलना आप भारतीय क्रिकेट टीम के शेरों से अक्षरशः कर सकते हैं, उनके भी पर्सनल रिकार्ड धांसू और इनके भी पर्सनल रिकार्ड धांसू, वो भी बडे (ग्रुप) आयोजन में टांय टांय फुस्स और ये भी ऐसे आयोजन से नदारद। मध्यम क्रम के चिट्ठाकार एक दूसरे की पीठ खुजाने में व्यस्त थे तो यहाँ खाता कहाँ से खोलते। हमने गलती करी की अपनी आधी से ज्यादा बात उदघोषणा के वक्त कह दी और थोडी अवलोकन के लिये बचा के रख दी। हमें अगर पता होता कि कोई मैदान में ही नही उतरेगा तो बजाय घोषणा में कहने के अलग से चेप देते। मोहल्ले की टीम के कप्तान ने भी हमारी किसी पोस्ट में टिप्पणी करके पूछा था घरेलू श्रृखंला (धर्म की बहस) के अलावा भी कोई टूर्नामेंट होता है तो हमें बताओ हम भी खेलेंगे, हमने भी तुरंत मौका लपकने की गरज से इस आस्कर वाले आयोजन का पता बता दिया लेकिन वो अपनी कथनी को करनी में बदल नही पाये और घरेलू श्रखंला में ही व्यस्त हो कर रह गये। यानि कि कुल मिलाकर इस आयोजन का भी कुछ कुछ वैसा ही हाल हो गया जैसा कि इस बार के क्रिकेट महाकुंभ का। चलिये अब अनुगूँज नामक इस आयोजन को अपना आखिर सलाम कहने से पहले अब तक की कहासुनी (या बतकही) का कुछ अवलोकन कर दें। [...]

  25. Main to ye sochta manushya ke alawa jitna jeev jagat hai unhain mandir masjid ki jaroorat kyon nahin parti.kya unki mushkilain manushyon se alag hain? Woh agar bina dharm ke chupchap apna jeevan gujar sakte hain to hum kyon nahin?

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