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	<title>Comments on: दिल की भडास निकालो आओ हिन्दू मुस्लिम खेलो</title>
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	<description>निठल्ला चिन्तन एक आक्रौश है विचारौं की आंधी का, एक द्वंद है सच और झूठ का, एक भावना है प्यार की, एक तमन्ना है आकाश छूने की, कुछ कहने की और कुछ अनकही छोड़ देने की॥</description>
	<pubDate>Fri, 08 Aug 2008 18:43:41 +0000</pubDate>
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		<title>By: Ranjeet singh</title>
		<link>http://www.readers-cafe.net/nc/2007/03/06/kya-tera-kya-mera/#comment-3909</link>
		<dc:creator>Ranjeet singh</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 18 Jul 2007 14:49:04 +0000</pubDate>
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		<description>Main to ye sochta manushya ke alawa jitna jeev jagat hai unhain mandir masjid ki jaroorat kyon nahin parti.kya unki mushkilain manushyon se alag hain? Woh agar bina dharm ke chupchap apna jeevan gujar sakte hain to hum kyon nahin?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Main to ye sochta manushya ke alawa jitna jeev jagat hai unhain mandir masjid ki jaroorat kyon nahin parti.kya unki mushkilain manushyon se alag hain? Woh agar bina dharm ke chupchap apna jeevan gujar sakte hain to hum kyon nahin?</p>
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		<title>By: अक्षरग्राम &#187; अवलोकन अनुगूँज 23: आस्कॅर, हिन्दी और बॉलीवुड</title>
		<link>http://www.readers-cafe.net/nc/2007/03/06/kya-tera-kya-mera/#comment-2138</link>
		<dc:creator>अक्षरग्राम &#187; अवलोकन अनुगूँज 23: आस्कॅर, हिन्दी और बॉलीवुड</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Apr 2007 01:36:23 +0000</pubDate>
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		<description>[...] इस बार के अनुगूँज की प्रविष्टियां देख कर हमें यही कहना पड़ेगा कि बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले। कुल जमा तीन प्रविष्टियां, वो तो भला हो आशीष और जीतू का जिन्होंने क्रिकेट की अंतिम जोडी की तरह कुछ तो खाता आगे बढाया वरना अपने कागज के शेर (धूरंधर पूराने शातिर हिन्दी चिट्ठाकार) भारतीय क्रिकेट टीम के शेरों की ही कहानी एक बार फिर दोहरा गये। इनकी तुलना आप भारतीय क्रिकेट टीम के शेरों से अक्षरशः कर सकते हैं,  उनके भी पर्सनल रिकार्ड धांसू और इनके भी पर्सनल रिकार्ड धांसू, वो भी बडे (ग्रुप) आयोजन में टांय टांय फुस्स और ये भी ऐसे आयोजन से नदारद। मध्यम क्रम के चिट्ठाकार एक दूसरे की पीठ खुजाने में व्यस्त थे तो यहाँ खाता कहाँ से खोलते। हमने गलती करी की अपनी आधी से ज्यादा बात उदघोषणा के वक्त कह दी और थोडी अवलोकन के लिये बचा के रख दी। हमें अगर पता होता कि कोई मैदान में ही नही उतरेगा तो बजाय घोषणा में कहने के अलग से चेप देते। मोहल्ले की टीम के कप्तान ने भी हमारी किसी पोस्ट में टिप्पणी करके पूछा था घरेलू श्रृखंला (धर्म की बहस) के अलावा भी कोई टूर्नामेंट होता है तो हमें बताओ हम भी खेलेंगे, हमने भी तुरंत मौका लपकने की गरज से इस आस्कर वाले आयोजन का पता बता दिया लेकिन वो अपनी कथनी को करनी में बदल नही पाये और घरेलू श्रखंला में ही व्यस्त हो कर रह गये। यानि कि कुल मिलाकर इस आयोजन का भी कुछ कुछ वैसा ही हाल हो गया जैसा कि इस बार के क्रिकेट महाकुंभ का। चलिये अब अनुगूँज नामक इस आयोजन को अपना आखिर सलाम कहने से पहले अब तक की कहासुनी (या बतकही) का कुछ अवलोकन कर दें। [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] इस बार के अनुगूँज की प्रविष्टियां देख कर हमें यही कहना पड़ेगा कि बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले। कुल जमा तीन प्रविष्टियां, वो तो भला हो आशीष और जीतू का जिन्होंने क्रिकेट की अंतिम जोडी की तरह कुछ तो खाता आगे बढाया वरना अपने कागज के शेर (धूरंधर पूराने शातिर हिन्दी चिट्ठाकार) भारतीय क्रिकेट टीम के शेरों की ही कहानी एक बार फिर दोहरा गये। इनकी तुलना आप भारतीय क्रिकेट टीम के शेरों से अक्षरशः कर सकते हैं,  उनके भी पर्सनल रिकार्ड धांसू और इनके भी पर्सनल रिकार्ड धांसू, वो भी बडे (ग्रुप) आयोजन में टांय टांय फुस्स और ये भी ऐसे आयोजन से नदारद। मध्यम क्रम के चिट्ठाकार एक दूसरे की पीठ खुजाने में व्यस्त थे तो यहाँ खाता कहाँ से खोलते। हमने गलती करी की अपनी आधी से ज्यादा बात उदघोषणा के वक्त कह दी और थोडी अवलोकन के लिये बचा के रख दी। हमें अगर पता होता कि कोई मैदान में ही नही उतरेगा तो बजाय घोषणा में कहने के अलग से चेप देते। मोहल्ले की टीम के कप्तान ने भी हमारी किसी पोस्ट में टिप्पणी करके पूछा था घरेलू श्रृखंला (धर्म की बहस) के अलावा भी कोई टूर्नामेंट होता है तो हमें बताओ हम भी खेलेंगे, हमने भी तुरंत मौका लपकने की गरज से इस आस्कर वाले आयोजन का पता बता दिया लेकिन वो अपनी कथनी को करनी में बदल नही पाये और घरेलू श्रखंला में ही व्यस्त हो कर रह गये। यानि कि कुल मिलाकर इस आयोजन का भी कुछ कुछ वैसा ही हाल हो गया जैसा कि इस बार के क्रिकेट महाकुंभ का। चलिये अब अनुगूँज नामक इस आयोजन को अपना आखिर सलाम कहने से पहले अब तक की कहासुनी (या बतकही) का कुछ अवलोकन कर दें। [...]</p>
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		<title>By: आशीष</title>
		<link>http://www.readers-cafe.net/nc/2007/03/06/kya-tera-kya-mera/#comment-1664</link>
		<dc:creator>आशीष</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 09 Mar 2007 03:17:17 +0000</pubDate>
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		<description>ये हुयी ना बात ! तरुण भाई बहुत दिनो बाद अपने पूरे रंग मे दिखे !

&lt;b&gt;डेमोक्रेसी का मतलब सडक पर चलते हुए कहीं भी थूकना नही होता।&lt;/b&gt;

पता नही कब लोगो को यह समझ मे आयेगा !</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ये हुयी ना बात ! तरुण भाई बहुत दिनो बाद अपने पूरे रंग मे दिखे !</p>
<p><b>डेमोक्रेसी का मतलब सडक पर चलते हुए कहीं भी थूकना नही होता।</b></p>
<p>पता नही कब लोगो को यह समझ मे आयेगा !</p>
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		<title>By: Cuckoo</title>
		<link>http://www.readers-cafe.net/nc/2007/03/06/kya-tera-kya-mera/#comment-1659</link>
		<dc:creator>Cuckoo</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 08 Mar 2007 20:24:28 +0000</pubDate>
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		<description>Bahut acche vichaar hain aapke. Kaash sab aap jaisa soch sakte.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Bahut acche vichaar hain aapke. Kaash sab aap jaisa soch sakte.</p>
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		<title>By: फुरसतिया &#187; मोहल्ले की प्रकृति और नारद</title>
		<link>http://www.readers-cafe.net/nc/2007/03/06/kya-tera-kya-mera/#comment-1655</link>
		<dc:creator>फुरसतिया &#187; मोहल्ले की प्रकृति और नारद</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 08 Mar 2007 17:48:26 +0000</pubDate>
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		<description>[...] बहरहाल , इस मामले में मुझे निठल्ले तरुण की पोस्ट बहुत मजेदार लगी। इसमें तरुण ने जगदीश भाटिया की अपना आईना नारद से हटाने की बात पर मौज लेते हुये लिखा- आईना मोहल्ले के साथ बंद होने की इजाजत मांगे गोया वह कहना चाह रहा हो हम तुम एक कमरे में बंद हो और चाभी खो जाये। [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] बहरहाल , इस मामले में मुझे निठल्ले तरुण की पोस्ट बहुत मजेदार लगी। इसमें तरुण ने जगदीश भाटिया की अपना आईना नारद से हटाने की बात पर मौज लेते हुये लिखा- आईना मोहल्ले के साथ बंद होने की इजाजत मांगे गोया वह कहना चाह रहा हो हम तुम एक कमरे में बंद हो और चाभी खो जाये। [...]</p>
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		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://www.readers-cafe.net/nc/2007/03/06/kya-tera-kya-mera/#comment-1649</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 08 Mar 2007 11:49:03 +0000</pubDate>
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		<description>तरुण! आपसे सहमति है .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>तरुण! आपसे सहमति है .</p>
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		<title>By: Divyabh</title>
		<link>http://www.readers-cafe.net/nc/2007/03/06/kya-tera-kya-mera/#comment-1647</link>
		<dc:creator>Divyabh</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 08 Mar 2007 09:51:06 +0000</pubDate>
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		<description>तरुण भाई,
एक सधी लेख को उम्दा तरीके से व्यंग का पहनावा देकर लिखा है वह काबिले-तारिफ है… हमें "धर्म नही धार्मिकता" की आवश्यकता है। यही मर्म है लेकिन क्या करे भारत अभी विकास कर रहा है और साथ-साथ पीढ़ियों से लड़ता कई सम्स्याओं को एक साथ झेलता…और अलग-अलग रागों को भी सुनता मानववाद-पुँजीवाद-साम्यवाद-समाजवाद-जातिवाद-नारीसम्मान आदि। अभी बहुत समय लगेगा लेकिन उठेगें हम…और सबसे बड़ा उदाहरण था "गुजरात दंगा" जिसका भारत के किसी भी क्षेत्र में प्रत्यक्ष असर नहीं हुआ था… हम जरुर Grow कर रहे हैं…जरा तमाशा धैर्य से देखना होगा!!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>तरुण भाई,<br />
एक सधी लेख को उम्दा तरीके से व्यंग का पहनावा देकर लिखा है वह काबिले-तारिफ है… हमें &#8220;धर्म नही धार्मिकता&#8221; की आवश्यकता है। यही मर्म है लेकिन क्या करे भारत अभी विकास कर रहा है और साथ-साथ पीढ़ियों से लड़ता कई सम्स्याओं को एक साथ झेलता…और अलग-अलग रागों को भी सुनता मानववाद-पुँजीवाद-साम्यवाद-समाजवाद-जातिवाद-नारीसम्मान आदि। अभी बहुत समय लगेगा लेकिन उठेगें हम…और सबसे बड़ा उदाहरण था &#8220;गुजरात दंगा&#8221; जिसका भारत के किसी भी क्षेत्र में प्रत्यक्ष असर नहीं हुआ था… हम जरुर Grow कर रहे हैं…जरा तमाशा धैर्य से देखना होगा!!</p>
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