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आज दिन में नारद चैक किया तो देखा कि “आईना मोहल्ले के साथ बंद होने की इजाजत मांगे” गोया कह रहा हो कि “हम तुम एक कमरे में बंद हों और चाभी खो जाय”। हमें जगदीश भाई कम से कम अपने से तो ज्यादा समझदार लगते थे इसलिये सोचा हो सकता है कि होली की भंग का नशा अभी तक उतरा नही होगा क्योंकि आंकडों के साथ बात करने वाला, एक लाईन में किसी बात का विरोध या अनुमोदन तो कर नही सकता। खैर हमने सोचा कि “इलाही ये माजरा क्या है” और इसका पता लगाने के लिये नारद (हिन्दी चिट्ठेवाले ;)) के दोनों पैरों को अपने दोनों हाथों से पकड उलटा लटका दिया और उइला ये क्या उनकी जेब से धडाधड पर्चियों पे पर्चियां जैसे किसी ने परीक्षा में नकल के इरादे से जमा कर रखी हो। एक पर्ची उठा के देखा तो पाया कि उसमें मुस्लिमों की शान में कसीदे लिख रखे हैं, दूसरी उठायी तो देखा हिन्दुओं की महिमा का गुणगान लिखा है। तीसरी उठाने की इच्छा ही नही हुई क्योंकि हमें लगा हो सकता है उसमें ईसाईयों की महत्ता बताई हो। अच्छा हुआ कि हम इस परीक्षा में नही बैठे क्योंकि हम तो पढके आये थे “तू हिन्दू बनेगा, ना मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा” इसलिये बैठते तो पक्का फेल होते।

पिछले कुछ वक्त से नोट किया है कि हिन्दी चिट्ठाजगत में तथाकथित पत्रकार बंधुओं की बिरादरी बडती जा रही है, तथाकथित इसलिये कहा क्योंकि वो कहते हैं, हमें नही पता कहाँ, किस पेपर में हैं। खैर इस बात से फर्क नही पडता कहाँ है। लेकिन एक बात अभी तक नही समझे कि जो कुछ वो बंधु लोग अपने चिट्ठों में लिखते हैं वो अपने न्यूज पेपर में क्यों नही लिखते क्योंकि अखबार की पहुँच अभी भी इंटरनेट में फैले चिट्ठों से कहीं अधिक है, इसलिये ज्यादा लोगों तक वो बात पंहुचेगी। ताजुब्ब होता है कि ऐसे पत्रकारों के होते हुए भी काहे को हमें आधी से ज्यादा खबरों या लेखों में अमिताभ, शाहरूख, शिल्पा, अमर सिंह, लालू जैसों को ही पडने को मिलता है। निठारी में १४ कंकाल मिले तो सारे पत्रकार पिल पडे वो सब बताने को, वो सब दिखाने को, कहाँ थे ये लोग ये सब लिखने को जब बार बार बच्चों के गायब होने की शिकायत करने पर भी पुलिस वाले उनकी शिकायत लिखने को तैयार नही थे। अब एक ही बात लगती है कि इन लोगों के आका सिर्फ उसी में विश्वास करते हैं जिनसे पेपर या पत्रिका बिके, जिनसे इनके विचारों को इन्हीं के अखबारों या पत्रिकाओं में जगह नही मिल पाती। फिर उसी बैचेन मन की बैचेनी को ये यहाँ चिट्ठों के रूप में निकाल देते हैं।

विज्ञान का नियम है कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, आर एस एस और मुस्लिम लीग इसी क्रिया प्रतिक्रिया का नतीजा है, अब इनमें से कौन क्रिया है कौन प्रतिक्रिया इससे कोई फर्क नही पडता। जब तक नेता लोग हिन्दू और मुस्लिम को वोट की राजनीति के नाम पर अलग अलग नजेरिये से देखते हुए बांटते रहेंगे मुझे नही लगता कि चिट्ठों मे किसी के भी पक्ष में लिखने से कोई फर्क पढने वाला है।

गोधरा के बारे में, उसके विरोध में जितना पढने को मिलता है उतना ही अगर कोई काश्मीर के बारे मे भी लिखता तो कितना अच्छा होता जहाँ हर रोज लोग मरते हैं। क्यों नही कोई आवाज उठाता कि काश्मीर में भी वैसे ही कोई भी जमीन खरीद सके जैसे कि देश के अन्य राज्यों में। जिस देश में रहने वालों के लिये धर्म उस देश से बढा हो जाय उस देश में प्रगति भले ही हो जाये शांति कभी नही रह सकती। धर्म के बारे में सोचने से किसी को फुरसत मिले तो शायद देश की सडकों की दुर्दशा के बारे में, शहरों में ईद का चांद होती जा रही बिजली के बारे में, पीने के पानी के बारे में, बेरोजगारी के बारे में, रहने की समस्या के बारे में यानि कि बुनियादी आवश्यकताओं के बारे में सोचने का, लिखने का नंबर आये।

पता नही ईराक में कौन किस को मार रहा है, ना मालुम अफगानिस्तान में किन के बीच रस्सा कस्सी चल रही है, अब तो शायद यू एन ने भी दार्फूर, सूडान में भूख से मरने वालों की गिनती करनी छोड दी होगी। क्या सिर्फ भारत ही एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है? क्या अमेरिका में सब धर्मों के लोग नही रहते? फिर क्यों नही यहाँ कोई धर्मों के बारे में लेख या पोस्ट नही लिखता, क्यों नही यहाँ एक दूसरे के धर्मों का इतना विरोध नही होता जितना कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष देश भारत में। क्यों नही यहाँ कोई धर्म के नाम पर वोट मांगता है जैसे तथाकथित धर्मनिरपेक्ष देश भारत में, क्यों नही यहाँ किसी राजनीतिक पार्टी को किसी धर्म विशेष से जोडके नही देखते। मुझे नही पता मैं जानना भी नही चाहता क्योंकि मैं जानता हूँ उसके बाद भी यहाँ अमेरिका में कुछ नही बदलने वाला क्योंकि यहाँ नियम और कानून किसी भी धर्म से बढकर हैं, क्योंकि यहाँ हर धर्म के लोगों के लिये अलग नियम नही है, क्योंकि यहाँ लोग जागरूक हो चुके हैं और उन्हें पता है कि धार्मिक कट्टरता के क्या नुकसान है, उन्हें पता है इससे किसी का कोई फायदा नही होने वाला। वहीं भारत में शायद अब धीरे धीरे लोगों की समझ में आ रहा है कौन अपना है कौन पराया, कौन सही है कौन गलत। लेकिन अभी भी वहाँ लोगों को इतनी समझ नही कि डेमोक्रेसी का मतलब सडक पर चलते हुए कहीं भी थूकना नही होता।

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