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दम तोडती कहानियाँ

February 10th, 2007 | 6 Comments | Posted in बस यूँ ही

जी हाँ, आपने बिल्कुल सही पढा है – कहानियाँ भी दम तोडती हैं। लेकिन यहाँ मैं अपनी उस कहानी की बात नही कर रहा हूँ जो शुरू तो जोरशोर से की थी लेकिन जिसके अंत का अभी पता नही क्योंकि उसका तयशुदा अंत लापता है, मिल नही रहा। और ना ही बुनो कहानी की उन कहानियों की बात कर रहा हूँ जो अपने पूर्ण होने की बाट जोह रही है, अब भी सोच रही हैं शायद कोई कहानीकार आये और उन्हें पूर्णता की प्राप्ति हो।

मैं बात कर रहा हूँ उन कहानियों की जो एक दूसरे को देखके सुनके परवान चढती हैं। जिनके अंत का और जिनके कल का खुद उसके लेखक को पता नही होता है, जो दर्शकों की पसंद ना पसंद के बल पर करवट बदलती है। जिसके पात्रों और चरित्रों की डोर भी टी आर पी से बंधी होती है, जिसकी सशक्ता उससे मिलने वाले विज्ञापनों की संख्या से आंकी जाती है। अगर आप अब तक अनुमान नही लगा पाये तो मैं बता दूँ यहाँ हम बात कर रहे हैं देशी धारावाहिक की कहानियों की जो एक ही ढर्रे पर होने के बावजूद आरंभ तो दमदार तरीके से करती है लेकिन थोडा ही दूर चलके पहले हांफने फिर दम तोडती सी लगती है।

जो अपने आप में लाखों कमियां होने के बावजूद उसके बनाने वाले को मालामाल करती जाती है, जिसके पात्रों के बारे में लोग इस तरह से बात करते हैं जैसे अपने रिश्तेदारों और पडोसियों की बात कर रहे हों। इन कहानियों में कोई गरीब नही होता, कम से कम अगर गरीब कहा भी जाये लेकिन इसके पात्र पूरे राजसी ठाट से रहते हैं, इन कहानियों के पात्र कब पलटी मार लें खुद इन कहानियों को पता नही होता। राम नजर आ रहा पात्र कब रावण हो जाता है और रावण कब राम पता ही नही चलता, जिसकी नायिका ऐसी कि सीता भी शरमा जाये, खलनायिका ऐसी क्रूर कि क्रूरता शरमा जाये। हर कहानी के हर परिवार में ऐसा एक पात्र जरूर होता है जिसकी हरकतें दुर्योधन को भी मात दे दें और एक ऐसा पात्र जिसकी शराफत राम को।

हर कहानी किसी ना किसी महिला पात्र के इर्द गिर्द ही घूमती रहती है जिसमें राम भी महिला और रावण भी और बाकि सब कठपुतलियां। कहानियों के नाम भी लगभग एक जैसे, चाहे नाम कुछ भी हो लेकिन बनी वो भावनाओं की खिचडी से ही होती है। २ हिस्से प्यार, १ हिस्सा रहस्य, १ हिस्सा हास्य, १ हिस्सा ऐक्शन, १ हिस्सा रोमांच और १ हिस्सा हॉरर इन सबको एक ही चाशनी में अलग अलग तरीके से पका के अलग अलग चैनल रूपी बर्तनों में परोसा जाता है दर्शकों के रसास्वादन के लिये और जिसे दर्शक भी ऐसे चटखारे ले ले के खाता है जैसे वर्षों का भूखा हो।

साल खत्म हो जाते हैं, लेकिन ये कहानियां खत्म नही होती, घिसटती जाती हैं, लेकिन खत्म नही होती। आखिर कब तक हम यूँ ही इन कहानियों को दम तोडते देखते रहेंगे, क्या फिर से वो एक कहानी लौटेगी जो जिस दिन शुरू होती थी उसी दिन खत्म भी, जो दम उसके आरंभ में होता था वो ही दम उसके अंजाम में। जिसमें गरीब वाकई गरीब होता था और अमीर वाकई में अमीर, जिसमें चरित्र होते थे कहानी के अनुसार, जिसमें ना ही महिलाओं की भरमार होती थी, ना ही व्यर्थ की चीख पुकार। लेकिन जब तक किसी कहानी को उसके टी आर पी से आंका जायेगा तब तक शायद हमे यूँ ही कहानियों को दम तोडते देखना पडेगा।

चलते चलतेः याद है वो गाजर खाता और खिलाता करमचंद, पंकज कपूर एक बार फिर करमचंद बनके वापस लौट रहे हैं गाजर खाने और खिलाने लेकिन इस बार सोनी टीवी में।

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6 Responses to “दम तोडती कहानियाँ”

  1. manya Says:

    बिल्कुल सही कहते हैं आप की ये कहानियां घिसी-पिटी और दम दौङ्ती है। पर नई कहानियां तो तब आयंगी ना जब पुरानी उन्हें आने देंगी.. पत्झङ के बाद ही बहार आती है। जैसा की आपने कहा कि दर्शक खुद ही इन बे-स्वाद कहानियों में मस्त है तो किसी को क्या जरूरत है कुछ नया परोसने की.. वही पुरानॆ व्यंजन जब नई कमाई देंगे तो आपकओ लगता है कि कोई नया खाना बनाएगा। फ़िर भी चाहती हूं आप्क ये प्रयास कुछ जीवंत कहानियॊं को जन्म दे.. धन्यवाद।

  2. Amit Says:

    मैं समझता हूँ कि कहानियाँ अधूरी रहने का एक कारण यह भी हो सकता है कि किसी को कहानी पूरी करने में रूचि न हो। अरे कभी कभी तो स्वयं मूल कहानीकार की भी रूचि समाप्त हो जाती है!! ;)

  3. घुघूती बासूती Says:

    एक ही तरीका है इनसे बचने का । इन्हें मत देखिये, कितने भी अकेले या बोर हो रहे हो ,कभी मत देखिये । इनकी भी लत लग जाती है ।
    घुघूती बासूती
    ghughutibasuti.blogspot.com

  4. Govind Says:

    Yeh sab serials dimag ka dahi karte hain. PAr shayad hamari janata jyada complex plots samajh nahin patin?
    Agree with last comment – don’t watch them, you get addicted to the worst of them.
    Best channels
    Travel & living(food, travel & drinking)
    Discovery (extreme machines, how do they do it)
    News on DD (trust me – it is still the most sober)

  5. Tarun Says:

    @गोविंद और @घुघुती, मैं तो इन प्रोग्रामों को खैर देखता नही लेकिन जब ज्यादा से ज्यादा लोग इन सीरियलों को देखना बंद करेंगे तभी ये सभंव हो पायेगा।

    @अमित, @मान्या धन्यवाद :)

  6. Ajay Kumar Tyagi Says:

    bor hone par pado to maza loge
    maza lekar jo pado to bor goge

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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